मंगलवार, मार्च 22, 2016

धर्म

धर्म, धर्मांध - युद्ध, रक्तपात,
यत्र, तत्र, सर्वत्र - हिंसा का ताप ।
घृणा का विष, अज्ञानता का आधार,
भय की आधारशिला, तर्क निराधार ।
दैविक प्रलोभन, धर्मोचित नरसंहार,
कुप्रथा, प्रणाली, मानवता पर प्रहार ।
मरीचिका की पराकाष्ठा, ठगी अपरम्पार,
कोटि भ्रम जाल, मिथ्या का अंधकार ।
युद्ध, अज्ञानता, हिंसा, घृणा, रक्तपात,
धर्म, धर्मांध - असहनीय ये आघात ॥
 

2 टिप्‍पणियां:

Prashant Saxena ने कहा…

Well said Atul! Totally agree that this is what religion had resulted in as proven by followers of all major religions over the centuries! However there is hope! Since we have few that are exceptions: Jainism, Buddhism, Sufism etc. Hope, some day we get enlightened and take note of it :)
Good to see your creative flash after a log time...keep them coming!!
(Sorry, writing in English since it's much easier to type.)

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

आज की दुनिया में चारों ओर यही दिखाई दे रहा है.आदमी का विवेक कुंठित हो गया है ,अंधआधुंध दौड़ में भाग रहा है ,बिना सोचे -विचारे कि पहुँचना कहाँ है.