मंगलवार, मार्च 13, 2007

नगाड़ा-ए-फ्रीडम

वैधानिक सूचना: यह लेख काल्पनिक नहीं है. इस लेख का कोई भी पात्र काल्पनिक नहीं है. पात्र का किसी जीवित व्यक्ति (या महिला) से मेल खाना संयोग नहीं है. पात्र की गोपनीयता को बनाये रखने के लिये सिर्फ पात्र का नाम बदल दिया गया है. इस लेख को पूरा बिना पढ़े बीच में छोड़ना धारा 911 के तहत एक जघन्य कानूनी अपराध है.

-- लेख प्रारम्भ --
कई साल हो गये हैं संयुक्त राज्य अमेरिका (संक्षिप्त में अमेरिका या अमरीका) में रहते हुये. और, इन पिछले कई सालों में बाकी की दुनिया से अनभिज्ञ अधिकतर अमरीकियों की हास्यासपद बातों को सुन कर अनसुना कर दिया. पर बेड़ा गर्क हो बिन लादेन की अमानवीय करतूत का कि सारे अमरीकी अब मिल जुल कर एक नये नगाड़े को पीटने लगे हैं. ये नया नगाड़ा है “फ्रीडम” का. हमेशा पिटाई करने को आतुर रहने वाले अमरीकी इस नये नगाड़े को जोर जोर से हर दस या पन्द्रह मिनट के बाद पीटना शुरू कर देते हैं – टीवी पर, ऑफिस और स्कूल में, और हर उस जगह जहाँ मानव जाति दिखाई दे जाती हो.

मेरे एक सहकर्मी हैं जिनका नाम है रॉब - रॉबर्ट का सक्षिप्त रूप. रॉब को भी अविराम इस नगाड़े को पीटने की बुरी लत लग गयी है. और, मेरा ऐसा दुर्भाग्य कि रॉब महाशय मुझसे मात्र बीस फीट की दूरी पर बैठते हैं. नगाड़े के शोर से मेरी सुनने की शक्ति तकरीबन 70-80 प्रतिशत क्षीण हो चुकी थी और मैने निर्णय लिया कि मैं पूरी तरह से बधिर हो जाऊँ उससे पहले ही कुछ करना पड़ेगा. अतः एक दिन सुनहरा मौका ताड़ कर मैंने रॉब के साथ सौहाद्र भाव से वार्तालाप प्रारम्भ कर दिया. लीजिये आप लोग भी उस ज्ञानवर्धी वार्तालाप का आनन्द उठाईये. सारा वार्तालाप अंग्रेजी में हुआ था, पर यहाँ पर मैं उसका हिन्दी अनुवाद थोड़ा सा नमक-मिर्च लगा कर और थोड़ा सा चाट मसाला छिड़क कर प्रस्तुत कर रहा हूँ:


मैं : रॉब, यार मुझ मूर्ख को भी जरा इस फ्रीडम के नगाड़े के महत्व के बारे में बताओ.

रॉब : सारी दुनिया अमेरिका से चिढ़ती है क्यों कि हमारे पास फ्रीडम है. हम लोग जो कर सकते हैं वो बाकी के देश के लोग नहीं कर सकते हैं. हम अपनी फ्रीडम पर हमला कभी भी बरदाश्त नहीं करेंगे.

मैं : फ्रीडम को जरा विस्तार में समझाने का प्रयास करें तो बड़ी कृपा होगी.

रॉब : हमें पूरी तरह से धार्मिक “फ्रीडम” है. हम लोग कुछ भी बोल सकते हैं, पेपर में कुछ भी लिख सकते हैं. हमारे यहाँ जनतंत्र है - हमें फ्रीडम है अपना नेता चुनने की.

मैं (कटाक्ष के साथ) : सही कह रहे हो – एक गधे को भी चुन कर... वैसे रॉब तुम जो नगाड़ा पीट रहे हो, हो सकता है कि वो चीन में बना हुआ हो.

रॉब ने अपनी डेस्क पर रखी “स्टैचू ऑफ लिबर्टी” और फहराते हुये “स्टार एंड स्ट्राईप्स” को उठा कर देखा तो उस पर “मेड इन चाईना” लिखा हुआ पाया.

रॉब : शिट (जान बूझ कर इस शब्द का अनुवाद नहीं किया गया है)

मैं : रॉब, तुमको ये क्यों लगता है कि किसी और के पास ये फ्रीडम का नगाड़ा नहीं है? या फिर किसी और को ये नगाड़ा पीटने की तमीज़ नहीं है?

रॉब (आश्चर्य से) : तो क्या दूसरों के पास भी ये नगाड़ा है? मैं ये कतई नहीं मान सकता हूँ. क्या न्यू मेक्सिको के पास ये नगाड़ा है?

मैं : पर न्यू मेक्सिको तो अमेरिका का ही एक प्रदेश है.

रॉब : ठीक है ठीक है. पर मैं ये दावे के साथ कह सकता हूँ कि न्यू इंगलैंड के लोगों को ये नगाड़ा पीटने का सौभाग्य नहीं प्राप्त होगा.

मैं : अबे भूगोल से गोल प्राणी न्यू इंगलैंड भी अमेरिका का ही भाग है.

रॉब : ओह तो तुमको भूगोल का भी ज्ञान है. खैर ये सब छोड़ो और मुझे सिर्फ एक देश का नाम बताओ जहाँ के लोगों के पास ये नगाड़ा हो और उन्हें नगाड़ा बजाने भी दिया जाता हो.

मैं : रॉब अब मैं तुम्हें एक ऐसे देश के बारे में बताने जा रहा हूँ जहाँ के लोगों के पास ये नगाड़ा तो है ही और साथ में उसको तरह तरह से बजाने के तरीके भी मालूम हैं. ये लोग इस नगाड़े को ऐसा पीटते हैं कि उसमें छेद हो जाते हैं – कई बार नगाड़ा फूट भी जाता है, पर पेबंद लगा कर और कीलें ठोंक ठोंक कर लोग फिर से जुट जाते हैं नगाड़े की धुनाई में. कोई नगाड़ा चप्पलों से पीटता है, कोई लाठी से, तो कोई हाथों से. अब तुम्हें ये तो पता ही है कि मैं भारत से हूँ – इसलिये मैं भारतीय फ्रीडम नगाड़े की बात कर रहा हूँ.

रॉब : हाँ हाँ बोले जाओ...

मैं : रॉब, तुमने धार्मिक स्वतंत्रता की बात की थी तो मुझे ये बताओ कि अमेरिका में कितने धर्मों के लोग रहते हैं.

रॉब : क्रिश्चियंस, ज्यूज़, मुस्लिम और और... (40 सेकेंड के बाद भी गाड़ी आगे नहीं बढ़ी)

मैं : अब मेरी सुनो - क्रिश्चियंस, ज्यूज़, मुस्लिम, हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, पारसी….

रॉब : ये सब क्या हैं?

मैं : ये भारत में पाये जाने वाले कुछ एक धर्मों के नाम हैं. और, हमें इन सब धर्मों के नाम इसलिये पता हैं क्यों कि हमको इन सब के बारे में स्कूलों में बताया जाता है. खैर मुझको ये बताओ कि तुमको क्रिसमस के अलावा और कितने धार्मिक पर्वों के नाम पता हैं.

रॉब : हनुकाह और क्वांज़ा...

मैं : अब ये लम्बी सी सूची सुनो – क्रिसमस, गुरु नानक जयंति, बुद्ध पूर्णिमा, महावीर जयंति, होली, दिवाली, ईद-उल-फ़ित्र, ईद-उल-जुहा, ईस्टर...

रॉब : तुमको इतने सारे त्योहारों के नाम कहाँ से मिल गये? गूगलिंग की है क्या?

मैं : मुझे ये सब इस लिये मालुम हैं क्यों कि ये सारे पर्व भारत में मनाये जाते हैं. और, भारत सरकार सभी धर्मों को एक ही स्तर पर रख कर सबके लिये छुट्टियाँ घोषित करती है. कहने को तो यू, एस. में धार्मिक स्वतंत्रता है पर क्रिसमस के अलावा और किन किन त्यौहारों की छुट्टियाँ होती हैं? भारतीय ‘फ्रीडम’ का नगाड़ा इतना बड़ा है कि कोई भी कहीं भी – नगाड़े के ऊपर, नीचे, दायें, बायें, कोने में और तो और नगाड़े के ठीक बीचों बीच मंदिर या मस्जिद का निर्माण कर सकता है. और, सरकार बिना चूं किये, मुस्कराते हुये बाकी का काम जैसे कि फ्री-वे बनाना वगैरह मंदिर या मस्जिद के अगल बगल से कर देती है.

रॉब : पर तुम लोग पिछड़ी जाति के लोगों को पीटते हो उन्हें आगे नहीं आने देते हो...

मैं : हाँ ये तो है. पर ये भी तो फ्रीडम है जो उच्च जाति के लोगों को मिली है. ठीक उसी तरह की फ्रीडम जो यहाँ गोरों को मिली है – किसी भी काले या भूरे को पीट दो, कालों के चर्च जला डालो, कालों को सिर्फ जैनिटर (सफाई करने वाला) और ड्राईवर जैसे निम्न स्तर के काम दो. अब ये बताओ कि अमरीका में कभी कोई अश्वेत या किसी दूसरे धर्म का राष्ट्रपति हुआ है? भारत में हिन्दु, मुस्लिम, सिख और पिछड़ी जाति के लोग राष्ट्रपति बन चुके हैं. और, एक गोरी महिला भी...

रॉब : पर ‘न्यूज़ पेपर्स’ को कितनी फ्रीडम है?

मैंने तत्परता से रॉब को ‘टाईम्स ऑफ इंडिया’ ‘इंडियन एक्स्प्रेस’ और ‘हिन्दुस्तान टाईम्स’ के वेब पते दे दिये. इन समाचार पत्रों की भाषा और समाचार की विविधता को देख कर रॉब बेचारे की बोलती बंद हो गयी. अब ऊँट पहाड़ के पास आना शुरू हुआ था. मैंने घाव पर नमक छिड़कते हुये कहा -

मैं : भारतीय नगाड़े ने तो इतनी ‘फ्रीडम’ दे रखी है कि हम लोग मनोरंजन के लिये कुछ भी तोड़ और जला सकते हैं. और तो और अगर और मजा लेना है तो किसी दूसरे समुदाय के लोगों को पकड़ कर लतिया भी सकते हैं. बात करते हो ‘फ्रीडम’ की. यू.एस.ए. में तो हर किसी की ‘फ्रीडम’ को दुनिया जहान के नियमों से बाँध कर रखा हुआ है. न तो मैं सड़क के उल्टी ओर कार चला सकता हूँ. मन हो भी तो कंटिया डाल कर बिजली चोरी नहीं कर सकता हूँ. कितना मन करता है कि गेरू से दीवारों पर लिख डालूँ – “गली गली में शोर है, बुश झूठा और चोर है.” या “आई. टी. समस्या? मिल तो लें टाटा और विप्रो से.” या फिर “गदहे पर मुहर लगायें, डेमोक्रेट्स की सरकार बनायें” – पर ये सब करने की फ्रीडम कहाँ है अमरीका में? अरे क्रिसमस के अलावा किसी और धर्म के त्योहारों की छुट्टी होती है यहाँ?. कटु सत्य तो ये है कि अमरीका एक इसाई देश है. और, मानो या न मानो ईराक की लड़ाई के समय यहाँ के समाचार पत्रों को भी असलियत छापने की कोई फ्रीडम श्रीडम या हिम्मत नहीं थी. असलियत छपने वालों और कहने वालों को तुम्हारे जैसे लोग गद्दार कह कर पुकारने लगे – ये तो वही बात हुई कि तुमको हर चीज़ कहने और करने की फ्रीडम है अगर वो मुझको पसंद आये. अब मेरे सामने कभी अपना ये ‘फ्रीडम’ वाला नगाड़ा मत पीटना वरना मैं दस गुना ज्यादा डेसिबल वाला इंडियन नगाड़ा पीटने लग जाऊँगा – समझे?

अब तक तो रॉब के ज्ञान चक्षु पूरी तरह से खुल चुके थे पास आकर कहा, “नगाड़ों को मारो लात. चलो आज लंच में ‘टेस्ट ऑफ इंडिया’ चलते हैं..”

लखनवी खड़ा बजार में, खोले सबकी पोल,
तोड़े सबका नगड़वा और फोड़े सबकी ढोल.
(कबीरदास के दोहे से प्रेरित)


-- लेख समाप्ति --
*****

16 टिप्‍पणियां:

Raviratlami ने कहा…

"...शिट (जान बूझ कर इस शब्द का अनुवाद नहीं किया गया है)..."

हा हा हा --- अंग्रेज़ी में यह अभिजात्य वर्ग की वस्तु का सा आभास जो देता है.

पारंपरिक व्यंग्य से एक कदम आगे है यह रचना.

Tarun ने कहा…

हमेशा पिटाई करने को आतुर रहने वाले अमरीकी अपने बच्चों को पिटते ही अंदर हो जाते हैं, ये तो आपको पता ही होगा

क्या नगाडा फोडा है मजा आ गया, हमें भी गाहे बगाहे ऐसे ही नगाडे कभी कभी बजाने पडते हैं

आशीष ने कहा…

दूधारी तलवार वाला व्यंग्य ! एक साथ विश्व के दोनो सबसे बडे लोकतंत्रो को धो दिया आपने !

वैसे हमारी भी एक बार एक अमरीकन महिला(करेला उपर से नीम चढा) से बहस हो गयी थी। उसका कहना था "जब सभी अमरीका से नफरत करते है तो भी वे अमरीका क्यों आना चाहते है !"
हमारा जवाब था "ये आपको सोचना चाहिये क्यों सभी आपसे नफरत करते है ? ये आपको सोचना चाहिये कि क्यों एक अमरीकी दूनिया के किसी भी कोने मे सुरक्षित नही है ?"

संजय बेंगाणी ने कहा…

दोनो लोकतंत्रो का नगाड़ा फोड दिया!
मस्त लिखे हो.
भारत जैसी आज़ादी कहाँ? :)

Pratyaksha ने कहा…

बहुत बढिया । सब कह दिया !

Shrish ने कहा…

धारा 911 के कारण पूरा लेख पढ़ना पढ़ा जी। :)

सच कहा - ऐसी आजादी और कहाँ

Jitendra Chaudhary ने कहा…

झक्कास! धो डाला।

हम प्रवासियों को ऐसे कई कई वाकियों से दो-चार होना पड़ता है। मेरे को सफ़र मे कई लोग एंटी इन्डिया डिसकशन करके 'सफर' कराते रहते है। कई बार तो ऐसे जवाब ढूंढने पड़ते है कि इनकी बोलती बन्द हो जाए, लेकिन कई बार चुप-चाप मुस्कराकर टालना पड़ता है।

लखनवी भाई, लगातार लिखा करो यार! इन्तज़ार खलता है।

नीरज दीवान ने कहा…

वाह.. वाह.. गुलज़ार हो गया ब्लॉगजगत. एक हंसोड़ और हमारे बीच घुस गया. बेहतरीन व्यंग्य है.

गिरिराज जोशी "कविराज" ने कहा…

आपने शाबित कर दिया है कि अनुराग श्रीवास्तव आपके अनुज है, रिस्ते में भी और हास्य में भी।

अब तक मैं तो उन्हें ही हास्य-गुरू मान रहा था, आपसे मिलकर अब शंका होने लगी है. पहली बार आपके चिट्ठे पर आया हूँ और पेट पकड़कर जा रहा हूँ।

आप दोनों भाई मिलकर हास्य को पेटेंट करवा लिजिये :)

Shrish ने कहा…

अच्छा तो ये बात है, हम भी कल हैरान हो रहे थे, दोनों चिट्ठों का रंग-रुप एक, लेखन शैली बिल्कुल एक। तो यहाँ बड़े मियाँ छोटे मियाँ का चक्कर है।

miredmirage ने कहा…

वाह! अति सुन्दर ! आनन्द आ गया पढ़ कर ! भाई लिखते रहिये और लोगों की आँखे भी खोलिए और ऐसे खोलिए कि कड़वी सचाई हास्य की चाशनी में पगी हो । आपका लिखा पहली बार पढ़ रही हूँ । क्या क्या पापड़ नहीं बेले इसे पढ़ने में ! फिर आपने कहा भी था कि पूरा पढ़ना आवश्यक है । तो भाई पूरा पढ़ा । दाएँ हाथ में दर्द के कारण बाएँ हाथ से कमप्यूटर का चूहा पकड़ रखा है । खराब व धीमे कनेक्शन के कारण सबके लेखों को झटपट कॉपी पेस्ट किया । और अब टिप्पणियाँ लिख कर एक बार फिर कनेक्शन का यत्न करूँगी । आशा है सफल हो जाऊँगी ।
घुघूती बासूती
ghughutibasuti.blogspot.com

Dilmohan ने कहा…

Very nice. There have been some 'kalakaar' like these with me also. Fortunately they are in minority. How do I write these comments in Hindi ?

अनूप शुक्ला ने कहा…

बेहतरीन लेख! बधाई! ऐसे ही लिखते रहें!

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

रॉब जैसे लोग विश्व के सभी देशों में मिल जाते हैं, जो सच्चाई से मुंह मोड़, आँखें मूंदे अपनी महानता का भोंपू और नगाड़ा बजाते रहते हैं. सुर ताल थोड़े बदले हुये होते हैं पर लय वही होती है.

क्या आपने इन्हें अमरीका के अतिरिक्त और कहीं नहीं देखा?

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत खुब और इसे थोक की पहली किश्त मान वोट दे आना. हा हा. बहुत खुब लिखते हो, मजेदार. जारी रहो, लिखते रहो, भले वोट न दो. मगर दे ही दो, यार!!

manisha ने कहा…

blog parna shuru kiya to yakin nahi huya ki "lahkanawi'ka blog hai ye dhuaadar Hindustan ki tarife...par aant me poll(hindi me ) khul gayi.....par baat bilkul sacha bole kai nagara......sochane wali baat ye hai ki kisko kitni freedom deni chahiye....America ne freedom di hai par utni hi jitni jaroori hai..par bhaiya "Hamara Bharat "to mahan hai freedom ke naam par bawal karte hai...hai nahi to.....parkar bahut maza aaya