सोमवार, फ़रवरी 20, 2006

चौबे-जी को सिर्फ किशोर कुमार ही क्यों पसन्द है?


मेरे एक अत्यंत घनिष्ठ मित्र हैं जो कि बिहार के रहने वाले हैं. वैसे तो इनका उपनाम चतुर्वेदी है पर प्यार से लोग इन्हें चौबे-जी कहते हैं. स्वभाव से मैं अहिंसावादी हूँ और किसी गायक या गायिका के नाम की दुहाई देकर अखाड़े में कूदना शेखचिल्ली की करतूत मानता हूँ. पर हमारे चौबे-जी ऐसे नहीं हैं. वो तो एक विशेष गायक के धर्मान्ध पुजारी हैं. उस सौभाग्यशाली गायक का नाम हिन्दी वर्णमाला के “क” अक्षर से शुरू होता है और “क” के साथ में एक अदद छोटी “इ” की मात्रा भी लगी होती है. चौबे-जी इस गायक के साथ साथ मिठाईयों के भी बहुत शौकीन हैं. वो मिठाईयों को उसी तरह ललचाई हुई नज़रों से देखते हैं जिस तरह पिरान्हा मछलियाँ दूसरे गायकों के प्रशंसकों को देखती हैं जिन्हें चौबे-जी बस नाँव के छोर से धक्का देने ही वाले होते हैं.

मस्त मौला चौबे-जी से मेरी अक्सर ही मुलाकातें होती रहती हैं. अब पिछले सप्ताह ही चौबे-जी के अंजुमन में महफ़िल जमी उनकी वार्षिक वैवाहिक वर्षगाँठ मनाने के लिये. सभी के लिये “फ़्रिज में लगी ठंडी बियर की बोतलें” खोली गयीं. हाथ में “मिलर लाईट” की बोतलें लिये हम लोग सच्चे “भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान” के सिपाहियों की तरह तकनीकि क्षेत्र में हुई नवीनतम खोजों के बारे में बातें करने लगे. और साथ ही साथ दिखावे के तौर पर हिन्दी फिल्मों में “आईटम सॉंग्स” के प्रचलन को दिल भर के कोसा भी.

मैं पिछले कई हफ्तों से एक विषेश याहू ग्रुप के सदस्यों के बीच छिड़ी किशोर कुमार-मोहम्मद रफी जंग का आनन्द उठा रहा था और चौबे-जी के “कि” गायक के प्रेम ने मुझे इस बात के लिये उकसाया कि इस विषय में चौबे-जी के विचारों को भी जान लिया जाये. तो मैनें एक रफी भक्त सदस्य का परमाणु बम उधार लिया और चौबे-जी के ऊपर गिरा दिया – चौबे यार तुम्हें नहीं लगता कि रफी एक बेहतर गायक थे और उनके गायन में काफी विविधता थी. वो गज़ल, भजन, कव्वाली और याहू वगैरह काफी सरलता से गा लिया करते थे.

अब तक “मिलर लाईट” बियर ने अपना धार्मिक प्रभाव चौबे-जी पर दिखाना शुरू कर दिया था और वो एक शाँत संत की तरह बोले – भैय्या अतुल अब तुमको तो ये पता ही है कि मुझको मिठाईयाँ बहुत ही अच्छी लगती हैं. दरभंगा, जहाँ का मैं रहने वाला हूँ, मिठाईयों के लिये बहुत ही मशहूर भी है. जिस गली में हमारा पुश्तैनी घर है उसमें दो हलवाईयों की दुकानें हैं. एक का नाम है चिपचिपा मिष्ठान भंडार और दूसरी दुकान है लालू हलवाई की. अब भैय्या ये जो चिपचिपा वाली दुकान जो है ना हाथी के पेट की तरह बहुत ही विशालकाय है. आप उसमें दस या बारह अदद टाटा की ट्रकें खड़ी कर सकते हैं और उतनी ही टाटा सुमो भी. और उसका हलवाई भी तकरीबन पचास या साठ तरह की मिठाईयाँ बनाता है – गुलाब जामुन, रस मलाई, बालू शाही, काजू बर्फी, चमचम, मलाई पान, जलेबी, इमरती और न जाने क्या क्या.

पर मुझे इन सब फैंसी मिठाईयों में कोई दिलचस्पी नहीं है. मैं एक सीधा साधा प्राणी हूँ और साधारण मिठाई का ही भोग लगाता हूँ. मुझको तो आप बस पत्तल के एक दोने में प्यार से पकाई हुई रबड़ी दे दो. लालू कि दुकान एक छोटे से ढाबे की तरह है. और लालू ये सब बड़े बड़े नामों वाली मिठाईयाँ नहीं बनाता है – बनाता है सिर्फ रबड़ी, उंगलियाँ चाटने वाली रबड़ी और पूरे प्यार के साथ. लालू का सिर्फ एक ही धर्म है और एक ही कर्म है – रबड़ी में पूरा प्यार, परिष्रम और लगन घोल दो ताकि ग्राहक पूरी तरह संतुष्ट हो कर शुभाषीश देता हुआ दुकान से जाये. जिस तरह से लालू धीरी आँच पर धीरे धीरे रबड़ी औटाता है जब तक कि रबड़ी पूरी तरह से मलाई की एक मोटी और हल्की भूरी परत से न ढक जाये, जिस तरह से वो रबड़ी को एक पतली सी चाँदी की परत से सजाता है – अतुल भैय्या ये सब एक स्वर्गिक अनुभव है. दूसरी तरह चिपचिपा मिष्ठान वाला हजारों तरह की मिठाईयाँ बनाता है पर सब की सब चाशनी की अनगिनत परतों से ढकी रहती है. आप एक इमरती उठाओ और चाशनी नियाग्रा फाल्स की तरह बहने लगेगी. और तुमको तो ये पता ही है हमरे खानदान में डाइबिटीज़ की परम्परा है.

ये सब कहने का सारांश ये है कि मुझे चिपचिपा मिष्ठान की चिपचिपाती हुई अनगिनत मिठाईयों में कोई रुचि नहीं है. मुझको तो आप बस अच्छी तरह से औटाई हुई हल्की सी मीठी रबड़ी एक दोने में दे दो और मैं एक संतुष्ट आदमी की तरह ये भजन गाता मिलूँगा – यही जीवन है...

वैधानिक: प्रयोग किये गये सभी नाम एवम पात्र काल्पनिक हैं. किसी भी जीवित या मृत प्राणी से समानता मात्र एक संयोग है.

3 टिप्‍पणियां:

Pratyaksha ने कहा…

पढ कर मज़ा आया :-)

प्रत्यक्ष

Tarun ने कहा…

Khub likhe ho atul, maja aa gaya parke.

manisha ने कहा…

wah wah kya khoob tulna hai...rabri aur Kishor .....maja aa gaya