मंगलवार, जून 02, 2009

प्रार्थना

हर वर्ष की भाँति इस बार भी मोहल्ले के लोगों ने महिने भर पहले से ही होली के साँध्य कार्यक्रमों की तैय्यारियाँ प्रारम्भ कर दीं। होली की संध्या को होने वाले कार्यक्रम विविध श्रेणियों में बाँटे जाते हैं – गायन, नृत्य, नाटक तथा वाद्य यंत्र इत्यादि। और, गायन की श्रेणी में एक उप-श्रेणी होती है पाँच से बारह साल के बच्चों की – जो कि मेरी सबसे प्रिय श्रेणी है।

मेरे पड़ोसी सिन्हा जी का दस वर्षीय पुत्र “एकाग्र” गत तीन वर्षों से इस स्पर्धा में भाग ले रहा है, परंतु सर्वथा उसे द्वतीय या तृतीय स्थान से ही संतुष्ट होना पड़ा। “होनहार बिरवान के होत चीकने पात” वाली कहावत एकाग्र पर पूरी तरह से चरितार्थ होती है – अल्प आयु से ही शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहा है, और गायन इतना मँझा हुआ है कि दिग्गजों को भी मात दे दे। मेरे विचार से तो एकाग्र मोहल्ले क्या शहर, प्रदेश और राष्ट्र स्तर की प्रतिस्पर्धा को भी सरलता से जीत सकता है। परंतु, यदि परिणाम जनमत पर आधारित हो तो गुणों के अतिरिक्त कई अन्य कारक भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। और, कदाचित इन्हीं अन्य “कारणॉ” के कारण एकाग्र प्रथम स्थान पाने से सदैव वंचित रहा।

गत वर्ष शुक्ला जी की इकलौती प्यारी सी नौ वर्षीय बिटिया गरिमा ने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। गरिमा नेत्र हीन है। और, उससे पहले साल पोलियो की मार से ग्रसित अंकुश ने प्रतिस्पर्धा जीती थी।


सारे बच्चे जी-जान से अभ्यास में लगे हुये थे इस बार प्रथम स्थान पाने के लिये। गरिमा ने लता के एक पुराने शास्त्रीय गाने का चयन किया हुआ था, और एकाग्र मन्ना डे के गीतों से लोगों को लुभाने की सोच रहा था।

होली से पहले वाली भीनी भीनी ठंढक थी, सूर्यास्त होने वाला था और मंगलवार का दिन था - मैं हनुमान जी के मंदिर की ओर निकल पड़ा। रास्ते में बाग में देखा कि एकाग्र कई बच्चों के साथ खेलने में व्यस्त है। मैंने पास जाकर पूछा, “एकाग्र, क्यों आज गाने का अभ्यास नहीं हो रहा है?”


"अंकल उससे क्या फायदा होगा। मैं जीतने वाला तो हूँ नहीं।"
"फिर भी प्रयत्न तो करना ही चाहिये।" ये कहते हुये मेरे मन में गीता के श्लोक “कर्मण्ये वाधुकारस्ते...” का ध्यान आ गया। पर जब स्वयं को ही उस पर विश्वास न हो तो बच्चे को घुट्टी पिलाना व्यर्थ ही समझा।


“आप कहाँ जा रहे हैं?”, एकाग्र ने पूछा।

“आज मंगल है। हनुमान जी के दर्शन के लिये जा रहा हूँ। साथ चलोगे? परसों ही तुम्हारी गायन प्रतियोगिता है – भगवान के समक्ष माथा टेक लो, शुभ होगा। प्रार्थना कर लेना कि बजरंग बली तुमको ही इस बार विजयी बनायें।"

एकाग्र सहमति में सर हिलाते हुये मेरे साथ मंदिर की ओर चल पड़ा। मंदिर पहुँच कर हम दोनों ने बेसन के लड्डुओं का प्रसाद चढ़ाया और हाथ जोड़ कर कुछ क्षणों के लिये प्रभु की प्रार्थना करी।

“तो एकाग्र तुमने क्या प्रार्थना की?”

“अंकल, अगर मेरी प्रार्थना स्वीकार हो गयी तो अगले वर्ष मैं ही गायन प्रतियोगिता जीतूँगा।"

"आखिर ऐसा क्या माँग लिया तुमने?”

“मैंने भगवान से कहा कि मुझे भी अंधा या लंगड़ा बना दें।"
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3 टिप्‍पणियां:

kalaam-e-sajal ने कहा…

बहुत ही सरस भाषा में लिखा गया किस्सा। सच्चाई के बहुत क़रीब।

Mridula ने कहा…

OK, so this is fiction! Or it got me worried.

बेनामी ने कहा…

Achcha vyanga hai....