मंगलवार, नवंबर 09, 2010

खाली दिमाग.

मूर्तियाँ पत्थर की जगह मिट्टी की होती जो,
आँख के गंगा जल से कभी पिघलती तो।

टूटते तारे को देख कर मन्नत माँगी सोचा भला होगा,
पर ये न सोचा कि उसके गिरने से किसी का घर जला होगा।

मारता है, काटता है, मरता है, मज़हब के लिये सब करता है,
धिक्कार है मज़हब पर जो उसी इंसान के लिये कभी न मरता है।

शराबी और सन्यासी में कोई अंतर नहीं, खुश होने का ढोंग रचाते हैं,
खुद को नशे में डुबो कर, जिम्मेदारियों और वास्तविकता से मुँह चुराते हैं।

अगर गली गली नफरत की जगह अकल बंटती होती,
तो शायद मंदिरों,मस्जिदों की जगह पुस्तकालयों की ज़रूरत होती।

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3 टिप्‍पणियां:

Mridula ने कहा…

Good to see you blogging after long. Why don't you post some of your travel pictures on your blog?

Nisha ने कहा…

Wow !
The lines are beautiful. Allow me to share the poem with my followers.

Do you write poems quite often? I don't think so.

BTW, I liked your answers to 'favourites' on your profile too. :-)

Thanks for dropping by at my site, keep coming.

D K Singh ने कहा…

वाह वाह,अति उत्तम. कविताओ की बानगी भी अब देखने को मिलेगी इस ब्लोग पर.