रविवार, जनवरी 17, 2010

कमबख़्त जेबें.

ऐशबाग में रहने के कई फायदे हैं, पर जो सबसे बड़ा फायदा है वो ये है कि सुबह सुबह आँख खोलने के लिये कभी मुर्गे की बाँग या अलार्म घड़ी के टिन टिन की ज़रूरत नहीं पड़ती है। गली में सुबह छह बजे से जो हो-हल्ला और चिल्ल-पों शुरू होता है वो एक साधारण आदमी तो क्या, धतूरे के नशे में धुत्त कुम्भकरण की आँखों से नींद उसी तरह से उड़ा दे जैसे चुनाव जीतते ही नेता गण अपने क्षेत्र से गायब हो जाते हैं।

रोज़ की ही तरह आज भी गली में भौंकते कुत्तों ने और गली के नाई के रेडियो पर जोर जोर से बजते “मेरा सुन्दर सपना टूट गया...” गाने ने भारतीय जी की निद्रा को भंग कर दिया। आँख मसलते हुये भारतीय जी ने खटिया का परित्याग किया, पर आज भारतीय जी का मन कुछ खिन्न सा था। बस उसी खिन्न मन से भारतीय जी ने दातों पर दातून मसली, और कुर्ता पैंट डाल कर निकल पड़े सुबह की सैर के लिये – पर आज थोड़ा भुनभुनाते हुये कि किस गधे ने इस जगह का नाम ऐशबाग रख दिया – यहाँ न तो कोई बाग है और ऐसे शोर शराबे में भला कोई ऐश क्या करेगा।

भारतीय जी अभी पंद्रह-बीस फर्लांग ही चले होंगे कि अख़्तर मियाँ से टकरा गये। अब क्यों कि मोहल्ले में पानी की किल्लत रहती है इस लिये अख़्तर मियाँ ने पान की पिचकारी से ही गली को धोया और अपना रोज़ सुबह वाला सलाम भारतीय जी की ख़िदमत में ठोंक दिया। अख़्तर मियाँ की गली में ही छोटी सी एक दर्जी की दुकान है – अंजुमन लेडीज़ एंड जेंट्स टेलर्स। अख़्तर मियाँ हमारे भारतीय जी के सदियों से दर्जी रहे हैं; और अख़्तर मियाँ के अब्बू मुश्ताक़ ज़नाब सदियों तक भारतीय जी के पिता जी के कपड़े सिलते रहे – शायद ये संबन्ध और भी पीढ़ियों पुराना है। और, शायद इसी लिये दोनों में अगाढ़ प्रेम और अटूट दोस्ती है।


पर आज भारतीय जी चिडचिड़ाये हुये थे, और ऐसे में जो भी सबसे पहले सामने आता है उसी पर गुस्से का गुबार फूट पड़ता है। और, आज अख़्तर मियाँ का दिन था गुस्से के झोंको को झेलने का।

अख़्तर मियाँ: भारतीय ज़नाब आज किस तरफ का रुख़ है?

भारतीय जी: जहन्नुम की तरफ।


अख़्तर मियाँ: क्या हो गया मियाँ? मिज़ाज़ तो ठीक हैं?

भारतीय जी: मेरे मिज़ाज़ को क्या होगा? अपनी सुनाईये – पैंट की कटाई छंटाई कैसी चल रही है?

अख़्तर मियाँ: ऊपर वाले और आप जैसे कद्र-दानों की दुआ है। काम बढ़िया चल रहा है।

भारतीय जी: हमारे जैसे कद्र-दान ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं।

अख़्तर मियाँ: जनाब ऐसी क्या गुस्ताख़ी हो गयी हमसे?

भारतीय जी: अख़्तर मियाँ ये बताईये आप कितने सालों से मेरे कपड़े सी रहे हैं?

अख़्तर मियाँ: यही कोई बीस-तीस साल से।

भारतीय जी: पर आपको अभी तक पैंट में सही ढंग से जेबें लगानी नहीं आई। हाथ डालो कुछ निकालने के लिये तो निकलता कुछ और ही है – मुझको तो लगता है आप कोई जादू टोना फूँक देते हैं मेरी जेबों में।

अख़्तर मियाँ: अचानक पैंटों की जेबों को क्या हो गया? आज तक तो आपने ऐसी कोई शिकायत नहीं की।

भारतीय जी: क्यों कि आज तक ऐसा कोई हादसा ही नहीं हुआ।

अख़्तर मियाँ: अब पहेलियाँ ही बुझाते रहियेगा या कुछ खुलासा भी करियेगा।

भारतीय जी: अख़्तर मियाँ आप को पता है कि पिछले महिने ही पास मे एक अनाथालय खुला है?

अख़्तर मियाँ: हाँ सुना है कि ...

भारतीय जी (बात काटते हुये): बस कल शाम को उसी अनाथालय के प्रबन्धक महोदय अपने साथ बच्चों का एक काफिला ले कर मेरे घर टपक पड़े...

अख़्तर मियाँ: पर जनाब इस हादसे का मेरी पैंट सिलाई से क्या लेना देना?

भारतीय जी: अरे बीच में मत बोलिये। जो कह रहा हूँ बस सुनते जाईये। प्रबन्धक महोदय – क्या नाम था उनका – हाँ, ज्ञानदत्त शुक्ला – हाँ तो ज्ञानदत्त जी ने सबसे पहले तो दस मिनट तक मुझे ये सुनाया कि हमारे देश में कितने लाखों अनाथ बच्चे हैं जिनके लिये कोई भी, यहाँ तक सरकार भी, कुछ नहीं करती है। कैसे उनका अनाथ आश्रम ऐसे बच्चों की देखभाल करता है, स्कूल भेजता है... अरे आप सुन भी रहे हैं?

अख़्तर मियाँ: अरे आप ही ने तो कहा था कि बीच में मत बोलिये, इसी लिये चुप चाप सुने जा रहा हूँ। पर अभी तक मुझे समझ में नहीं आया है कि इसका पैंटो की जेबों से क्या...

भारतीय जी: शिवेन्द्र जी ने ये भी बताया कि अनाथ आश्रम का खर्चा पानी सामान्य नागरिकों के दान के फलस्वरूप ही चलता है – और, ये कहते कहते उन्होंने पीछे छिपे हुये कुछ एक दयनीय बच्चों को पीछे से घसीट कर मेरे सामने ला खड़ा कर दिया। फिर अपने झोले से एक पेन और रजिस्टर निकालते हुए बोले - भारतीय जी, इस अनाथ आश्रम को चलाने में हमारी कुछ मदद कीजिये और सौ, हज़ार रुपये का दान दे दीजिये। बोले – ये बड़ा पुण्य का काम है – मानवता और देश दोनों के लिये।

अख़्तर मियाँ: वो तो सब ठीक है, पर इसका पैंट की जेबों से क्या वास्ता?

भारतीय जी: अरे सुनिये भी तो। मैंने उनकी दिल खोल कर सराहना करी। फिर अपनी पैंट की बाँयी जेब में हाथ डाला। और जब हाथ बाहर निकाला तो मुट्ठी भर दया निकल आई पर ससुरा मेरा बटुआ नहीं निकला। कई बार कोशिश करी, हाथ कई कई तरीकों से डाला, पर कमबख़्त बटुआ तो जैसे कसम खा के बैठा हो कि उसे निकलना ही नहीं है। पर मियाँ गौर करने वाली बात ये है कि दया नॉन-स्टॉप निकलती रही।

अख़्तर मियाँ: अब बात कुछ कुछ समझ में आ रही है...

भारतीय जी: फिर मुझे याद आया कि दायीं जेब में कुछ रुपये रखे हैं। जब दायीं जेब में हाथ डाल कर रुपये निकालने की कोशिश करी तो जेब से ढेर सारी सराहना और तरीफों के पुल तो निकल आये पर रुपये न निकले। फिर से कई बार कोशिश करी, पर रुपये तो मानों जेब से ऐसे चिपक गये थे जैसे अमर सिंह के साथ अमिताभ। हाँ, पर सराहना निकलनी बंद न हुई।

अख़्तर मियाँ: जनाब आपको पूरा यकीन है कि इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ आपके साथ – खासकर के जब कोई आपसे पैसा माँगने आया हो...

भारतीय जी: अरे कभी नहीं मियाँ, कभी नहीं। हाँ ये बात जरूर है कि इससे पहले हमेशा लोग धार्मिक चीजों के लिये पैसा माँगने आये – कभी मंदिर निर्माण के चंदे कि लिये तो कभी माता जागरण, अखंड रामायण और पूजा पाठ जैसे पुण्य कामों के लिये। और, हमेशा मेरी जेब से भक्ति और श्रद्धा के साथ साथ बटुआ भी निकला। यहाँ तक कि चेक बुक भी निकल आई जो कि मैं कभी जेब में रख कर घूमता ही नहीं हूँ। अख़्तर मियाँ मुझे पूरा यकीन है आप जेबों पर जरूर कोई जादू टोना फेरते हो।

अख़्तर मियाँ: भारतीय बाबू ये कोई जादू टोना नहीं है। असलियत तो ये है कि आपकी जेबों में ऊपर वाले के लिये तो जगह है, पर शायद इस ज़मीन पर रहने वालों के लिये नहीं...

इसी बीच दुकान से तौकीर बाहर निकल कर आया और भारतीय जी से बोला – आपने परसों एक पैंट सिलने को दी थी। क्या कहते हैं पीछे एक हिप पॉकेट लगा दूँ?

भारतीय जी कुछ बोलते उससे पहले ही अख़्तर मियाँ बोल पड़े – अरे जा और दोंनो ओर हिप पॉकेट लगा दे। और, उनके ऊपर फ्लैप मत लगईयो, हो सके तो जेबों का साईज़ भी बड़ा ही रखना – क्या पता अगली बार इन्हीं जेबों से भारतीय जी का बटुआ निकल आये।

बात आगे बढ़ती उससे पहले ही सड़क के बीचों बीच खड़े हनुमान मंदिर के लाऊड स्पीकरों से भजनों का प्रसारण प्रारम्भ हो गया। बस भारतीय जी ने अपनी दोनों जेबों में हाथ डाला और दौड़ पड़े मंदिर की ओर माथा टेकने और नमन करने।

*****

4 टिप्‍पणियां:

Mridula ने कहा…

Atul what to say.

indscribe ने कहा…

बोहत खूब. उम्दा. लाजवाब

manisha ने कहा…

aase aase ideas aate kaise hai aapko...bahut sahi baat boli hai

D K Singh ने कहा…

सत्यवचन.भगवान के घर (मंदिर)भि अतिविशाल बनते जा रहे हैं,पर लोगो के रहने के लिये सर छुपाने कि जगह भी नही. समझ नही आता, जो सबका दाता है, उसे भला हम क्या दे सकते है?