रविवार, जनवरी 17, 2010

असमंजस

गरमी के ताप से सुलगती धरा की वेदना को देख कर सावन के माह ने पदार्पण करने का निश्चय ले ही लिया। धरती को अविराम अपनी उष्मा से सींचता हुआ सूर्य भी थक सा गया था अत: काले घने बादलों की चादर के पीछे मुँह छुपा कर कुछ क्षण के लिये सोने का प्रयत्न करने लगा। वायुगति से भागते हुये बादलों ने भी जब विश्राम के लिये रुक कर गर्मी से व्याकुल वसुन्धरा की स्तिथि देखी तो अपने अश्रुपात को रोक न सके। पानी की शीतल छीटों से अपने आप को भिगो भिगो कर समस्त प्राणी बाहें फैला कर सावन के आगमन का स्वागत करने लगे।

जहाँ सारा देश प्रसन्नचित हो कर सावन के आने की खुशियाँ मनाने लगा, छोटे बच्चे पेड़ की डालों पर झूले डालने की तैय्यारियाँ करने लगे, वहीं सोनभदर नाम के एक छोटे से गाँव के लोगों में आने वाले संकट का भय फैलना प्रारंभ हो गया। भय इस लिये क्यों कि सोनभदर स्थित है कर्मनाशा नदी के तट पर। वही कुख्यात कर्मनाशा नदी जिसके बारे में ये किंवदंती प्रचलित है कि 'ई नदिया बाढ़ी, जिया लेके मानी'। गाँव के वृद्ध विचलित होने लगे कि यदि इस वर्ष वर्षा मूसलाधार हुई और ये जान-लेवा कर्मनाशा सर्प की भाँति रेंगती हुई गाँव में प्रवेश कर गयी तो बिना किसी की जान लिये वापस न जायेगी। अगर ऐसा हो गया तो कौन बलि के लिये आगे आयेगा?


इस वर्ष इन्द्र के पास जल भंडार कुछ अधिक ही था – बिना कोई विराम लिये पानी बरसाये जा रहे थे। जैसे जैसे कर्मनाशा का जल स्तर ऊपर उठता वैसे वैसे सोनभदर के लोगों का भय और बल पकड़ता जाता।

जहाँ एक ओर गाँव के निवासी अपनी आने वाले संकट के निवारण के बारे में सोच रहे थे, वहीं दूसरी ओर सोनभदर के थाने में तैनात एकमात्र थानेदार बिसम्भर सिंह बस यही सोचता रहता कि अपने पद के भय को और कैसे प्रयोग में लाया जाये। गाँव के निवासियों के संकट और पीड़ा से कोसों दूर रहने वाला बिसम्भर दिन भर थाने के बाहर स्टूल पर बैठ कर चिलम फूँकता और रात को ताड़ी पी कर गली चलते लोगों को परेशान करता। पर सोनभदर के लिये ये कोई नई व्यथा न थी। आजतक गाँव मे संरक्षक के रूप में आये हुये सभी थानेदारों की करतूतें ऐसी ही रही हैं। पर शायद अभी तक आये हुये सभी थानेदारों में बिसम्भर सबसे तुच्छ कोटि का प्राणी था – गाँजा लगाना, ताड़ी पीना और पैसे उमेंठना तो सभी थानेदारों ने किया, पर बिसम्भर की तरह गाँव की किशोरियों को ललचाई कुदृष्टि से किसी और ने न देखा था। पिछले कई सप्ताहों से बिसम्भर की कामयुक्त कुदृष्टि राम खिलावन की उन्नीस वर्षीय पुत्री बेला का पीछा किये जा रही है।

वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही है और कर्मनाशा के तरंगे प्रसन्नता से उछलना शुरू हो गयी हैं कि शीघ्र ही सोनभदर से मानव बलि प्राप्त होगी। गलियों में भरते हुये पानी ने नित्य प्रतिदिन का जीवन अस्त व्यस्त कर दिया है – लोग बाहर कम निकल रहे हैं, घरों में ही कैद होकर बैठे हुये हैं। ऐसे में बिसम्भर के पास भी कुछ करने को नहीं है। बस बिसम्भर के खाली दिमाग को शैतानी विचारों ने अपना घर बना लिया है और उसके समक्ष सर्वदा बेला की छवि मंडराने लगी है।


थाने के बाहर बैठ कर चिलम फूँकता हुआ बिसम्भर पानी के बढ़ाव को देख रहा था। आज कर्मनाशा का जल स्तर कुछ अधिक तीव्रता से ऊपर उठना शुरू हो गया है। और, उसी आवेग से बिसम्भर के कामुक विचारों ने भी पेंगे मारना प्रारम्भ कर दिया है। सहसा उसकी नजर गली में जाती हुई बेला पर पड़ गई। बिसम्भर ने दूर से ही चिल्ला कर पूछा, “अरी बेलवा इतनी बारिस और बीहड़ मौसम में काहे की खातिर घरे दुवारे से बाहर निकली हो?”

बेला ने बिसम्भर की ओर बिना देखे ही चिल्ला कर जवाब दिया, “थानेदार जी तनि खेतवा की ओर जाई क है।“

ये कह कर बेला चल पड़ी खेत की ओर। और, थोड़ी ही देर के बाद बिसम्भर भी चल पड़ा बेला के खेत की ओर। बिसम्भर के पैर जितनी गति से खेत की ओर बढ़ रहे थे उससे अधिक गति से कर्मनाशा बढ़ रही थी सोनभदर की ओर।

सोनभदर के लोगों को जिस बात का भय था अंततः वही हो गया – समस्त गाँव को कर्मनाशा ने डुबोना प्रारम्भ कर दिया। कर्मनाशा के प्रचंड को शांत करने का एक ही उपाय था – बलि। पर किसकी बलि? संध्या का समय था – गाँव के लोग चौपाल पर एकत्रित हो कर इस विचार विमर्श में लीन थे कि इस बार कर्मनाशा को भोग के लिये क्या परोसा जाये। उनके इस विचार विमर्श को भंग किया चौपाल में गिरती हुई मन और तन से विक्षत बेला ने। बस पल भर में निर्णय हो गया अपवित्र और कलंकिनी बेला को कर्मनाशा को सौंपने का।

न जाने कहाँ से गली में सैकड़ों लोग आ गये – भीड़ चलने लगी कर्मनाशा की ओर सुतलियों से बंधी हुई बेला की भेंट चढ़ाने। रास्ते में ही राम खिलावन का झोपड़ा पड़ता था। शोर शराबा सुन कर बाहर आ गया। अपनी बेटी को ऐसी अवस्था में देख कर चीत्कार कर उठा। उसने गाँव वालों की कथा और अपनी बेटी की व्यथा सुनी – कुछ क्षण के लिये चुप रहा फिर अपने झोपड़े में चला गया। बाहर आया तो हाथ में कर्मनाशा की लहरों की तरह एक लम्बा सा गंडासा लहरा रहा था। भीड़ से उत्तेजित आवाज में रुकने को कहा और दौड़ पड़ा थाने की ओर।

कुछ पल बाद ही घनघोर बारिश की गिरती हुई सतहों के बीच में से राम खिलावन की काया दिखनी शुरू हुई और उसके साथ साथ गली में घिसटती हुई आ रही थी रक्तमय जीवन रहित बिसम्भर की काया। राम खिलावन ने आगे बढ़ कर बेला को सुतलियों के बंधन से मुक्त कराया, अपने कंधे से लगाया और बिसम्भर की ओर संकेत करते हुये प्रबल वाणी में कहा – ई रहा तोहार पापी और कर्मनसवा का भोग।

भीड़ ने बिसम्भर का शव उठाया और कर्मनाशा को बलि के रूप में सौंप दिया। परंतु आज कर्मनाशा असमंजस में पड़ गयी। ये कर्मनाशा की हार थी या जीत? यदि वो गाँव वालों की इस जीत को अपनी जीत मान कर उसमें सम्मलित होना चाह्ती है तो उसे गाँव में ही रहना होगा, और यदि वो गाँव छोड़ कर जाती है तो ये उसकी हार होगी अर्थात वो गाँव वालों की जीत को अपनी हार मानती है।

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2 टिप्‍पणियां:

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

आपका लखनवी अंदाज प्रभावित कर गया। आदाब अर्ज करता हूं हुजूर।
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खाने पीने में रूचि है, तो फिर यहाँ क्लिकयाइए न।
भातीय सेना में भी है दम, देखिए कितना सही कहते हैं हम।

Mridula ने कहा…

Hindi mein kuch padhe bahut din ho gaya tha!

Have you read a book by another Lucknowvi Anurag Kumar called Recalcitrance? You might like it-

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