मंगलवार, मार्च 13, 2007

परीक्षा

लगभग आठ सौ वर्ष पूर्व उत्तराष्ट्र नामक राज्य पर अतुल्यबोध का राज्य था. अतुल्यबोध एक अत्यंत ही न्यायप्रिय एवं कुषाग्र बुद्धि वाला शाशक था. कहा जाता है कि ऐसी जटिल समस्यायें, जिनका हल स्वयं भगवान भी करने में असमर्थ होते थे, उन्हें अतुल्यबोध पलक झपकते ही सुलझा दिया करता था. उत्तराष्ट्र में सभी धर्म और जाति के लोग शांति पूर्वक, मिल जुल कर सांप्रदायिक सौहाद्र की भावना के साथ रहते थे. अतुल्यबोध के गुणों की प्रसंशा न केवल उत्तराष्ट्र के नागरिक वरन समस्त पड़ोसी राज्य तथा स्वयं देवी देवता भी किया करते थे.

स्वभावानुसार असुरों से अतुल्यबोध का यशगान सहा नहीं गया और असुरों के राजा बालखारी ने अतुल्यबोध को नीचा दिखाने का उपाय ढूँढना प्रारम्भ कर दिया. बाकी के असुरों से विचार विमर्श करने के उपराँत बालखारी ने धर्म को अपना अस्त्र बना कर अतुल्यबोध के विरुद्ध अपना षड़यंत्र रचा. उसने उत्तराष्ट्र के रघुकुलपुरी नगर में राक्षस तैयबखारी को मुस्लिम समुदाय और राक्षस बाकरे को हिन्दू समुदाय का प्रतिनिधि बना कर भेज दिया.

तैयबखारी ने मुस्लिम समुदाय के दिशाहीन और अनपढ़ युवकों का एक दल बना कर नगर के बाहर स्तिथ एक प्राचीन भवन को मस्जिद का रूप दे दिया. बाकरे इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था. उसने भी कुछ दिशाहीन और अनपढ़ हिन्दू युवकों को हथौड़ों और फावड़ों से लैस कर के मस्जिद पर धावा बोल दिया. कुछ ही क्षणों में पूरा भवन पूरी तरह से ध्वस्त हो गया. तैयबखारी ने बाकरे और समस्त हिन्दू समुदाय पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक मस्जिद को तोड़ा है और अतुल्यबोध से आग्रह किया कि समस्त अपराधियों को उचित दंड दे कर उस स्थान पर एक नयी मस्जिद का निर्माण करवाया जाये. बाकरे ने भी तैयबखारी और मुस्लिम समुदाय पर आरोप लगाया कि उन्होंने एक प्राचीन हिन्दू भवन को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया था. बाकरे का कहना था कि उसके अनुयायियों ने उचित कार्य किया है और अब अतुल्यबोध को उस स्थान पर एक मंदिर का निर्माण करवाना चाहिये.

तैयबखारी और बाकरे दोनों ही अतुल्यबोध के समक्ष अपनी अपनी माँगें लेकर उपस्तिथ हो गये. अतुल्यबोध के सामने एक जटिल समस्या खड़ी हो गयी – उस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया जाये या मस्जिद का या दोनों का? अतुल्यबोध की यह स्तिथि देख कर असुरों के बीच हर्ष की लहर दौड़ गई.

अतुल्यबोध ने तैयबखारी और बाकरे को अगले दिन राजदरबार में उपस्तिथ होने के लिये कहा और ये अश्वासन दिया कि कल तक इस समस्या का हल अवश्य ढूँढ लिया जायेगा.

अगले दिन जब तैयबखारी और बाकरे अतुल्यबोध के समक्ष पहुँचे तो अतुल्यबोध ने अपना निर्णय सुनाया:

इस प्रकार की समस्यायें तभी उठती हैं जब लोगों के बीच अज्ञानता, अशिक्षा और धर्माँधता का निवास हो. मेरा ऐसा विचार है कि ज्ञान और विज्ञान की उचित शिक्षा ही ऐसी समस्यायों का निवारण कर सकती है. धर्म का अपना महत्व है परंतु मेरे विचार से उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उच्चतर श्रेणी की शिक्षा प्राप्त करना ताकि हम दूसरे लोगों को समझ सकें और विज्ञान के माध्यम से मानव पीड़ा और अंधविश्वासों को दूर कर सकें. जिस स्थान पर आप लोग मस्जिद या मंदिर बनवाने का आग्रह कर रहे हैं वहाँ इतनी जगह नहीं है कि एक विद्यालय की स्थापना की जा सके अतः मैंने ये निर्णय लिया है कि वहाँ पर एक उच्च स्तर के पुस्तकालय का निर्माण करवाया जाये. इस पुस्तकालय में देश विदेश से कला, साहित्य, विज्ञान और तकनीकि की पुस्तकें मँगवा कर रखी जायेंगी और सभी धर्म, जाति और समुदाय के लोगों को निःशुल्क प्रवेश दिया जायेगा. बाकी के बचे स्थान में सुलभ शौचालयों का निर्माण करवाया जायेगा ताकि यात्रियों और एक आम नागरिक को बाग बगीचों और राजमार्ग का दुरुपयोग न करना पड़े.

अतुल्यबोध का ये निर्णय सुन कर तैयबखारी और बाकरे के साथ साथ समस्त असुरों के मस्तक लज्जा से झुक गये. सभी देवी देवताओं और असुरों ने मिल कर अतुल्यबोध के इस उचित तथा व्यावहारिक निर्णय पर शंख नाद करते हुये पुष्प बरसाये. और, एक बार पुनः उत्तराष्ट्र में शाँति की स्थापना हो गई.
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6 टिप्‍पणियां:

Tarun ने कहा…

I believe that the majority of the indian communities will agree with a similar solution to our age-old Babri Masjid issue in Ayodhya. I could be wrong though!

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

बाकी सब तो ठीक है, लेकिन यह 'सुलभ शौचालय' वाली बात जमी नहीं!

देखिये, प्रकृति की गोद में बैठ कर पेट हलका करने का एक अलग ही आनंद है। धरा का फैला विस्तार, ऊपर खुला आकाश नीचे हरी भरी दूब यह आनंद सुलभ शौचालय में कहां आयेगा। फिर ऊपर से जब आप भीतर बैठ पेट हलका कर रहे होंगे तो कोई कमबख़्त आ कर किवाड़ भी पीटने लगेगा - अबे जल्दी निकल मुझे बडी ज़ोर की आयी है। मतलब कि 'यह' काम भी सुकून से ना हो पायेगा और दिन भर पेट गुड़गुड करता रहेगा।

सड़क के किनारे करने के लाभ बहुत हैं 1) आती जाती गाड़ियों की आवाज़ के बीच आपके स्वर मिल जाएगे - कोई एमबारेस्मेंट नहीं होगा। 2) धरा को मुफ़्त की खाद मिल जायेगी 3) जल निगम वाले इसको री-सायकिल करके वापस घरों के बम्बों में पम्प नहीं कर पाएगे 4) नदियां प्रदूषण से बचेगी 5)सुलभ शौचालय में आपको पेट हलका करने का जो 1 रुपया देना पड़ता है वह भी बचेगा।

आपका लेख पढ़ कर लगता है कि आप पाश्चात्य जीवन शैली से इतना प्रभावित हो गये हैं कि अपने देश की पांच हज़ार साल पुरानी महान परंपराओ और रीतियों ताक पर रख कर पश्चिम का अंधानुकरण करने की सलाह दे रहे हैं। भला बताइये हम पांच हजार सालों से सरकारी संपत्ति पर मल-मूत्र-थूक-पीक त्याग करते आ रहे है - हम 'टायलेट' में क्यों जायें? क्या यह हमारी महान परंपरा के दिखाये रास्तों से पलायन नहीं होगा।

यदि सडक पर यह परिचित दृश्य नहीं होगा तो "लखनऊ विकास प्राधिकरण" यह बोर्ड कैसे लगाएगा -

"मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं।" :-)

SANJIVA ने कहा…

भाई अतुल "सुलभ शौचालय़ " 21 वी शताब्दी की देन हे, बिंडदेश्वरी पाठक की. फिर यह 800 सो साल पहले कैसे आ सकता हे. जरा गौर फरमाये.

सागर चन्द नाहर ने कहा…

लखनवी जी
काश सारी समस्याएं इतनी आसानी से सुलझ जाती!
अनुराग जी के सुझाव भी शोचनीय ( "शो" पर ओ की मात्रा एक ही आती है ना ?) है।

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

यह भी बढ़िया है :) राय "सोचनीय" नहीं वरन् "शौचनीय" है! :D

आशीष ने कहा…

स्थीती सचमुच मे "शौचनीय" है !