सोमवार, नवंबर 04, 2013

मानव

कभी मैं उसके आँगन में लहराता था,
धूप लू में बाहें फैला, छाँव के आँचल से कुटिया को सहलाता था।
अब उन्हीं गगन चूमती कुटियों की छाँव में पलता हूँ,
कब पड़ेगा वार आरियों का, यही सोच कर डरता हूँ॥
- मैं हूँ पेड़। 

लहरा लहरा आँचल से अपने उसके मैले तन को धोती थी,
प्यार भरे इस आँचल में उसके गंदे कर्मों को ढोती थी।
अब नम आँखों से उसी से मैं कर बद्ध निवेदन करती हूँ,
साफ करो अब तुम तन मेरा बस इसी आस से बहती हूँ॥
- मैं हूँ गंगा।

अपनी जटाओं से भेद कर बादल मैं उसकी प्यास बुझाता था,
अपनी गोदी में फल फूल लिये उसके मन को बहलाता था।
मेरे ही कंधे पर चढ़ कर वो काट रहा मेरा तन मन,
अब भेद न पाऊँ वो बादल जो विचरण करते उच्च गगन॥
- मैं हूँ पर्वत

लम्बे हाथों को फैला कर उन सब की रक्षा करता था,
मानव के तीर कमानों की वर्षा से बचा कर रखता था।
मेरे ही हाथों को काट काट वो मुझको कुचले जाता है,
मेरे परिवार के लोगों को मार मार अपना भवन सजाता है॥
- मैं हूँ जंगल/ हम हैं पशु पक्षी 

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- अतुल श्रीवास्तव

2 टिप्‍पणियां:

प्यार की बात ने कहा…

Very Interesting Recipe Shared by You. Thank You For Sharing.
प्यार की बात

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

खूब विश्लेषण किया है,इंसान ने अपना विवेक गँवा दिया है !