शुक्रवार, मई 26, 2006

वेताल पच्चीसी की छब्बीसवीं कहानी.

प्रतिदिन की भाँति आज भी विक्रमादित्य ने बरगद के पेड़ से लटकते हुये शव को उतारा और कंधे पर डाल कर शमशान की ओर चल पड़ा. और, प्रतिदिन की भाँति आज भी वेताल ने कहा, “विक्रमादित्य तुम्हारी थकान मिटाने के लिये मैं तुम्हें एक प्राचीन युग की कहानी सुनाता हूँ.”

प्राचीन काल में एक अत्यंत ही समृद्ध्य एवं विकसित राष्ट्र हुआ करता था जिसका नाम भार्ताष्ट्र था. भार्ताष्ट्र विश्व में धन सम्पदा के अतिरिक्त अपने दार्शनिकों, कवियों, लेखकों और उत्कृष्ट साहित्य तथा भाषाओं के लिये भी विख्यात था. इन्हीं सब कारणों से भार्ताष्ट्र सभी अन्य देशों के लिये ईर्ष्या का कारण बन गया. सभी ईर्ष्यालु राष्ट्र उपाय खोजने लगे कि किस प्रकार भार्ताष्ट्र के प्रभाव को कम किया जाये और उसकी बहुयामी उन्नति को हानि पहुँचाई जाये.


भार्ताष्ट्र से ईर्ष्या करने वाले राष्ट्रों की सूची में अग्रणी था बरतीना. बरतीना के शाशक का ये मानना था कि यदि किसी राष्ट्र की सोचने की शक्ति और क्षमता को नष्ट कर दिया जाये तो उसका पतन निश्चित है. और, ये तभी सम्भव था जब कि भार्ताष्ट्र को युद्ध में पराजित कर के उस पर सैन्य अधिकार कर लिया जाये. उसे ये भी पता था कि भार्ताष्ट्र एक शाँति प्रिय एवं अहिंसा का अनुयायी देश था तथा भार्ताष्ट्र की स्वयं की कोई सेना नहीं थी. अतः बरतीना के शाशक ने अपना सम्पूर्ण ध्यान सैन्य बल को बढ़ाने में लगा दिया.

कुछ ही वर्षों के उपरांत सैन्य बल से सशक्त बरतीना ने भार्ताष्ट्र पर आक्रमण कर के उसे अपने अधिकार में कर लिया. और, प्रारम्भ किया अपना कुचक्र भार्ताष्ट्र के साहित्य, भाषाओं, विश्वविद्यालयों, दार्शनिकों एवं साहित्यकारों को ध्वस्त करने का. कई दशकों तक बरतीना के सैनिक अत्याचार करते रहे, परंतु उन्हें भार्ताष्ट्र की बौध्ध शक्ति को कुचलने में कोई सफलता नहीं प्राप्त हुई. जैसे जैसे बरतीना के सैनिकों का दमन तथा अत्याचार बढ़ता गया वैसे वैसे भार्ताष्ट्र में और चिंतक, दार्शनिक, कवि एवं लेखक पनपने लगे. लोगों में देश और देश की प्रत्येक वस्तु के प्रति एक विशेष भावना जाग्रत हो गयी. कहते हैं न कि किसी को जितना दबाओगे वो उतनी ही शक्ति, आक्रोश और गर्व की भावना से सर उठा कर खड़ा हो जायेगा.

कई दशकों के असफल प्रयास के उपराँत बरतीना के सैनिक और शाशक भार्ताष्ट्र को छोड़ कर चले गये. वो अपने साथ भार्ताष्ट्र की सम्पदा तो अवश्य लूट कर ले गये पर भार्ताष्ट्र की कला, साहित्य तथा सोचने के ढंग को नष्ट नहीं कर पाये. और, एक बार पुनः भार्ताष्ट्र का मूल साहित्य और कला फलने फूलने लगी.

उसी काल में एक और राष्ट्र था – अमारीत. अमारीत को भार्ताष्ट्र से कोई बैर नहीं था और न ही वो भार्ताष्ट्र पर राज्य करना चाहता था. अमारीत का मात्र एक उद्देश्य था सम्पूर्ण विश्व को अपने विचारों, पर्वों, कला और सोचने के ढंग का गुलाम बनाना. अमारीत के निवासियों और शाशकों का ये मत था कि विश्व में अग्रणी होने के लिये सर्वप्रथम सभी राष्ट्रों को मानसिक गुलाम बना लेना चहिये. और, अमारीत के लोग उपाय खोजने लगे कि किस प्रकार भार्ताष्ट्र से बिना युद्ध किये उसे मानसिक रूप से अपंग बना दिया जाये.

अमारीत स्वयं एक अत्यंत शिक्षित और विद्वान लोगों का देश था और उसे अधिक समय नहीं लगा ये उपाय ढ़ूढने में कि किस प्रकार भार्ताष्ट्र पर “मानसिक” अधिकार किया जाये. अमारीत के लोग शिक्षा और विज्ञान के आदान प्रदान के नाम पर सीमा पार कर के भार्ताष्ट्र आने लगे और साथ में अपने देश की कला, संगीत, नाट्य तथा साहित्य का प्रचार करने लगे.

अमारीत के लोगों ने जगह जगह रंगमंचों की स्थापना की जहाँ वो निःशुल्क अमारीत के नाटकों और संगीत का प्रदर्शन करने लगे. साथ ही गली गली में पत्र एवं पत्रिकाओं का निःशुल्क वितरण करने लगे. ये पत्र एवं पत्रिकायें अमारीत की घटनाओं, प्रसिद्ध लोगों और कथा साहित्य की सूचना प्रसारण की माध्यम थीं. इनमें अमारीत की उन्नति तथा समृद्धि को प्रदर्शित करने वाले चित्र छापे जाते थे और भार्ताष्ट्र के नागरिकों के समक्ष अमारीत की एक मनोहर छवि परोसी जाती थी. अमारीत के इन सब प्रचारण का मात्र उद्देश्य था भार्ताष्ट्र के नागरिकों को अमारीत देश और उससे सम्बन्धित समस्त आयामों से प्रभावित करना ताकि वो लोग अमारीत की भाषा, साहित्य, खान पान तथा साहित्य का अनुसरण करने लगें और स्वयम को अमारीत के रंग ढंग में ढालने लगें.

अंततः अमारीत के शाशक का उद्देश्य पूरा हुआ. कई वर्षों के प्रचारण एवं प्रसारण का परिणाम ये हुआ कि भार्ताष्ट्र के अधिकांश नागरिक अमारीत की भाषा, गीत संगीत, कथा साहित्य और रंगमंच से पूर्ण रूप से अवगत होने में गर्व महसूस करने लगे. और, साथ ही साथ अपने देश की भाषा, इतिहास और साहित्य इत्यादि को धीरे धीरे भूलने लगे – यहाँ तक कि अपने नामों का भी परिवर्तन करने लगे. बरतीना के लोग जो अत्याचार और सैन्य बल से न कर सके वो अमारीत ने बिना एक हथियार उठाये पूरा कर लिया और भार्ताष्ट्र को मानसिक रूप से अपना गुलाम बना लिया. और इस प्रकार भार्ताष्ट्र की कलाओं, भाषाओं और संस्कृति का पतन प्रारम्भ हो गया.

वेताल ने कहा, “विक्रमादित्य ये कहानी यहीं समाप्त होती है. हमेशा की तरह आज भी मैं तुमसे कुछ प्रश्न पूछूँगा. यदि उन प्रश्नों का उत्तर जानते हुए भी तुमने उनका जवाब नहीं दिया तो तुम्हारा सर टुकड़े टुकड़े हो जायेगा. मेरा पहला प्रश्न ये है अमारीत की भाषा, गीत संगीत और कथा साहित्य इत्यादि में ऐसा क्या गुण था कि भार्ताष्ट्र के लोग अपनी ही चीज़ों का सहर्ष परित्याग करने लगे. दूसरा प्रश्न ये है कि भार्ताष्ट्र के शाशक को अमारीत के सांस्कृतिक आक्रमण को रोकने के लिये कुछ करना चाहिये था या नहीं? और, यदि दूसरे प्रश्न का उत्तर हाँ है तो मेरा अंतिम प्रश्न ये है कि उसे क्या करना चहिये था?”

हमेशा की भाँति इस बार भी विक्रमादित्य सभी प्रश्नों का उत्तर देने में सक्षम था परंतु उसने सोचा कि उसके कटु-सत्य उत्तरों से भार्ताष्ट्र के अधिकांश नागरिकों को ठेस पहँचेगी और शायद उसके विचारों में तानाशाही की झलक दिखायी देगी. इन सब कारणों को ध्यान में रखते हुये विक्रमादित्य ने उत्तर जानते हुये भी किसी भी प्रश्न का उत्तर देना उचित नहीं समझा. वेताल के कथनानुसार उसी क्षण विक्रमादित्य का सर टुकड़े टुकड़े हो गया और इस प्रकार वेताल पच्चीसी का अध्याय भी सर्वथा के लिये समाप्त हो गया.

2 टिप्‍पणियां:

Vijay Wadnere ने कहा…

क्या लिखूँ? शब्द नहीं है!

मगर अब लगता है कि कोई भी कटु सत्य सुनना नहीं चाहता और जैसा है वैसा ही रहने देने में भलाई समझता है.

मुझे तो आज भी यही लगता है कि अपनी संस्कृति से प्यार करने वाला कोई "तानाशाह" नहीं आयेगा, तब तक इसी तरह कोई ना कोई बरतीना अमारित इसी तरह हमे नुकसान पहुँचाते रहेंगे.

और नुकसान तो नुकसान होता है चाहे वो आर्थिक हो या मानसिक.

अनुराग ने कहा…

आपकी कहानी ने कई प्रश्न उठाए हैं, कुछ तो आपने स्वयं ही कह दिये, वेताल की ज़ुबानी और कुछ आपने छोड़ दिये।

विक्रमादित्य चुप क्यों रहे? चुप्पी का कारण था जनता जनार्दन के दिल को ठेस ना पहुंचाना, या सर्व ज्ञाता विक्रमादित्य भी कदाचित इस प्रश्न का उत्तर नहीं जानते थे! अनुचित उत्तर दे कर जग हंसाई झेलने से बजाये, उन्होंने सर फट जाना स्वीक्रित किया।

क्या आप इस प्रश्न का उत्तर जानते हैं?

घबराइये नहीं आपके कन्धे पर वेताल नहीं लदा है, और उत्तर जैसा भी हो, किसी का सर नहीं फटेगा।