नारद मुनि का भ्रम
अनेक कालों एवं युगों के व्यतीत हो जाने के पश्चात नारद मुनि ने निर्णय लिया कि वो भक्तों की भूमि भारत का भ्रमण करने जायेंगे ये देखने के लिये कि श्रद्धालु जन आमोद प्रमोद मय जीवन किस प्रकार से व्यतीत कर रहे हैं.
मुनिवर ग्रीष्म की एक तपती दोपहर में हरि ओम हरि ओम का जाप करते हुये भारत भूमि पर अवतरित हो गये. कुछ ही क्षणों में नारद ने जो अपने आस पास देखा उससे उनका हृदय विचलित हो कर वेदना एवं क्रोध की भावना से भर उठा. वो भारत भूमि जहाँ का प्रत्येक प्राणी सर्वथा ईश्वर पूजन और भजन में रमा रहता है, वर्षों से जमा की हुई सम्पत्ति भगवान के चरणों में बिना कुछ सोचे समझे भेंट चढ़ा देता है और ईश्वर के प्रति अपने जीवन की आहुति तक देने को तत्पर रहता है – उसी भारत के श्रद्धालु अनगिनत वेदनाओं के बोझ से दबे जा रहे हैं. भूख, गरीबी और मानवीय पीड़ा का ये द्र्श्य नारद मुनि से सहन नहीं हुआ. क्रोध तथा आक्रोश से भरे हुये मुनिवर वापस चल पड़े स्वर्ग की ओर सभी भगवानों से अनगिनत प्रश्नों की पुष्टि करने के लिये.
नारद मुनि बिना किसी विलम्ब के विष्णु के आवास स्थल पर पहुँच गये जहाँ ब्रह्मा तथा शिव के साथ साथ अन्य अनगिनत देवी देवता गण भी उपस्थित थे. नारद ने क्रोधमय कटु वाणी में कहा, “भगवनों, आज मैं भारत भ्रमण पर गया था. मुझे विश्वाश था कि आप सभी देवताओं ने भारतवासियों की अविरत भक्ति को समुचित विधि से पुरस्कृत किया होगा. परंतु वहाँ का द्र्श्य देख कर तो ऐसा प्रतीत होता है कि आप सभी ने आज तक किय गये समस्त यग्न, पूजन पाठ, भजन और कीर्तन को व्यर्थ ही जाने दिया. हे विष्णु, ब्रह्मा और महेश आप लोगों ने ऐसा क्यों किया? भारत भूमि पर वेदना एवं पीड़ा दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है और आप लोग अपने ही भक्तों की व्यथा-गाथा को अनसुना करते जा रहे हैं.”
नारद के क्रोध भरे वक्तव्य और दोषारोपण सुनने के उपराँत विष्णु ने कहना प्रारम्भ किया -
हे योग्य मुनिवर आपका क्रोध उचित एवं मान्य है. परंतु क्या आपको ये ज्ञात है कि हम सब देवी और देवता ऊपर स्वर्ग में क्यों रहते हैं? मैं आपको इसका इतिहास बताता हूँ. जब हम सब भगवानों ने मिल कर इस सृष्टि और मानव जाति की रचना करी थी, तो हम सब भी मनुष्य के साथ धरा पर ही निवास किया करते थे. हम लोग अदृश्य अवश्य थे परंतु प्रतिवेशी (पड़ोसी), शिक्षक, चिकित्सक, मार्ग दर्शक, दार्शनिक और ऐसे ही कई अनगिनत रूप धारण कर के मानव जाति की विपदाओं तथा पीड़ाओं का समाधान निकाल कर उन्हें दूर कर दिया करते थे. हम भगवान उनके बीच ही नहीं वरन उनके भीतर रहा करते थे. परंतु युग परिवर्तन के साथ साथ मनुष्य का स्वयं और दूसरे मनुष्य, अर्थात भगवान, से विश्वाश उठ गया. मानव जाति को लगा कि यदि ईश्वर को स्वर्ण और आभूषणों से सुसज्जित आवास भेंट कर दिये जायें तो सम्भवतः उनका हर प्रकार का कार्य पूर्ण हो जायेगा. मानव ने अनगिनत मंदिरों का निर्माण कर डाला. हे नारद क्या हम सब देवी देवता धन सम्पदा के लिये लालायित रहते हैं? मंदिरों के निर्माण से भी जब संतोषजनक परिणाम न प्राप्त हुआ तो हमें रंग और रूप दिया जाने लगा. एक के बाद एक -अनेक रूप दिये जाने लगे इस आशा के साथ कि सम्भवतः कोई रूप पीड़ा निवारण में साध्य होगा. जब मनुष्य ने हमें बंदर, सुअर, भालू और लिंग का रूप दिया तो हमसे ये सहन नहीं हुआ. मन तो हुआ कि मानव जाति से संबंध विच्छेद कर लिया जाये, परंतु हमने मनुष्य का साथ नहीं छोड़ा और धरा पर ही रहे उस माँ के समान जो कभी भी अपने दुष्कर्मी पुत्र की अवहेलना नहीं करती है और सर्वथा ये आशा करती है कि उसका पुत्र अवश्य ही उचित मार्ग पर आ जायेगा.
ब्रह्मा ने विष्णु के कथन को गति प्रदान करते हुये कहा -
नारद मुनि, इसके पश्चात भी हम देवता गण मानव की पीड़ाओं का निवारण करते रहे. परंतु मानव को ऐसा लगा कि हम उसकी प्रार्थनाओं का तत्परता तथा कुशलतापूर्वक उत्तर नहीं देते हैं और अपना समय मनोरंजन या निद्रा में व्यतीत कर देते हैं. अतः उसने मन्दिरों में विशालकाय घंटे लगा दिये ताकि वो हमारा ध्यान घंटों की कर्ण भेदी गूँज से आकर्षित कर सके. मन्दिरों में लटके सहस्त्रों घंटों के अविराम कोलाहल से हम सभी के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव तो पड़ा ही साथ में हम कोई भी कार्य एकाग्रचित्त हो कर नहीं कर सके.
शिव ने भी सहमति में कहना प्रारम्भ कर दिया -
मुनिवर, हमें सर्वदा कार्यरत और जगाये रखने के लिये मनुष्य ने मन्दिरों के आहाते में ढोलक, मंजीरा और मृदंग लेकर सर्व शक्ति से जोर जोर भजन कीर्तन करना प्रारम्भ कर दिया. कभी कभी ये कोलाहल रात्रि जागरण का रूप धर कर सारी रात्रि चलता तो कभी कभी पूरे सप्ताह. भजन कीर्तनों में हम सभी देवी देवताओं के गुण गाये जाते ताकि हम सब स्वयं की प्रशंशा सुन कर भक्तों की इच्छा पूर्ति कर दें. नारद मुनि हम देव लोग क्या बधिर हैं कि हमें झुंड में जोर जोर से चिल्ला कर गाथा सुनाई जाये और क्या हम देवता गण अपनी ही प्रशंशा सुनने को उतावले रहते हैं? साथ में पूजन के रूप में हवन किया जाता - वनों को काट कर लकड़ियाँ लाई जातीं और उनको जला कर अनावश्यक धुआँ फैलाया जाता. धुयें से भरे आवासों में हम सबका श्वाश लेना असम्भव होता जा रहा था और घंटों, ढोल, मंजीरों, भजन एवं कीर्तनों के कोलाहल तथा नाद से हम सबकी श्रवण शक्ति दिन प्रतिदिन क्षीण होती जा रही थी. अतः हम सभी देवताओं ने मिल कर ये एकमत निर्णय लिया कि पूर्णतः बधिर और नेत्रहीन होने से पूर्व ही हमें धरा और इस कोलाहल से अत्यंत दूर चले जाना चाहिये. अंततः सभी देवी और देवता गण वसुन्धरा का परित्याग कर के वहाँ से अरबों मील दूर स्वर्ग में आ बसे.
विष्णु ने नारद को सम्बोधित करते हुये कहा -
नारद मुनि आपके व्याख्यान से प्रतीत होता है कि भारतवासी अभी भी मन्दिरों के आहातों में हवन किये चले जा रहे हैं और सम्भवतः ध्वनि विस्तारक (लाऊड स्पीकर) के माध्यम से और अधिक ध्वनि व नाद के साथ भजन कीर्तन किये चले जा रहे हैं. दुर्भाग्यवश हम देवताओं की श्रवण क्षमता भजन-कीर्तन कोलाहल से पहले ही क्षीण हो चुकी है और धरा से अरबों मील दूर होने के कारण भारतवासियों का गाना-बजाना हमें सुनाई भी नहीं देता है – इस लिये भक्तों की प्रार्थना को अनसुना कर देने का प्रश्न ही नहीं उठता. अतः हे मुनिवर भारतवासियों की वर्तमान परिस्थितियों के लिये हमें दोषी ठहराना अनुचित होगा.
नारद ने ये सब सुनने के पश्चात सभी देवी और देवताओं के समक्ष कर बद्ध क्षमा याचना की और हरि ओम हरि ओम का जाप करते हुये आगे की ओर बढ़ चले.
****

7 टिप्पणियाँ:
बहुत सही।
A ver good idea and well presented.
अच्छा है
बहुत सुन्दर लेख
मेरे लिये तो इतना आश्वासन बहुत है कि भगवान अभी भी माँ के रूप में हमारे बीच में मौजूद है।
आपका चिट्ठा पढ़ कर एक अंग्रेज़ी फ़िल्म "GOD ALMIGHTY" याद आ गयी।
दरअसल जोर जोर से चीख चिल्ला कर पूजा करके हम ईश्वर को बुलाते ही नहीं हैं, यह धार्मिक मुखौटा लगा कर हम समाज में अपनी धूमिल छवि को धोने का प्रयास करते हैं।
अतुलजी, श्रीमद् भागवत् गीता के अनुसार प्रत्येक प्राणी के अन्दर 'आत्मा' का निवास है जो 'परमात्मा' का अंश है।
मैं आपके कथन से कि ईश्वर हमें छोड़ कर स्वर्ग चले गये हैं, मैं पूर्णतया असहमत हूँ।
वैसे पूजा के शोर शराबे की आपकी विचारधारा से मैं सहमत हूं।
अनुराग
हरि ओम हरि ओम ....अच्छा लिखा है. बधाई.
अपके नेक इरादों पर बधाई :)
एक टिप्पणी भेजें