मंगलवार, मार्च 13, 2007

गिलौरियाँ.

नौबस्ता निवासी मेरे परम मित्र बिल्लू भैय्या के सिर्फ दो अदद ही शौक हैं – खाना खाने का और फिल्मी गाने सुनने का. रविवार का दिन था, काम धाम कुछ था नहीं और रेडिओ पर हिंमेंशं रेंशंमिंयाँ के नकहे गाने बज रहे थे – भला हो कि घर से कोसों दूर कोई कब्रस्तान नहीं था वरना हिंमेंशं के कर्ण भेदी गायन से परेशान हुये मुर्दों से बचने के लिये मुझे कुकरैल वाले भूतनाथ बाबा की शरण में जाना पड़ता. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई और दरवाजा खोलने पर कत्थे से सने हुये दातों की खीसें निपोरते हुये बिल्लू भैय्या के दर्शन हुये.

एक सच्चे भारतीय मित्र की परंपरा निभाते हुये बिल्लू भैय्या बिना कुछ कहे सुने सीधे अंदर घुस आये, सोफे पर अपने आपको जमाया और दातों पर जमा हुये पान के लेप को मुँह में उँगली घुमा कर जबान पर गिराते हुये कहा, “अमाँ जरा कुछ ठंडा पिलाना. पेप्सी वेप्सी रखे हो फ्रिज में.”

मैने भी दोस्ती निभाते हुये कहा, “वेप्सी तो नहीं है. पेप्सी लाता हूँ और कहो तो खाने के लिये चूहे मारने वाली दवा भी साथ ले आऊँ. अबे तेरे लिये तो साँड़ मारने वाले गोलों की जरूरत पड़ेगी. बको कैसे आना हुआ.”

बिल्लू भैय्या ने पतलून की जेब में हाथ सरकाया और नोटों की एक गड्डी मेज पर पटक दी. करीब दस या पंद्रह हजार रुपये रहे होंगे. बिल्लू भैय्या ने घोषणा की, “यार कल मेरे जैसे मनहूस की भी किस्मत खुल गयी. कुछ एक दिन पहले जगदम्बे लॉटरी का एक टिकट लिया था – कल मेरा बीस हजार रुपये का इनाम निकल आया. अब फ़टाफ़ट थोड़ी ढंग की शर्ट और पतलून चढ़ा ले, बालों में कंघी मार ले और चल मेरे साथ ऐश करने.”

“पर मियाँ क्या करने का इरादा है?” मैंने मेज पर से गिलास हटाते हुये पूछा.

बिल्लू भैय्या जैसे जवाब देने को तैय्यार ही बैठे थे, “यार मैं तो सिर्फ खाने और गाने का ही शौक रखता हूँ. चलो आज चल कर तरह तरह के पकवान खाते हैं – ढाबे से लेकर पाँच सितारा होटेल तक. खाते जाओ जब तक पेट सुअर के पेट की तरह न फूल जाये.”

“पर अभी तो सुबह का सिर्फ नौ बजा है.”

“कोई नहीं सुबह के नाश्ते से ही शुरुआत करते हैं.” बिल्लू भैय्या ने कार की चाभी हाथ में घुमाते घुमाते कहा.

खैर हम दोनों निकल पड़े लॉटरी में जीते हुये पैसों का सदुपयोग करने के लिये. पहला पड़ाव नेतराम की दुकान. पहले एक आध किलो कड़ाही से गरम गरम निकल रही देसी घी की जलेबियों का भोग लगाया गया, फिर आलू वाली कचौड़ियों की मोटी परत जमायी गयी और अंत में मुँह में बचे खुचे खाने को मलाई दार लस्सी के जरिये पेट में पहुँचाया गया.

इसी तरह पूरे दिन हम दोनों हब्शियों की तरह ढाबे ढाबे और रेस्ट्रॉ रेस्ट्रॉ जाकर पकवानों का लुत्फ उठाते रहे – क्लार्क अवध में आलीशान लंच, बेकर्स हट में पेस्ट्री, शर्मा जी की चाट, राम आसरे के मलाई पान, चौधरी का मिल्क बादाम और शाम को जेब में छेद कर देने वाला ताज अवध का नाश्ता. रात के खाने के लिये हमने टुंडे की दुकान से कबाब, लखनवी बिरयानी और रूमाली रोटियाँ; गणेश गंज से दर्जन भर दही बड़े और शिव के यहाँ से एक एक किलो रस मलाई और मोतीचूर के लड्डू बंधवा लिये.

घर पहुँच कर डी.वी.डी. पर अपने पेट के नये आकार के अनुरूप “गोलमाल” लगाई, मेज पर खाना खोल कर सजाया और लज़ीज़ खाने का लुत्फ़ उठाते हुये प्लेटों को खाली करना शुरू कर दिया. सारी प्लेटें सफा-चट करने के बाद मैंने भारतीय परम्परा का अनुसरण करते हुये अपनी बाहर कूदती हुई तोंद पर हाथ फेरा, शेर की दहाड़ जैसी डकार ली और बिल्लू भैय्या को धन्यवाद देते हुये कहा, “मजा आ गया. आज तो आत्मा तृप्त हो गयी ऐसा स्वादिष्ट खाना खा कर.”

पर अपने बिल्लू मियाँ कुछ परेशान से दिख रहे थे, सो पूछ लिया, “क्या बात है भाई - ऐसे दिन और खाने के बाद भी ये मनहूसियत क्यों?”

बिल्लू भैय्या का जवाब आया, “यार इसमें कोई दो राय नहीं कि सुबह से शाम तक का भोजन बड़ा स्वादिष्ट रहा, पर मुझे ऐसा लग रहा है कि कोई चीज़ छूट रही है. मैं अभी तक तृप्त नहीं महसूस कर रहा हूँ.”

अचानक बिल्लू भैय्या चिल्लाये, “अरे यार पता चल गया क्या चीज़ अभी बची है. चल मेरे साथ गली के नुक्कड़ तक.”

बिल्लू भैय्या मुझे घसीटते हुये नुक्कड़ तक ले गये और गली के कोने में ईटों के ढेर पर टिकी हुई “चौरसिया पान भंडार” की गुमटी के सामने रुक गये. घनी मूँछो वाले चौरसिया जी रेडियो पर बजते हुये हिंमेंशं रेंशंमिंयाँ के गाने की धुन पर पान के पत्तों पर चूना और कत्था मलने में लगे हुये थे और हमारे बिल्लू भैय्या बर्फ़ की सिल्ली पर बिछे हुये लाल कपड़े के टुकड़े पर चाँदी की परत से सजी हुयी पान की गिलौरियों को ललचाई नजरों से देखने में व्यस्त थे.

“भैय्या जरा दुई ठो गिलौरी देना.” ये कहते हुये बिल्लू भैय्या ने पान की दो गिलौरियाँ उठाईं – एक मुँह के दाँयी ओर दबायी और दूसरी बाँयी ओर, और आनन्द से बोल उठे, “अब जा कर मजा आया. बिना गिलौरी खाये खाना फीका फीका सा लग रहा था. अब जा कर खाने का भी आनन्द आया. बिना मीठे पान की गिलौरी के तृप्ति नहीं मिलती. कितना भी स्वादिष्ट खाना हो पर अंत में पान की गिलौरी तो होनी ही चाहिये.”

छह सात गिलौरियाँ बंधवा कर हम वापस चल पड़े घर की ओर. रास्ते में मैंने पूछ ही डाला, “ये क्या चक्कर है बिल्लू? दिन भर ऐसे ऐसे लजीज पकवान खाने के बाद भी बिना पान की गिलौरी खाये तुम्हारा मन नहीं भरा?”

बिल्लू ने भाषण पिलाना शुरू कर दिया, “देखो भाई इस एक छोटी सी गिलौरी में सारे स्वाद एक साथ कैद हैं – गुलुकन्द की मिठास, पेपरमिंट की ठंढक, चूने का तेजपन, कटी हुई सुपाड़ियों का नशा, कत्थे का रंग, पान के पत्ते की तीखापन, चाँदी के काम की बारीखी, धीरे धीरे मुँह में घुलता हुआ रस. जो लोग खाने के सच्चे शौकीन हैं वही इस पान की गिलौरी की महिमा समझ सकते है.”

“समझाया बड़े ढंग से. तुम्हारा दूसरा शौक फिल्मी गाने सुनने का है. तो दूसरे शौक की भी कोई गिलौरी जैसी चीज़ है?” मैंने बवजह भौंक रहे आवारा कुत्ते को भगाते हुये पूछा.

"राहुल देव बर्मन.”, फटाक से जवाब आया, “दिन भर कितने भी गाने क्यों न सुन लूँ पर जब तक आर डी बर्मन के गाने न सुन लूँ मन नहीं भरता है – लगता है पूरी और अच्छे तरीके से गाने सुने ही नहीं. आर डी बर्मन गानों की गिलौरी है. घर चलो तुम्हें इस गिलौरी का भी असली स्वाद चखाता हूँ.”

घर पहुँचते ही बिल्लू भैय्या ने जेब से अपना एम-पी-3 प्लेयर निकाला, स्पीकर जोड़े और एक के बाद एक आर डी बर्मन के गाने बजाने शुरू कर दिये. मैंने मेज पर पड़ी हुई दो पान की गिलौरियों को मुँह में ठूँसा और उनका रसास्वादन करते हुये बिल्लू भैय्या से कहा, “मान गये गुरू. दोनों ही गिलौरियों का कोई जवाब नहीं है.”
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3 टिप्‍पणियां:

manisha ने कहा…

waah! waah! waah! bahuuuuuut maza aaya... ghar baithe baithe sare khano ka jayaka muha me aa gaya hmmmmmmmmmmmmm...wakai dono gillories ka jawab nahi...badhai ya

आशीष ने कहा…

अतुल भाई,

सुबह सुबह ये लेख पढ लिया, अब मै चला कैण्टीन, समोसे और जलेबी का भोग लगाने !

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

बिल्लू मियां ने पान में पड़े सात तत्व वैसे ही गिनवाये जैसे संगीत के सात सुर। संगीत के सात सुरों में सबसे सुरीला माना जाता है - पंचम! सबसे सुरीला पंचम यानी हमारे पंचम दा - राहुल देव बर्मन। पंचम दा के बिना अब शायद संगीत भी उन्हीं का गीत गाता हुआ उन्हें याद करता होगा "तेरे बिना ज़िंदगी से शिकवा तो नहीं, तेरे बिना ज़िंदगी भी लेकिन ज़िंदगी तो नहीं।"

काश कोई तो ऐसा संगीतकार हो जो पंचम से यह कहता हुआ कुछ सीख सके "जीने की तुमसे वजह मिल रही है, बड़ी बेवजह ज़िंदगी जा रही थी।"

आप मज़ेदार cयंजन खाइये मैं चला पंचम के सुरों की मदिरा पीने - बिना कुछ मिलाये, अरे भाई मिला दिया तो रि-मिक्स हो जायेगा ना।