मंगलवार, नवंबर 09, 2010

मूर्तियाँ

बहुत दिनों से माननीय सुश्री भानुमती जी समाचार पत्रों और अदालतों की कुंद बुद्धि का शिकार बनी हुई हैं। और, कारण हैं किसी का नुकसान न पहुँचा सकने वाली पत्थर की मूर्तियाँ। ये सब गिरी हुई करतूत है मुये “सभ्य” लोगों की जो न इस महान कार्य की महत्वता को समझते हैं और न ही उन सच्चे भारतीयों के बारे में जानते हैं जिनकी मूर्तियाँ गली गली में खड़ी की जा रही हैं।

सुश्री भानुमती जी के इस पावन और महान कार्य के महत्व से मैं आपको संक्षिप्त में अवगत कराता हूँ – अब आप इस बात से इंकार तो नहीं करेंगे कि आज कल बड़े शहरों में पढ़ रहे बच्चों का भारतीय चीजों का ज्ञान उत्तर प्रदेश के समस्त नेताओं के आई. क्यू. से भी कम है। नहीं सहमत हैं? कोई बात नहीं सेंट अल कपोन (जरूरी बात ये है कि बच्चे के स्कूल का नाम “सेंट” से शुरू होना चहिये और उसके बाद एक धाँसू सा अंग्रेजी नाम होना चाहिये) में पढ़ रहे पंद्रह वर्षीय भरत से पूछिये के पाणिनि कौन थे या वो गार्गी के बारे में क्या जानता है। बस इसी समस्या का समाधान है सुश्री भानुमती का ये पुण्य काम और विकीपीडिया का ज्ञान सागर। जरा सोचिये सुश्री भानुमती जी का ये काम कितना लाभदायक होगा बच्चों को भारत से अवगत कराने में। आप कान में हेडफोन ठूँसे हुये अपने किशोर या किशोरी के साथ गोल मर्केट जायेंगे और वो अपनी “बीच की उँगली” मूर्तियों के ओर उठा कर आपसे पूछेगा – “Dad who is that sick looking dude?”, “Who is that old lady?”, “And, who is that cool looking guy riding a horsie?” और, आप सीना फुला कर कहेंगे – “बेटा वो पाणिनि की स्टैचू है। ये गार्गी की और ये हैं महाराणा प्रताप जी।“ बच्चा मुंडी हिलायेगा - अगर आपकी किस्मत अच्छी हुई और बच्चे के दिमाग में जिज्ञासा नामक कीड़ा होगा तो शाम को फेसबुक पर “जोक्स” पढ़ते पढ़ते विकीपीडिया पर इन महान हस्तियों के बारे में भी पढ़ लेगा।

मैं तो कहूँगा कि हमें हर दस पंद्रह फीट की दूरी पर मूर्तियाँ स्थापित कर देनी चाहिये। एक फायदा तो मैं ऊपर लिख ही चुका हूँ। और भी कई फायदे हैं – जैसे कि कबूतर और चिड़ियों को सुलभ शौचालय और पान खाने वालों को पीकदान मिल जायेंगे।

खैर, मैंने सोचा कि सुश्री भानुमती जी को इस नेक काम के लिये धन्यवाद अवश्य देना चाहिये। बस पहुँच गया उनके निवास स्थल पर। गेट पर ही दरबान ने रोक लिया – “काहे के खातिर आये हो?”

"सुश्री भानुमती जी के चरणों में नत मस्तक करना है।"


“बड़ी कड़क हिन्दी बोले हो भैय्या। खईर बहुत जन आवे हैं माथा टेकन भये। उह वाली लाईनवा मा लग जा।"

लाईन की ओर देखा तो पसीना चू पड़ा। तकरीबन तीन चार सौ लोग चिलचिलाती धूप में लाईन में डटे हुये थे। मैं पलट कर दरबान जी की ओर दौड़ा, “अरे दरबान साहिब मैं तो अम्मा जी को कुछ भेंट देने के लिये आया था।"

“कैस (कैश) है या कौऊनो जमीन जायदाद है?”

बात मेरी कुछ समझ में आई नहीं, इसलिये झट से बोल पड़ा, “कैश है कैश”

"तब जईके दुसरी वाली लईनवा में लग जा।"

ये क्या ये तो अर्थ का अनर्थ हो गया। भेंट वाली लाईन में तो हजार लोग खड़े हो कर पंखा झल रहे थे। उल्टे पाँव दौड़ पड़ा दरबान की ओर, “अरे दरबान भैय्या मैं तो अम्मा जी को मूर्ति के बारे में आईडिया देने आया हूँ।"

“तो ऐसन कहा न। अरे जबसे इह स्रेनी(श्रेणी) वाली कतार बनाई है तुम पहले प्राणी हो जो यह खातिर यहाँ धमके हो। कौऊनो ससुरा उस लाईन माँ हईये नाही – तोहरी तो डिरेक्ट एंट्री है, चला जा सीधा मईया के दरबार मा।"

बस मैं सीधा सुश्री भानुमती जी के सभा कक्ष में प्रवेश कर गया। मेरे ठीक सामने सुश्री भानुमती जी अपने भीमकाय शरीर से एक छोटे से सोफे को कुचल कर मारने का प्रयास कर रहीं थी। मैंने माथा टेका, भानुमती जी ने पूछा कि कैसे पधारे, और मैं पूछ पड़ा, “आप आज कल मूर्तियाँ बनवाने और स्थापित करने में लगी हुई हैं। इसके पीछे मूल कारण क्या है?”

भानुमती जी ने बड़ी आत्मीयता से कहना प्रारंभ किया, “सिरीवास्तव जी, हमारे देस के बड़े बड़े महापुरुस लोग हमें बहुत सिखा कर गये हैं, उन्होंने हमारे जीवन का उद्धार किया, हमें सभ्य बनाया, हमें नयी नयी चीजों से अवगत कराया। हमें उनका सम्मान करना चाहिये – बस ऐसे ही महापुरुसों को याद रखने के लिये हम उनकी मूर्तियाँ स्थापित करते जा रहे हैं।"

इधर भानुमती जी प्रवचन दिये जा रही थीं और दूसरी ओर मेरा द्रुतगामी दिमाग सोचे जा रहा था कि मैं भी एक ऐसी ही महान हस्ती को जानता हूँ जिसने हम असभ्य और गंवार भारतीयों को civilized बना डाला है – ऐसी ऐसी नये चीजें सिखाई हैं जिनके बारे में हमारे दादा और पर दादाओं को हवा तक नहीं थी। मैंने उसी क्षण निर्णय ले लियी कि मुझे भी इस महान हस्ती की मूर्ति बनवा कर न सिर्फ़ हज़रतगंज में वरन India के सारे बड़े और civilized शहरों में स्थापित करनी है।

“भानुमती जी आप ये मूर्तियाँ किससे और कहाँ से बनवाती हैं? क्या आप उस जगह का पता देंगी?”

हाँ हाँ कहते हुये सुश्री भानुमती जी ने जलेबी वाले लिफाफे के पीछे पता लिख कर मेरे हाथों में थमा दिया, और मैं एक विजयी सिपाही की तरह हाथों में पता और चेहरे पर एक चौड़ी सी मुस्कान लिये बाहर आ गया।

अगले ही दिन मैं गजगामिनी और ठुमक ठुमक कर चलने वाली उ.प्र.रा.प.नि. (उत्तर प्रदेश राजकीय परिवहन निगम) की जनता बस में सवार हो गया – तहसील रानीगंज, जिला प्रतापगढ़ जाने के लिये – आखिर मूर्ति जो बनवानी थी। अब आपसे क्या छुपाऊँ 1975 से आज तक ये जनता बसें और रानीगंज जाने वाली सड़कें अविराम यही नारा लगाये जा रही हैं – बदलना हमारी फितरत में नहीं और हमको बदल दे ऐसा कोई जन्मा नहीं। बस चलने से पहले चारबाग बस स्टेशन पर काले पड़ रहे तेल में तले और तरे हुये छोले भटूरों का सेवन किया, बड़ी सी डकार ली और मुँह पानी से भर कर सड़क पर पिच्च से कुल्ला दे मारा। बस चली हिचकोले खाते हुये – सड़क भयंकर थी और समस्या उससे भी गंभीर। छोले भटूरों ने कहा हमें नहीं जाना ऐसी बस में, और ऊपर और नीचे से निकलने का जुगाड़ करने लगे। खैर साढ़े चार घंटो के बाद रोते पीटते सही सलामत मैं पहुँच गया तहसील रानीगंज, जिला प्रतापगढ़। छोटा सा ही कस्बा था इसलिये मूर्तिकार राम खिलावन का घर जल्दी ही और आसानी से मिल गया।

“जय राम जी की राम भैय्या।“

"राम जी की जय बाबू। सकल और कपड़न से तो पढ़े लिखे बाबू लगत हो। हियाँ इस बदबूदार गाँव में कईसन आये गये?”

"अरे अगर सरकारी अधिकारी, नेता या अभिनेता होता तो कुआँ खुद ही प्यासे के पास चला जाता। पर मैं तो साधारण सा आदमी हूँ इसी लिये ये प्यासा कुयें के पास आया है। आपसे एक मूर्ति बनवानी है।"

"सही कहे हो बाबू। पढ़े लिखे लोग तो जरूरत पड़न पर भी गाँवन का रुख नाही करे हैं – चपरासी और नौकर जाति को हियाँ भेज देवे हैं मच्छरवन से कटवाई खातिर। पर बाबू काहे हो पैसा बरबाद करै पर तुले हो। मुर्तियाँ तो तबही अच्छीं जब मंदिर में बैठें – कम से कम लोग जना फल, फूल और रुपैय्या पैसा तो चढ़ाये हैं। गली नुक्कड़ पर लगी मूर्तियन पर तो कुकुर (कुत्ता) मूतें और चिड़ियाँ करें टट्टी – चाहे वो हो गाँधी बाबा या लाल बहादुर सासतरी।"

मैंने राम खिलावन को भाषण पिला डाला, “उन सभी महापुरुषों या हस्तियों की मूर्ति स्थापना होनी ही चहिये जिन्होंने हमारा जीवन परिवर्तित किया है, सिखाया है और प्रगति के पथ पर ढकेला है...”

"ठीक है ठीक है बाबू। आपको कौनो महापुरुस की मूर्ति बनवाये क है?”

"अंकल सैम की। अमेरिका मतलब कि अमरीका की।"

"अब ई अंकल सैम कौन हैं और का किहिन हैं हमरी खातिर?”

“अरे राम खिलावन जी इन्हीं ने तो भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या तो ठीक और सभ्य तरीके से बोलना सिखाया है – गंवारों को सिविलाईज़्ड बनाया है। अब आप ही बताओ जब आप टी वी और “हिन्दी” फिल्मों में लोगों को टिपिर टिपिर अंग्रेजी बोलते देखते हो तो आपके नहीं लगता कि आप और आपका बेटा भी ऐसी ही फर्राटे से अंग्रेजी बोले। आप जब शहर जाते हो तो थोड़ी बहुत शरम तो आती ही होगी शहरी बाबुओं के बीच में?”


"बात तो सही है तोहरी। इही खातिर हमहूँ अपने बिटवा को अंगरेजी इसकूल में डाले हैं। पर बाबू अंग्रेजी तो हमका अंग्रेज सिखाये हैं – ये सैम टैम कौऊन प्रानी हैं?”

"आप भी न... भारत आजाद हुआ था 1947 में, पर अंग्रेज वो न कर पाये जो अंकल सैम ने पिछले 10-15 सालों में कर डाला। सिर्फ़ अंग्रेजी ही नहीं उन्होंने हमें और भी कई चीजों में शिक्षित किया है...”

"जैसे कि...”

"अच्छा आपको पता है कि नीला रंग लड़कों के लिये और गुलाबी रंग लड़कियों के लिये होता है...”

"नहीं..."

"मुझे और मेरे दादा को भी नहीं पता था। भला हो अंकल सैम का कि अब अधिकतर भारतीय न सिर्फ जानते हैं पर उसका पालन भी करते हैं।"

"बाबू और क्या सिखाये हैं ई सैम बाबू हमका..”

"अब आप देखो ये ससुरे दूरदर्शन वाले हम सबको सालों साल घिसे पिटे, बोर करने वाले, सीख देने वाले और नीरस कार्यक्रम दिखाते रहे – भारत एक खोज, चाण्क्य, श्रीकांत, मालगुडी डेज़... भला हो अंकल सैम का कि अब हमारे टी वी वालों को दिमाग पर जोर नहीं डालना पड़ता है, और फ़टाफ़ट मसाले दार और सेक्सी लड़कियों से भरपूर तरह तरह के उच्च स्तरीय टी वी प्रोग्राम हमारी सेवा में परोस देते हैं।"

"और बताओ बाबू...”

"हमारे होनहार बच्चों को जयपुर घराना या लखनऊ घराना पता हो या न हो पर सबको हिप हॉप और ब्रेक डांस जरूर पता है। वैसे खिलावन जी आज कल नृत्य को डांस कहते हैं। भातखंडे गया भात खाने, बच्चों को नयी अच्छे चीज़ सीखने को मिली है – रैप।"

"पर रेप तो कनूनी अपराध है...”

"आप चिंता न करें ये वाला सिर्फ गानों के साथ किया जाता है..। और अगर रैप अमरीकन घेटो (Ghetto) स्टाईल में न करें तो फिर फायदा क्या?”

"हाँ बचुआ बताई क रही कि आज कल बड़ा बड़ा सहरों मा लोग कौऊनो नये तरीका का डांस किये हैं सब लोग – हियाँ तक क महरारू (औरत) जना भी...”

"हमारी फिल्में भी देखो तो लगता है कि हॉलीवुड का हिन्दी रूपांतर चल रहा है। मुझे तो लगता है कि अगर हॉलीवुड ने फिल्में बनाना बंद कर दिया तो हमारे लोग पुरानी फिल्मों को तब तक रिसाईकल करते रहेंगे जब तक वो फट फटा कर चिथड़े चिथड़े नही हो जायेंगी। अब देहाती तरीके के गोद भराई के दिन भी गये। भला हो सैम जी का कि हम उजड्डों को Baby Shower और Bachelor Party का शऊर आ गया।"

“अरे हम तो पूछना ही भूल गये। कुछ पीहैं (पियेंगे) आप? अरे बचऊ जरा साहिब के लिये एक ठो ठंढा पेप्सी और एक पैकटवा लेज़ चिपस का ले आ।"


"अरे दिक्कत क्यों करते हो? हो सके तो छाछ पिलाओ।"

"आप भी मजाक करते हो बाबू। अब ई सब देहाती चीज़ कौन पिये है? आप तो बस सैमवा के बारे में बताये जाओ।"

"अब आप से क्या कहना। वैसे तो हमारे देश में सैकड़ों त्योहार हैं, पर सब के सब बहुत पुराने हो गये हैं और उनमें वो मौज मस्ती नहीं रही। तो सैम जी ने हम लोगों को नये नये और ज्यादा मजेदार त्योहारों से लैस कर दिया जैसे कि Friendship Day, Valentine Day, Christmas (more like a fashion trend for “cool” and Americanized people) और जल्दी ही हम लोगों को Thanksgiving Day और Halloween Day के बारे में भी सिखाया जायेगा।"


“साहिब, भगवान भला करें इन सैम जी का। बड़ा पुन्न (पुण्य) का काज किये हैं ये, वरना हम तो ससुर गंवार के गंवार ही रह जाते।"

"अब देखो क्रिकेट जैसा खेल जो नीरस होने की कगार पर खड़ा था, उसका भी अमरीकी-करण तो करना ही था – आयातित गोरी बलायें चौका या छ्क्का लगने पर ठुमक ठुमक कर पुरुष जाति के दर्शकों का कैसे मनोरंजन करती हैं। अच्छा आप ये तो मानोगे कि सभी प्राणी महापुरुषों का आशिर्वाद पाने के लिये लालायित रहते हैं, और जब महापुरुष उनके सर पर हाथ रख देते हैं तो अपने आप को धन्य समझने लगते हैं और गर्व से कहते हैं कि फलाँ फलाँ महापुरुष ने स्वयं अपने हाथ से उनको प्रसाद या भभूति दी।"

"हाँ ये सोलहो आना सच्ची बात है।"

"बस सैम जी का भी कुछ कुछ ऐसा ही प्रभाव है। कोई कितना भी बड़ा कलाकार क्यों न हो, पर जब तक सैम अंकल अपने हाथ से भभूति न दे दें तब तक वो महान कहला ही नहीं सकता। या ये भी कहा जा सकता है कि अगर सैम अंकल किसी गधे पर भी भभूति छिड़क दें तो हम सब गर्व से फूल कर गधे को भी पूजने लगते हैं। हम कितने महान हैं या हमने कितनी तरक्की कर ली है इस पर हम तभी विश्वास करते हैं या उसे सच मान लेते हैं जब सैम जी हमें Newsweek, Times या The Economist के जरिये से बताते हैं।"

"बड़े परभावसाली हैं ये सैम चचा तो।"

"सो तो ये हैं ही, वरना हमें शालीन तरीके से गालियाँ बकना कौन सिखाता। जैसे कि शिट, फ# और आसहो@। आप टी वी देखो – लोग क्या धड़्ड़ले से शिट बोलते हैं।"

"ई शिट का बला होवे है?"

"अरे वही जो चिड़ियाँ मूर्तियों पर करती फिरती हैं और आप सुबह सुबह खेतों में करने जाते हो।"

"हा हा हा ई तो बड़ा मजेदार बात हुई। सोचो कोई हमसे पूछे कि भैंसवा का चारा दियो कि नाही और हम कहें – अरे पैखाना, भूल गया... हा हा हा।"

"कल ही मैने एक महानुभाव को टी वी पर एक टी-शर्ट पहने देखा जिसपे लिखा था “FCUK” – अब भाई गाली देने और दिखाने का शालीन तरीका तो हमने सैम अंकल से ही सीखा है न?”

“और बतायें...”

“खिलावन भाई आपकी शादी कैसे हुयी थी...”

"अरे आप तो हमरी दुखती रग पर नमक रगड़ रहे हो। बापू और अम्मा हमार कनवा (कान) उमेंठ कर हमका सावितरिया (सावित्री) संग बियाह दिये रहें।"

“अरे आप समझे नहीं। खैर अब आजकल अगर आप को शादी करनी है तो एक घुटने पर बैठ कर, एक हाथ से हीरे की अंगूठी आगे करते हुये कहना होगा – Will you marry me? और, ये किसने सिखाया? अंकल सैम के हॉलीवुड ने। बॉलीवुड नाम की प्रेरणा किसने दी? अंकल सैम के हॉलीवुड ने।"

“हुजूर आप तो बड़ी गजब की बातें बताये रहे हो...”

"खिलावन भाई आप ही बताओ हम महान हैं कि सैम चाचा? हम पिछले पचास सालों में दुनिया को कुछ न सिखा पाये, पर सैम जी ने हमको खाना, पीना, बोलना, नाचना, गाना और तो और उनकी तरह सोचना भी सिखा दिया और वो भी सिर्फ़ पिछले 10-15 सालों में। हैं न महापुरुष?”

"सही कह रहे हैं आप। मेरे बिचार से तो सैम जी की मुर्तिया तो कौऊनू गली नुक्कड़ मा नाही बलकी मंदिरवा मा लगाई क चाही।"

“तो फिर देर किस बात की है फटाफट बनाओ और स्थापित करो।"

"पर साहिब एक ठो पिराबलम है। यदि सैम जी की मूर्तिया बनाई के मंदिरवा मा लगाई गई तो हमरे देस बासियों को सुहायेगा नहीं। अरे बहुतै (बहुत ही) बड़ा हंगामा हुई जईहै।"

"सो तो है, पर क्या कहें अब ये भारतीय नास्तिक भी हो चले हैं। जिसको अपना रहे हैं, उसी को नकार भी रहे हैं। पर आप मायूस न हों – दिल से तो सब मानते हैं और एक न एक दिन सब एक स्वर में बोलेंगे भी जरूर कि सैम बाबा की जय हो..."

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2 टिप्‍पणियां:

Mridula ने कहा…

Times are a changing!

D K Singh ने कहा…

रानीगंज मे अंकल सैम की प्रतिमा बनवाना! क्या कल्पना है. उत्तर प्रदेश मे तो सिर्फ मायावती महोदया की प्रतिमाये ही पायी जाती हैं.