शुक्रवार, सितंबर 29, 2006

देवी शरणम गच्छामि.

आज से कई सौ वर्ष पूर्व सम्पूर्ण उत्तर भारत पर सम्राट यशोधर सिंह का एकक्षत्र राज्य था. पिछले कई वर्षों से साम्राज्य की परिस्तिथि बिगड़ती जा रही थी – विद्रोही दल अस्त्र शस्त्र ले कर साम्राज्य के कोने कोने में खड़े होने लग गये थे और आर्थिक स्तिथि भी सामान्य नहीं थी. ये सब तो यशोधर के लिये एक चिंता का विषय थे ही, साथ में सम्राट के लिये सबसे बड़ी चिंता का कारण था उनका एक मात्र पुत्र युवराज अमीर सिंह.

अमीर सिंह हर क्षेत्र में पूर्णतः अयोग्य था. न तो उसे शिक्षा में कोई रुचि थी और न ही उसे खेल-कूद, राजनीति और कला के क्षेत्र से कोई लगाव था. और, यशोधर के लिये इनसे भी बड़ी पीड़ा का कारण ये था कि अमीर के हृदय में अपने स्वयं के साम्राज्य के लिये कोई भक्ति या त्याग की भावना नहीं थी.

यशोधर ने सभी प्रकार के यत्न कर लिये अमीर को परिवर्तित करने के लिये. अंततः जब सारी युक्तियाँ असफल हो गयीं तो यशोधर आशुकेष ऋषि की शरण में जा पहुँचा. यशोधर ने अश्रु प्रवाह को रोकने की चेष्टा करते हुये कहा – “स्वामी, मेरा पुत्र युवराज अमीर सिंह हर क्षेत्र में अयोग्य एवं अक्षम है. उसका जीवन इस साम्राज्य के लिये व्यर्थ ही है. आपको तो विदित ही है कि हमारे साम्राज्य में धनुर्विद्या का कितना महत्व है. साम्राज्य का बच्चा बच्चा हाथ में धनुष बाण ले कर ये स्वप्न देखता है कि एक दिन वो धनुष प्रतिस्पर्धा का विजेता बनेगा. कुछ महिनों के पश्चात सभी पड़ोसी राज्यों के राजकुमारों की धनुष प्रतिस्पर्धा है और पराजित युवराज को अगले एक वर्ष तक समस्त विजेताओं को प्रति माह पाँच सहस्त्र स्वर्ण मुद्रायें लगान के रूप में देनी होंगी. आप कुछ और नहीं तो अमीर को इस योग्य तो बना ही दें कि वो इस धनुष प्रतिस्पर्धा में विजयी हो जाये.”

महर्षि आशुकेष ने यशोधर की समस्या सुनने के बाद सम्राट को ये आज्ञा दी कि अमीर सिंह को महर्षि के आश्रम में आठ सप्ताह के लिये शिक्षा एवं तप के लिये भेजा जाये. आठ सप्ताह के अविरत कठोर परिष्रम के उपरांत भी आशुकेष ऋषि अमीर के भीतर तिनका भर भी परिवर्तन ना ला सके और निराश हो कर यशोधर के राजमहल में जा पहुँचे. आशुकेष ने एक हारे हुये सिपाही की भाँति कहा, “सम्राट, क्षमा करें ये कहने के लिये कि एक पत्थर में ज्ञान डाला जा सकता है परंतु युवराज अमीर में नहीं. मैं असफल रहा युवराज को धनुर्विद्या सिखाने में”

सम्राट ने दुखी स्वर में पूछा, “ऋषिवर क्या ऐसी कोई भी युक्ति नहीं है जिससे युवराज और उसके कर्मों से इस साम्राज्य का भला हो सके?”

आशुकेष ने सम्राट को सांत्वना देते हुये कहा, “राजन! ये दुष्कर कार्य हमारे साम्राज्य में रहने वाले साधारण नागरिकों, शिक्षकों और ऋषि, मुनियों के लिये सम्भव नहीं है. इसके लिये हमें ज्ञान सम्पदा से भरपूर, दैवीय शक्ति वाले दूसरे लोक के देवदूतों की सहायता लेनी होगी. और, उसके लिये मुझे सप्ताह भर का यज्ञ करना होगा. यदि सम्राट की अनुमति हो तो मैं यज्ञ का प्रबन्ध करता हूँ.”

यशोधर से अनुमति प्राप्त करने के पश्चात आशुकेष ने पूरे एक सप्ताह यज्ञ किया. यज्ञ के सातवें दिन हवन कुंड से उच्च जाति की अहिल्यबेथ नामक एक देवी प्रकट हुयी. उसकी देह मट्ठे के समान दूधिया, गुलाबी वर्ण की थी, केश स्वर्णिम थे तथा नेत्र एक गहरे सागर के समान नीले रंग के थे.

अहिल्यबेथ के बोलने और सिखाने के ढंग में कुछ इस प्रकार का सम्मोहन था कि अमीर उसके समस्त आदेशों का पालन करते हुये धनुर्विद्या सीखने में लिप्त हो गया.

तीन सप्ताह के पश्चात पड़ोसी राज्यों के युवराजों की धनुष प्रतिस्पर्धा हुई और अमीर सिंह अहिल्यबेथ के योग्य मार्ग दर्शन के कारण विजयी हो कर लौटा.

यशोधर ने अहिल्यबेथ को राजकीय सम्मान से सुशोभित किया और उसके चरणों में भाँति भाँति प्रकार के उपहार बिछा कर राजसी ठाठ बाठ के साथ विदा किया.

पूरे राज्य में कई महिनों तक अमीर सिंह की विजय के उत्सव मनाये गये. जब उत्सव का वातावरण शाँत हुआ तो अमीर पुनः साम्राज्य के प्रति अपने दायित्व से मुँह मोड़ कर रंगरेलियों में व्यस्त हो गया. और, यशोधर पुनः चिंतित हो गया कि किस प्रकार अमीर के हृदय में राज्य और राज्य से सम्बन्धित वस्तुओं के प्रति प्रेम, भक्ति एवं त्याग की भावना जागृत की जाये.

इतिहास दोहराय गया – यशोधर आशुकेष की शरण में गया, महर्षि आशुकेष अमीर को अपने आश्रम में ले गये, उनकी सारी युक्तियाँ और पाठ विफल रहे और आशुकेष के आठ सप्ताह के कठिन परिश्रम के उपराँत भी अमीर में कोई परिवर्तन न हुआ.

पूरी तरह से निराश आशुकेष और यशोधर ने पुनः अपनी समस्त आशायें दूसरे लोक के देवदूतों और देवियों पर लगा दीं. एक बार फिर से आशुकेष ने पूरे एक सप्ताह यज्ञ किया और यज्ञ के सातवें दिन हवन कुंड से उच्च जाति की एक देवी प्रकट हुयी. परंतु, इस बार एक दूसरी देवी प्रकट हुई – इसका नाम स्यू था. स्यू भी अहिल्यबेथ के ही लोक की थी और उसकी देह भी मट्ठे के समान दूधिया, गुलाबी वर्ण की थी, केश स्वर्णिम थे तथा नेत्र एक गहरे सागर के समान नीले रंग के थे. सम्मोहित अमीर पुनः दैवीय प्रताप के वश में आकर पठन पाठन में रम गया.

चार सप्ताह के कठोर परिश्रम के पश्चात जब अमीर राजमहल में वापस आया तो उसके रोम रोम से राज्य भक्ति की भावना टपक रही थी. यशोधर का सर अमीर का ये रूप देख कर गर्व से ऊँचा हो गया और उसने समस्त जन सभा के समक्ष अमीर का आलिंगन करते हुये कहा, “पुत्र, हमें अपनी राज्य भक्ति का कोई उदाहरण तो दो.”

ये सुनते ही अमीर ने अपनी म्यान से कृपाण निकाल कर यशोधर के बगल में बैठे सेनापति तथा वाणिज्य मंत्री का सर धड़ से अलग कर दिया.

विस्मित यशोधर ने पोछा, “अमीर ये तुमने क्यों किया?”

अमीर ने उत्तर दिया, “महराज, ये दोनों गरीब जनता को कष्ट दिया करते थे, राजकीय पैसों का दुरुपयोग किया करते थे. सेनापति ने तो व्यापारियों से पैसा ले कर निम्न स्तर के हथियार सैनिकों के लिये खरीदे थे. इन्हें जीवित नहीं रहने दिया जाना चाहिये था. मैंने एक सच्चे राष्ट्र भक्त का कर्त्व्य निभाते हुये इनको उपयुक्त दण्ड दे दिया है.”

“परंतु राष्ट्र भक्ति का ये कोई उचित तरीका तो नहीं हुआ. तुम्हें इसके बारे में मुझे सूचित करना चाहिये था. अब इनको मारा है तो उन सभी व्यापारियों को भी मार कर आओ जिन्होंने सेनापति को निम्न स्तर के हथियार बेचे. समस्या हल करने का एक सभ्य तरीका होता है.”, यशोधर ने क्रुद्ध हो कर कहा.

ये सुनते ही अमीर कृपाण ले कर यशोधर की ओर झपटा ये कहते हुये, “यशोधर, मुझे सबसे पहले तुझे ही मारना चाहिये था. देख तूने इस राष्ट्र का क्या हाल कर दिया है. तू और तेरे सभी सहकर्मी जन्मजात चोर हैं.”

अमीर यशोधर पहुँच पाता उससे पहले ही यशोधर के अंगरक्षकों ने अमीर का वध कर दिया. अमीर का जीवन हीन देह स्यू के चरणों में गिरा. यशोधर ने स्यू की ओर लाचार दृष्टि से देखा और कहा, “देवी, आज से ये सम्राट आपकी शरण में है. मेरा उचित मार्ग दर्शन करें और ये सिखायें कि इस साम्राज्य को किस प्रकार से भली भाँति चलाया जाये.”

(“लगान” और “रंग दे बसंती” से प्रेरित)
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2 टिप्‍पणियां:

अजय मिश्रा ने कहा…

कभी इस तरह से सोचा नही. पर अपकी बात मे दम हे. रंग दे बसंती को तो मीडिया ने इतना बढ़ावा दे दिया मुझे तो स्टोरी की रीज़्निग बेवकूफी की लगी राईटर काफी कंफ्यूज़ लगता है.

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

स्यू ने मरते अमीर से कहा होगा कि तुम्हारे देश को संकट से बचाने के लिये 'इत लाविया' देश की गौर वर्णीय देवी अवतरित होगी और तुम्हारी डूबती नैया पार लगाएगी।

ऊपर से हम भले ही हम कुछ और ही ढिंढोरा पीटते रहें पर दिल में हम आज भी यह गांठ बाँध कर बैठे हुये हैं कि "गौर वर्णीय" हमसे अधिक बुद्धिमान, विकसित, सफ़ल और अग्रणी हैं।

यही मानसिकता दिखाइ देती है "लगान" और "रंग दे बसंती" में - मज़ेदार बात देखिये - हमारी "गोरे की ग़ुलाम" मानसिकता ने इन दिनों फ़िल्मों को बे-इंतहा सराहा और दोनों को भारत की प्रतिनिधि के तौर पर "अकादमी पुरस्कार" के लिये भेजा गया।

गोरे भी देख कर खूब हंसे होंगे कि भैया देखो परमाणु शक्ति सुसज्जित भारत या उसके वासी आज भी इस मानसिकता के हैं कि बिना हमारे मार्ग दर्शन के वह "हारे हुरे, निकम्मे और दिशाहीन" ही रहते हैं।

इसीलिये मैने "लगे रहो मुन्ना भाई" को सराहा क्योंकि - इस फ़िल्म ने हिम्मत करी खुद पर हंसने की, अपनी कमियों को ढ़ूंढने की और उनका एक भारतीय समाधान पाने की।

फ़िल्म में गोरी मेंम की जगह "बापू" समस्यायों का समाधान देते हैं - शायद इसीलिये फ़िल्म को "कामेडी" की श्रेणी में रखा गया है।