मंगलवार, मार्च 13, 2007

शाबाश जनार्दन

जनार्दन मिश्रा पूरे ढाई साल के बाद अवकाश लेकर न्यू जर्सी से आजमगढ़ पहुँच ही गया. अगले दिन ही भारतीय मुद्रा की आवश्यकता पड़ी तो चौराहे पर स्थित इलाहाबाद बैंक की शाखा में जा पहुँचा. कोने में लकड़ी के एक काऊंटर पर तरह तरह के फॉर्म बिखरे पड़े थे. छितरे पड़े फॉर्मों के ढेर में से जनार्दन ने पहचाना हुआ सा एक गुलाबी रंग का फॉर्म खींच कर निकाला और जेब से कलम निकाल कर भरना शुरू कर दिया. पैसे निकालने वाला फॉर्म भरे हुये जनार्दन को अरसा हो गया था फिर भी अपनी ओर से उसने फॉर्म को ठीक से और पूरी तरह से भर डाला.

फॉर्म लेकर सामने की खिड़की पर पहुँचा, सलाखों और शीशे की दीवार में बने छोटे से छेद में हाथ डालते हुये उसने कटघरे के भीतर बैठे बैंक कर्मचारी की तरफ फॉर्म सरकाया और विनम्रता से कहा, “भाई साहब पैसे निकलवाने हैं.”

कटघरे के भीतर बैठे कर्मचारी श्री सदानन्द सिंह ने फॉर्म हाथ में लिया, ऐनक को नाक के ऊपर सरकाया, फॉर्म पर एक सरसरी नजर दौड़ाई और उसे वापस खिड़की की तरफ फेंकते हुये कहा, “पैसा निकलवाना है तो फॉर्म तो जरा ठीक से भरो.”

जनार्दन ने फॉर्म उठाया, जाँचा परखा और सिंह साहब से पूछने का दुस्साहस कर डाला, “भाई साहब फॉर्म तो ठीक से भरा है. इसमें गलती क्या है जरा बतायें.”

सिंह साहब ने क्षुब्ध होते हुये जनार्दन की तरफ देखते हुये कहा, “शकल से तो पढ़े लिखे लगते हो, पर फॉर्म तक भरना नहीं आता है. ठीक से देखो आज की दिनाँक नही भरी है. वो कौन भरेगा.” ये कहते हुये सिंह साहब ने अपनी कुर्सी खिसकाई और चल पड़े शायद मूत्र त्याग या जलपान के लिये.

जनार्दन ने सोचा बस इतनी सी बात और ऐसा जवाब. खैर, जेब से पुनः कलम निकाली और जल्दी से फॉर्म पर दिनाँक भर कर उसे खिड़की के भीतर सिंह साहब की तरफ सरका दिया. पर सिंह साहब तो नदारद थे. जनार्दन के पास और कोई चारा नहीं था इसलिये वहीं खड़ा हो कर सदानन्द सिंह की प्रतीक्षा करने लगा.

जब पूरे पाँच मिनट व्यतीत हो गये तो जनार्दन ने बगल की खिड़की पर बैठे खरे जी से पूछ ही डाला, “ये सिंह साहब कहाँ चले गये? कितनी देर में वापस आयेंगे?”

तुरंत जवाब भी मिल गया, “ये तो सिंह साहब ही जानें कि वो कब तक वापस आयेंगे. अरे जायेंगे कहाँ? गये होंगे शौचालय वगैरह. थोड़ा इंतजार कीजिये.” ये कह कर खरे जी ने पतलून की जेब से अपना मोबाईल फोन निकाला और नंबर दबा कर उसे अपने कान से चिपका लिया.

पूरे दस मिनट के बाद सिंह साहब अपने कटघरे में अवतरित हुये, जनार्दन के हाथ से लटकता हुआ फॉर्म खींचा, नीचे मुंडी झुका कर आधा मिनट तक कुछ किया और फिर जनार्दन की तरफ मुँह उठा कर कहा, “आपके खाते में तो पिछले ढाई साल से कोई ट्राँज़ैक्शन हुआ ही नहीं है. जरा जल्दी जल्दी बैंक आया करिये वरना हम आपका खाता बंद कर देंगे.”

अब तक जनार्दन भी थोड़ा थोड़ा झल्ला गया था. बस बोल पड़ा, “क्यों? खाता क्यों बंद कर देंगे. बैंक खाते को बनाये रखने का शुल्क लेती है.”

एक सच्चे भारतीय कर्मचारी की तरह सदानन्द को अब तक ग्राहकों से नाहक बहस लड़ाने का अच्छा अनुभव प्राप्त हो चुका था, तुरंत भौंक पड़ा, “देखिये आपके खाते में इतने पैसे नहीं हैं कि उसे खुला रखने की जहमत उठाई जाये. और, आपसे जितनी शुल्क ली जाती है वो भी इस मुसीबत के लायक नहीं है. हम तो आपका खाता बंद ही कर देंगे.”

जनार्दन ने बहस करना उचित नहीं समझा और सिंह साहब से तुरंत पैसे देने का आग्रह किया. सिंह साहब ने गुलाबी फॉर्म पर अपने हस्ताक्षर किये, ठप ठप कर के दो या तीन मुहरें लगाईं, फॉर्म को एक नोटबुक के बीच में खोंसा और जनार्दन के हाथ में पीतल का एक टोकन थमा दिया.

जनार्दन एक कोने में खड़ा हो कर प्रतीक्षा करने लगा उस नोटबुक के अगले पड़ाव तक पहुँचने की. पर नोटबुक न्यूटन के नियम का पालन करने के लिये बाध्य थी – जड़त्व के कारण अपनी जगह से एक सूत भी नहीं खिसकी और वाह्य बल भी नदारद था. जनार्दन ने एक बनावटी मुस्कान अपने चेहरे पर चिपका कर सदानन्द सिंह से कहा, “मुझे जरा जल्दी है. पैसे कितनी देर में मिल जायेंगे.”

सदानन्द ने बेमन से उत्तर दिया, “बस जैसे ही ये नोटबुक चौबे जी के पास जायेगी और वो आपका फॉर्म पास कर देंगे.”

“पर ये नोटबुक तो पिछले सात-आठ मिनट से आपके ही पास पड़ी हुई है.”, जनार्दन ने थोड़ा सा शिकायती लहजे में कहा.

“देखिये नोटबुक ले जाने वाला लड़का अभी चाय लेने गया है. वो जैसे ही वापस आयेगा ये नोटबुक चौबे जी के पास पहुँचा दी जायेगी.”, सिंह साहब ने स्तिथि का खुलासा किया.

“पर चौबे जी की मेज तो आपके ठीक पीछे ही है. आप ही हाथ बढ़ा कर नोटबुक उनकी मेज पर रख दीजिये. या तो कहिये मैं ही नोटबुक उठा कर उनको दे आऊँ.”, जनार्दन ने बेवजह धृष्टता दिखा डाली.

इस बार सदानन्द ने कोई उत्तर नहीं दिया और जान बूझ कर जनार्दन की अवहेलना करते हुये बगल में बैठे हुये खरे जी से उत्तर प्रदेश सरकार में फैले हुये भ्रष्टाचार पर वार्तालाप प्रारम्भ कर दिया.

अब तो अति ही हो गयी. जनार्दन की सहन शक्ति भी जवाब दे गयी और झुँझला कर वह स्वयं से ही कह उठा – महा निकम्मे और कामचोर हैं इस देश के लोग. कोई भला नहीं हो सकता इस देश का...

सदानन्द के तेज कानों को जनार्दन का बुदबुदाना सुनाई दे गया. बस उसके अंदर देश प्रेम का ज्वार फूट पड़ा और अपनी कुर्सी से उठते हुये कहा, “क्या बकवास करता है तू. ये देख.” ये कहते हुये सदानन्द ने मेज की दराज से एक डेढ़ फुट लम्बा सूजा निकाला और चार सेकेंड के अंदर अंदर उसे अपने दोनों गालों के आर पार कर दिया. फिर, गालों के बाहर निकले सूजे के दोनों सिरों पर एक एक किलो के पेपर वेट धागे से लटका दिये.

अब सदानन्द के पीछे बैठे चौबे जी को भी ताव आ गया. झट से अपने बालों को कोने में पड़ी एक मजबूत रस्सी से बांधा और रस्सी के दूसरे सिरे को ऊपर लटके पंखे पर बांध कर अपने आप को पंखे से लटका लिया. चौबे जी के कहने पर खरे साहब ने पंखा चालू कर दिया और चौबे जी अपने बालों के माध्यम से पंखे से लटकते हुये गोल गोल घूमने लग गये.

जनार्दन बेचारा ऐसे जान लेवा कारनामे देख कर हक्का बक्का रह गया. अचानक कहीं से एक आवाज आई – हम में है कुछ कर दिखाने की लालसा. हमारे लिये नामुमकिन कुछ भी नहीं. ये है इंडिया. शाबाश इंडिया. और, साथ ही साथ एक गीत भी शुरू हो गया – कुछ कर दिखाने की उमंग से चलो.... शाबाश, शाबाश, शाबाश इंडियाआआआआ....

खड़े हुये ग्राहक भी झूम झूम कर लय में तालियाँ बजाने लगे. सभी की नजरें एक प्रश्न वाचक चिन्ह के साथ जनार्दन पर केन्द्रित हो गयीं – बोलो, अब क्या कहते हो?

जनार्दन ने झुंझलाते हुये कहा – ये सब तो अपनी जगह ठीक है पर मुझे तो अभी तक पैसे नहीं मिले हैं. और, शाबाश इंडिया तो समझ में आ गया, पर भारत के क्या हाल हैं?

भीड़ में खड़े पान चबाते हुये एक ग्राहक ने पीक की पिचकारी से कोने की दीवार को रंगते हुये अपना मुँह खाली किया और सबसे कहा, “अरे ये तो कोई सर फिरा लगता है. इसकी बातों का कोई सर पैर नहीं है.”

तमाशाबीन लोग धीरे से वहाँ से खिसक गये और जनार्दन पीतल के टोकन को हवा में उछालते हुये फिर से नोटबुक और अपने फॉर्म के गतिमान होने की प्रतीक्षा करने लगा.
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5 टिप्‍पणियां:

Soumya ने कहा…

mere paas shabd nahi hain yeh bayan karne ko ki yeh post kitna sachhai ke kareeb hai ... this happens definetly in india

vivek ने कहा…

galti sari janardan ki hai...azamgadi jo tehra....nayi dilli ki branch main NRE account HFDC ya ICCI mai khulwana tha.....barhaal, bhaiya woh din yaad aa gay jab ME ki fellowship ke 800 rupiyee ke liye bank ki kidkion ke chakkar lagate the or khakhi wardi wale chaprasi ke haath main uthai notebook ka nazron se peecha karte the.......well written.....

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

"ग्राहक ईश्वर तुल्य है." अब जैसे ईश्वर कभी दिखाई नहीँ देते वैसे ही ग्राहक का अस्तित्व भी दिखाई नहीँ देता. अधिकतर लोगोँ के लिये ग्राहक सिर्फ तब तक भगवान का रुप है जब तक वह कुछ खरीद नहीँ लेता उसके बाद वह मात्र एक सरदर्द है. "शक्ल से तो पढे लिखे दिखते हैँ, फार्म तक नहीँ भर सकते", "कल आइयेगा आज हम बहुत बिज़ी हैँ", "साहब दौरे पर हैँ.", "अगर आप खुश नहीँ हैँ तो अपना खाता बन्द कर दीजिये, एक ग्राहक के चले जाने से हमारा बैँक बंद नहीँ हो जायेगा (ना ही हमारी नौकरी जाएगी)." यह सब 'डायलाग' बडे जाने पहचाने से हैँ और बहुत झुँझलाहट पैदा करते हैँ. विडम्बना यह है कि यह सुनने के बाद आस पास खडे लोग भी आप ही को दोषी ठहराते हुये बडबडायेँगे - पता नहीँ कहाँ कहाँ से चले आते हैँ, हमारा टाइम भी वेस्ट किया, हुँह....."

manisha ने कहा…

Bharat ki jeeti jagti tasweer kheech dali aapne.......ek aam Bhartiya jo 10 saalo se desh se door hote huye bhi Bharat ko bahut kareeb se pahchana hai....par un Bhartiyo ka kya jo rooz in samasyayo ko dekhate huye bhi use theek karne ki koshish nahi karte....galti grahako ki hi hai .....

Anoop Kumar ने कहा…

Bhaiya tasweer to theek khinchi hae lekin bahar rah ke lagata hae ki bharitya sudhar nahi rahe hae. bhaiya yahan rah ke koi mai ka lal kuch sudhar kar ke dikhawae? thoda bahut sudhar raha hae lekin abhi time lagega.