गुरुवार, दिसंबर 18, 2008

महापुरुष

लखनऊ में निवास करते हुये भी मेरा चौक की तरफ जाना यदा-कदा ही होता है। पिछले सप्ताहाँत किसी कारणवश मुझे चौक की ओर जाना ही पड़ गया। मैं चौक के अंगद के पाँव की तरह न हिलने वाले यातायात में फंसा हुआ अपने भाग्य और वाहनों की बढ़ती हुई जनसंख्या को कुशब्दों से अलंकृत कर ही रहा था कि मुझे अपने चौक निवासी परम मित्र संजय त्रिपाठी की याद आ गयी। संजय मेरा बचपन का साथी है - मेरा परम मित्र, लंगोटिया यार। परंतु दुर्भाग्यवश अपरिहार्य कारणों के कारण मैं उससे पिछले एक या दो सालों से मिल नहीं सका हूँ। सोचा आज जब चौक की ओर आ ही गया हूँ तो संजय के घर भी हो लिया जाये। संजय महात्मा गाँधी का परम भक्त, पुजारी और महात्मा की शिक्षायों का अनुयायी रहा है। संजय के जीवन में गाँधी का स्थान समस्त देवी-देवताओं और उसके स्वयं के माता-पिता से ऊपर है। मुझे अच्छे से याद है जब पिछली बार मैं उसके घर गया था तो उसके घर की बैठक की दीवारें पूरी तरह से गाँधी जी के चित्रों से ढंकी हुई थीं।

अपना व्यक्तिगत कार्य निपटा कर मैं संजय के घर की ओर चल पड़ा। घर पहुँच कर द्वार पर दस्तक दी - संजय ने स्वयं दरवाजा खोला, और मुझे सामने खड़ा देख कर पल भर के लिये जड़वत हो गया।

"और संजय क्या हाल चाल हैं?" मेरे इस प्रश्न ने जैसे उसकी निद्रा भंग कर दी हो - दौड़ कर गले लगाया और कोसा भी कि इतने दिनों तक मैं कहाँ गायब रहा। मेरा हाथ पकड़ कर अंदर की ओर खींचता हुआ बोला, "आओ यार, अंदर आओ।"

घर की बैठक में प्रवेश करते ही मुझे एक झटका सा लगा - ये क्या दीवार पर गाँधी जी का एक भी चित्र नहीं।


मैंने कौतहूलतापूर्वक पूछा, "संजय, गाँधी जी के सारे चित्र कहाँ चले गये?"

संजय ने मेरे प्रश्न का उत्तर देने के बजाय अपना टीवी चलाया और कोई संगीत प्रतियोगिता का कार्यक्रम लगा दिया।

"लो ये कार्यक्रम देखो। तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं ही मिल जायेगा।", संजय ने आक्रोश युक्त वाणी में कहा।

वैसे मैं भारतीय टीवी के कार्यक्रमों से उतना ही दूर रहता हूँ जितना कि हमारे नेता गण सच्चाई और इमानदारी से, पर मैंने बड़े संयम के साथ ये वाला कार्यक्रम पूरा देख डाला क्यों कि मुझे अपने प्रश्न का उत्तर जो खोजना था। एक घंटे के उस कार्यक्रम में बारह या तेरह युवक और युवतियों ने फिल्मी गीत गाये - कुछ ने अति सुंदर गाया, कुछ ने ठीक-ठीक और कुछ ने असहनीय। परंतु आश्चर्य की बात कि समस्त निर्णायक एवं स्वयं उद्घोषक महोदय उन प्रतियोगियों का गुणगान किये जा रहे थे जिनका गायन मेरे विचार में अपेक्षाकृत निम्न स्तर का था। और, अंत में निर्णायकों ने एक ऐसे प्रतियोगी को प्रतियोगिता से निकाल दिया जो मेरे विचार में उन निम्न स्तर प्रतियोगियों से कई स्तर ऊपर था। मुझे ये बात समझ में नहीं आई और न ही मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिला। अत: मैंने संजय से पूछ ही डाला, "ये क्या पहेलियाँ बुझा रहे हो?"

अब संजय की बारी थी और इस बार उसने अविराम कहना प्रारम्भ किया - अतुल, तुमने स्वयं देखा कि कुछ प्रतियोगियों ने कोई बहुत अच्छा नहीं गाया। फिर भी सभी निर्णायकों ने उनकी अधिक प्रसंशा की और कई अच्छा गाने वाले प्रतियोगियों की न केवल उपेक्षा की बल्कि अनावश्यक रूप से उनकी कमियों को ढूँढा। तुम्हें पता है कि जिन प्रतियोगियों के लिये तुमने कहा कि उन्होंने अच्छा नहीं गाया वो सभी पाकिस्तान से आये हैं; और वो प्रतियोगी जिन्हें अच्छे गायन के बावजूद भी फटकार मिली भारतीय हैं। मुझे ये नहीं समझ में आता है कि ये कहाँ का तर्क है कि अपने आप को महान सिद्ध करने के लिये अपने ही लोगों की उपेक्षा की जाये, और दूसरों की अनावश्यक बढ़ा चढ़ा कर प्रसंशा की जाये - उन्हें गले लगाया जाये, उनकी झोली में आँख मूँद कर सब डाल दिया जाये भले ही वो उस योग्य हों या नहीं। अतुल, मुझे पहली बार ये आभास हुआ है कि कुछ लोगों को गाँधी जी क्यों नहीं पसंद थे। हम लोग दूसरों की दृष्टि में महान बनने.....


संजय बोलता ही रहा, पर अब मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था। थोड़ा समय संजय के साथ बिता कर मैंने एक विचलित मन के साथ उससे विदा ली। पूरे रास्ते मैं बस यही सोचता रहा कि महात्मा ने जो किया क्या वो.....
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5 टिप्‍पणियां:

मयंक ने कहा…

सच कहा.....कई बार ऐसा ही लगता है

अतुल जी....एक सामुदायिक ब्लाग बना रहा हूं लखनउ पर....आप सब का सहयोग चाहूंगा...अगर आप अपनी ई मेल आई डी भेज दें तो आप सबको उससे जोड़ना चाहूंगा.....
ब्लाग का Tempelate तैयार किया है...एक बार निगाह फिराएं...........

मयंक ने कहा…

www.pahleaap.blogspot.com

विनय ने कहा…

जी हम भी लखनवी हैं

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http://prajapativinay.blogspot.com/

CS BANNA ने कहा…

Really i like this story.
i am mca qualified.
09602766732

CHATTAR SINGH RATHORE ने कहा…

I LOVE MY FAN.