गुरुवार, मार्च 26, 2009

भैय्या.

कुछ ही महिनों पहले की बात है भगवान श्री राम चंद्र जी स्वर्ग में बैठे बैठे उकता गये। सीता मैय्या से बोले, "हे सीते! मैं क्या करूँ? इतने युगों से एक ही जगह रहते रहते मन उकता सा गया है। सोचता हूँ किसी दूसरी जगह का भ्रमण कर आऊँ।"

"जैसा आप उचित समझें।", जानकी ने उत्तर दिया।


"सोचता हूँ अपनी जन्म भूमि के दर्शन कर आऊँ।" ये कहते हुये श्री राम अपनी अयोध्या यात्रा का प्रबंध करने के बारे में विचार करने लगे। श्री राम ने अभी सोचना प्रारंभ ही किया था कि श्री कृष्ण का आगमन हो गया।

"राम, आप किस विषय के बारे में सोच रहे हैं।", श्री कृष्ण ने बिना किसी विलम्ब के प्रश्न पूछ डाला।

"कुछ नहीं, सोच रहा हूँ कुछ दिनों के लिये अयोध्या का भ्रमण कर आऊँ।"

"अत्यंत ही नेक विचार है। मैं भी आपके साथ चलता हूँ - साथ ही साथ मथुरा और ब्रज के भी दर्शन कर लेंगे।"

बात अभी आगे बढ़ती कि उससे पहले ही हमेशा की तरह नारद मुनि बिना बुलाये आगंतुक की भाँति आ धमके।

"श्री राम, श्री कृष्ण, आप दोनों किस विचार विमर्श में व्यस्त हैं?"

"कुछ नहीं मुनिवर। राम और मैं अयोध्या, मथुरा और ब्रज भूमि के भ्रमण हेतु पृथ्वी लोक जाने कार्यक्रम बना रहे हैं।", श्री कृष्ण ने तत्परता से उत्तर दिया।

"हरे हरे, प्रभु प्रभु! आप लोगों को भारत भूमि के किसी और नगर में जाना चाहिये - कुछ नया कीजिये। पिछले कई युगों ने भारतीयों ने बहु-आयामी प्रगति की है। भारतीयों द्वारा की हुई प्रगति के दर्श्नार्थ हेतु आप दोनों को मुम्बई नामक नगर की ओर प्रस्थान करना चाहिये।", नारद मुनि ने भारतीय परंपरा का अनुसरण करते हुये बिन माँगी सलाह दे डाली।

श्री कृष्ण और श्री राम को नारद मुनि का सुझाव अत्यंत रोचक लगा और दोनों ने नारद मुनि से आग्रह किया कि पुष्पक विमान का मुम्बई प्रस्थान के लिये प्रबंध किया जाये।

नारद मिनु ने कहा, "प्रभु, विमान की व्यवस्था तो मैं कर देता हूँ, परंतु एक सलाह है - आप दोनों एक साधारण नागरिक के परिवेष में ही मुम्बई जायें न कि अपने दैवीय वेश भूषा और अलंकारों में।"

अंततः वो दिवस भी आ गया जब श्री राम और कृष्ण एक आम भारतीय के भाँति मुम्बई नगरी में अवतरित हो गये। प्रातः से सान्ध्य काल तक दोनों ने मुम्बई नगरी का आनन्द लिया और जब मुम्बई नगरी रात्रि के अंधकार से घिर गई तो दोनों ने एक साधारण भारतीय की भाँति लोकल ट्रेन से अपने निवास स्थान जाने का निर्णय लिया।


लोकल ट्रेन में अधिक भीड़ न थी अतः दोनों देवता खिड़की के पास बैठ गये ताकि द्रुत गामी ट्रेन की खिड़की से बाहर देखा जा सके।

ट्रेन चलते हुये अभी कुछ ही क्षण व्यतीत हुये होंगे कि सात या आठ युवकों का एक समूह दोनों देवताओं के बगल में आ खड़ा हुआ।


एक नवयुवक बोला, "ओये शाणों बाप की ट्रेन है जो खिड़की हथियाये बैठे हो?"

"वत्स, ऐसी अभद्र भाषा.."

श्री राम अपना वाक्य पूरा भी न कर पाये थे कि दूसरा युवक चिंघाड़ पड़ा, "अबे तुम दोनो साले भैय्या हो क्या?"

"वत्स ये भैय्या क्या होता है? मैं तुम्हारा तात्पर्य नहीं समझा।"

"अरे ये साले सौ परसेंट भैय्या हैं। हिन्दी तो सुनो इन सालों की। ओये शाणों नाम क्या है और किस जगह के रहने वाले हो तुम दोनों?"

"मेरा नाम राम चंद्र है और मैं अयोध्या नगरी का निवासी हूँ। और, मेरे मित्र का नाम कृष्ण है और ये मथुरा निवासी हैं।"

"मैं बोलता था न कि दोनों भैय्या हैं। अबे सालों तुम लोग यहाँ क्यों आ जाते हो हमारे महाराष्ट्र में - गंदगी फैलाने? तुम लोगों को तो मार मार कर वापस अयोध्या और मथुरा भेज देना चाहिये।"

बस ये कहते हुये "वनमानुष" निर्माण सेना के सिपाही डंडा, जूता और चप्पल ले कर पिल पड़े श्री राम और श्री कृष्ण के ऊपर। दुर्भाग्यवश धनुष, चक्र और अपनी दैवीय शक्ति के बिना हमारे देवता अपना बचाव भी न कर सके। उस दिन खूब धुनाई हुई दोनों की - वो तो भला हो भगवान का कि बस जान बच गई।

ट्रेन से उतरते ही दोनों ने त्वरित गति से मुम्बई नगरी से प्रस्थान किया और भविष्य में भारत भूमि पर वापस आने का विचार सर्वथा के लिये त्याग दिया।

अब सारी हाये तौबा का हल हमें स्वयं ही निकालना है क्यों कि भगवान भी अब भारत भूमि पर आने से रहे....
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4 टिप्‍पणियां:

manisha ने कहा…

sateek baat hai.....mere khayal se ise maharashtra ki local paper me jaroor prakashit karni chahiye.....

Manisha

Prashant Saxena ने कहा…

बहुत खूब अतुल...
अभी तक हमारी जन्म भूमि भगवान् भरोसे चल रही थी, अब वोही emmigrate कर गए तो हमारे नेता ही अपने आप को भगवान समझ कर देश की दुर्दशा कर रहे हैं!

आगली बार कुछ उपाय बताएं प्रभु - इस इन्टरनेट age में भगवान देश को remotely manage तो कर ही सकते हैं !!!

Mridula ने कहा…

Well said Atul.

Vipin ने कहा…

Bhayya,
Tumhari bhasha ki saralta kataksh ko aur sundar banaa deti hei.

Vipin