शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2006

शताब्दि के झरोखे से...


एक लम्बे अंतराल के पश्चात गत वर्ष मेरा भारत जाने का कार्यक्रम अंततः निश्चित हो गया. पिछले कई महिनों में भारत की आर्थिक उन्नति के बारे में बहुत कुछ पढ़ने एवम सुनने को आया – मित्रों तथा भारतीय समाचार पत्रों ने मुझ अनभिज्ञ को इस बात से अवगत कराया कि पिछ्ले कई वर्षों में भारत की काया पलट हो गयी है. जाने से कुछ सप्ताह पूर्व मैं इंटरनेट पर जा कर खोज खोज कर भारत की आर्थिक उन्नति के बारे में लेख पढ़ने लगा. भारत के बदलते परिवेश के बारे में पढ़ कर स्वयम को एक विचित्र प्रकार की आनन्दानुभूति होने लगी और मेरी कल्पनाओं ने मस्तिष्क पटल पर भारत, दिल्ली और दिल्ली स्टेशन की एक अत्यंत मनोहर छवि खींच दी.

जाने से एक दिन पूर्व मित्रों के साथ एक जमघट लगी. कौन सी एयर लाईन उत्तम है इस बात पर विस्तृत रूप से विचार विमर्श एवम विवाद हुआ और सभी ने एक-मत हो कर एयर इंडिया को जी भर के कोसा. मैंने पूछा, “क्यों भाई एयर इंडिया ने क्या ठान के रखी है कि वो भारत के साथ खुद को नहीं बदलेंगे?” और उत्तर आया - एयर इंडिया तो कुत्ते की दुम के समान है. मित्रों ने हार्दिक बधाई दी इस बात की कि मैंने स्वयम और अपने परिवार को एयर इंडिया के नरक में नहीं धकेला. सभी ने कहा कि मुझे इस बार India (दुर्भाग्यवश राष्ट्र भाषा के साथ साथ भारत शब्द का प्रयोग भी अत्यंत सीमित हो गया है) काफ़ी बदला मिलेगा और फिर अपने देश की मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू की बात ही कुछ और है.

अंततः वो दिन भी आ गया जब मैं समस्त परिवार और एक पुलकित ह्रदय के साथ सिंगापुर एयर लाईन्स के विमान में विराजमान हो गया. पूरे 22 घंटों की यातना के बाद ह्रदय को शाँति मिली जब ये घोषणा हुई कि 15 मिनट में हम दिल्ली में अवतरित होंगे. आँखें थकावट से लाल थीं परंतु फिर भी मैं खिड़की से झाँक कर ऊपर से ही भारत की उन्नति को निहारने का असफल प्रयास करने लगा. दिल्ली रात्रि के आँचल में दुबक कर सो रही थी और रात की काली चादर में सिर्फ टिमटिमाते हुए बल्ब ही दिखाई दिये. मैंने अपने उतावले मन को सांत्वना दी – कुछ देर और रुक. दिल्ली स्टेशन पहुंच कर शताब्दि ट्रेन के वातानुकूलित डिब्बे से जी भर कर दिल्ली और भारत के नये रूप-रंग का अवलोकन कर लेना. बच्चे तो आजकल बात सुनते नहीं हैं पर मेरा मन तुरंत मान गया.

विमान रुका और न जाने कहाँ से सभी मरे तुड़े यात्रियों में अचानक एक स्फूर्ति की लहर दौड़ गयी या शायद सभी को नीचे से 240 वोल्ट का एक झटका लगा हो – सब के सब भेंड़ के एक झुंड की तरह गेट की ओर दौड़ पड़े. बाहर निकलते ही दिल्ली एयरपोर्ट के दर्शन हुये. लगा कि किसी ऐतिहासिक रचना को निहार रहें हों. एक बार पुनः मन को समझाया – भारत विश्व विख्यात है अपने पुराने मन्दिरों, मस्ज़िदों और खंडहरों के लिये. शायद भारत सरकार ने दिल्ली एयरपोर्ट को वही रूप देने का प्रयत्न किया हो ताकि विदेशी यात्रियों को ऐतिहासिक भारत के पहली झलक एयरपोर्ट से ही मिल जाये.

सभी सरकारी औपचारिकता समाप्त करने के पश्चात हम लोग एयरपोर्ट के बाहर आ ही गये. और हमारे बाहर आते ही हर यात्रा कि भाँति इस बार भी टैक्सी चालकों ने हमें भिनभिनाती हुई मधुमक्खियों की तरह घेर लिया. खैर टैक्सी भी निश्चित हो गयी – काले और पीले रंगों से रंगी हुई 1970 की एक अम्बेज़्डर जिसके आगे और पीछे के हिस्से एक रस्सी की सहायता से अपनी जगह टिके हुये थे. बिटिया अभियोगमय स्वर में बोली – अरे पिछली बार भी हमने यही वाली टैक्सी ली थी. आप तो कह रहे थे इस बार अच्छी वाली टैक्सी मिलेगी. मैंने उसको भी सांत्वना का एक घूंट पिला दिया.

चालक आया और उसके साथ आया उसका छोटू. छोटू ने पूछा – कौन सी गाड़ी पकड़नी है. मैंने कहा – लखनऊ वाली शताब्दि एक्स्प्रेस. टैक्सी चालक और छोटू दोनों ने राहत की साँस ली – अभी तो साढ़े तीन बजा है. आपकी गाड़ी तो 6 बजे जाती है. बहुत “टैम” है अभी. ये कह कर चौधरी (ड्राईवर साहब हरियाणा के थे) ने इंजन चालू किया और हमारी गाड़ी धीरे धीरे हिचकोले खाती हुयी अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी. आँखें थकावट और नींद से बोझिल हुई जा रही थीं और टैक्सी के झूले समान हिचकोलों ने हम सभी को तुरंत निद्रा देवी की गोद में सुला दिया.

जब चौधरी जी की कर्कश वाणी से निद्रा भंग हुई तो हमने स्वयम को सपरिवार दिल्ली स्टेशन के अजमेरी गेट पर पाया. छोटू ने मेरी हर भारत यात्रा की भाँति इस बार भी दक्षिणा की माँग की – आर्थिक उन्नति का मात्र प्रभाव ये था कि उसने ये भी पूछ लिया कि डालर भी मिल सकते हैं क्या.

दिल्ली स्टेशन पर उतरते ही मुझे ऐसा प्रतीत हुआ मानों मैं अतीत में चला गया हूँ. हज़ारों की संख्या में कुली आक्रमण के लिये उतावले हो रहे थे. और उन कुलियों की भीड़ में उनसे चपत खाते हुये 10 से 14 साल के कई लड़के जो हर रुकने वाली टैक्सी को एक व्यतिथ दृष्टि से देखते इस आशा के साथ कि शायद इस बार बोझा ढो कर कुछ एक रुपये कमाने को मिल जाये. टिकट घर पर वही सदियों पुरानी एक लम्बी कतार और अंदर वही व्यक्ति जो न जाने कितने वर्षों से चाय के घूंट और साथ बैठे सहकर्मी की गप्पों का आनन्द उठाता हुआ बाहर कतार में खड़े लोगों के आग्रह और अपेक्षाओं की उपेक्षा किये जा रहा था. एक बार पुनः स्वयम तो समझाता हुआ मैं परिवार और अपने कुली के साथ निर्धारित प्लैट्फार्म की ओर चल पड़ा.

सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे और ट्रेन के प्लैट्फार्म पर आने में अभी कुछ एक मिनट बाकी थे. सहसा एक अजीब सी गन्ध ने सबको विचलित कर दिया. मित्रों की याद आई - अपने देश की मिट्टी की सोंधी सोंधी खुशबू की बात ही कुछ और है... पता चला कि रेलवे लाईन पर पड़े मल एवम मूत्र के धोने से ये (खुश)बू उठ रही थी. बचपन में तो ये द्र्श्य अनगिनत रेलवे स्टेशनों पर अनगिनत बार देखा था – एक नंगे पाँव मानव पानी की एक मोटी धार से पटरियों को धो रहा हो. परंतु आज के India में भी? सहसा एक छोटे से हाथ ने कमीज को हलका सा झटका दिया – और एक बार पुनः पिछले कई वर्षों का परिचित द्र्श्य आँखों के समक्ष कौंध गया. एक 8 या 9 साल की लड़की मैल और गन्दगी से लिपी हुई; चिथड़ों से ढकी हुई और गोद में एक दुर्बल सा बच्चा लिये हुये मूक द्रिष्टि से सामने हाथ फैलाये खड़ी हुई थी. जेब में जितनी दया सिक्कों के रूप में थी उसके हाथों में रख दी.

मुझे ऐसा व्यतीत हो रहा था मानों मैं दीवार पर लटकते हुये किसी अत्यंत पुराने चित्र का अंग बन गया हूँ. प्लैट्फार्म पर लगी हुई पुरातन काल की पानी की टोंटियाँ अभी भी बिना किसी अवरोध के धारा प्रवाह बहे जा रहीं थी और प्लैट्फार्म को पानी से सरोबोर किये जा रही थीं. प्लैट्फार्म पर फेंके हुये पत्तलों और दोनों को चाटते हुये आवारा कुत्ते अविराम बहते हुये पानी का दिल्ली की जान-लेवा गर्मी में भरपूर आनद उठा रहे थे. सब कुछ जाना पहचाना सा और ठहरा हुआ सा लग रहा था. ग्रामीण नागरिक प्राचीन प्रथा का अनुसरण करते हुये प्लैट्फार्म पर चद्दर बिछा कर या तो सो रहे थे या सूखी हुई रोटियों का मिर्चे के अचार के साथ रसास्वादन कर रहे थे. कुछ सम्भ्रांत लोग भी प्रथा का अनुसरण करते हुये नाक भौं सिकोड़ कर उन गवारों को तुच्छ भाव से देख रहे थे. और हवलदार जाति के लोग अकारण ही डंडा हिलाते हुये सहसा किसी गाँव वाले को डाँट देते.

निर्धारित समय पर दिल्ली-लखनऊ शताब्दि प्लैट्फार्म पर आ खड़ी हुयी. कुली ने समान अन्दर रख कर हमसे पैसे और विदा ली. मैंने खिड़की वाली सीट पर आसन जमाया ताकि द्रुतगामी शताब्दि के झरोखों से एक परिवर्तनशील भारत का द्र्श्यावलोकन किया जा सके. सहसा ऊपर देखा तो पाया कि अभी भी वही काले रंग के भोंडे और कुरूप कैलाश पंखे छत से लटक रहे थे. उन पंखों को मैंने न चाहते हुये भी अनदेखा कर दिया. थोड़ी ही देर में ट्रेन ने प्लैट्फार्म से रेंगना प्रारम्भ कर दिया और कुछ ही समय में हम दिल्ली को पीछे छोड़ चुके थे और मेरा व्यग्र मन खिड़की से बाहर झाँके जा रहा था. सुबह के 7 बज रहे थे और रेलवे लाईन के किनारे बसी बस्तियों के निवासी पटरियों के किनारे शौचालय के लिये आने लगे – वही पुराना द्र्श्य, कुछ नया नहीं. अब तो मैने अनुमान लगा लिया कि आगे आगे इस झरोखे से मुझे और क्या क्या देखने को मिलेगा.

शताब्दि पूर्ण गति से दौड़ती जा रही थी – सम्भवतः इस आशा के साथ कि सारे कुतत्वों को पीछे छोड़ आये. कूड़े के ढेर और गन्दे पानी से घिरी गुई गेरुये ईटों की दीवारें अभी भी खड़ी हुई थीं लोगों को ये आश्वासन देती हुई कि वर, वधु, पुत्र रत्न और खोई हुई जवानी नीचे लिखे नम्बर पर सम्पर्क स्थापित करने से अवश्य प्राप्त हो जाती हैं. गुजरते हुये स्टेशनों के प्लैटफार्मों पर अभी भी वही सीमेंट या लकड़ी की बेनचें जिस पर टीन का एक बक्सा और कपड़ों की एक पोटली लिये हुये और कुर्ता धोती पहने बैठा एक सफेद दाढ़ी वाला व्रद्ध. और उसके साथ में उसकी 14 या 15 साल की बहुरिया जिसका चेहरा चार हाथ लम्बे घूँघट के नीचे दबा हुआ और पायल के बोझ से थके हुये पैर बेंच के ऊपर. ये मात्र मेरी कल्पना है या वास्तव में मैने उनको इसी जगह और इसी तरह आज से कई साल पहले बैठे देखा था? अगला स्टेशन, और एक बार पुनः एक चिर परिचित द्र्श्य. प्लैट्फार्म पर कई सारे खाना बेचने वाले ठेले – अल्यूमिनियम के ठेले जिन पर लाल रंग से बड़ा बड़ा लिखा था – “R.K. & Co. Railway Catering”. खाकी रंग की वर्दी में ढका हुआ वही पुराना आदमी समय की मार से पूरी तरह काली पड़ गयी कड़ाही में पूड़ी तले जा रहा था और भूखे यात्रियों को कागज के वर्गाकार टुकड़ों पर पूड़ी और पत्तों से बने दोनों में वही आलू टमाटर की रसे वाली सब्जी हरी मिर्ची के साथ परोसे जा रहा था.

अंततः लखनऊ भी आ गया. स्टेशन से घर तक की दूरी में कुछ भी बदला बदला सा नही लगा. हाँ एक या दो माल अवश्य दिखे, अंग्रेजी ने हिन्दी को धक्का देकर दुकानों के बोर्डों से जरूर गिरा दिया था, MTV के बड़े बड़े बोर्ड भी दिखे और Pizza Hut और McDonald में माथा टेकने का सौभग्य भी प्राप्त हुआ. पर गन्दगी का आयतन बढ़ा हुआ सा लगा, यातायात वैसे ही बेहाल था. वो एक हड्डी वाले रिक्शे-वाले, जूते पॉलिश करते हुये बच्चे और वो छोटी लड़की गोद में एक छोटा बच्चा लिये हुये अभी भी शहर के हर कोनों में दिखी. गली के आवारा कुत्तों ने वैसे ही दौड़ाया और कई साल के बाद बैंक जाने के अभियोग में बैंक के कर्मचारी ने वैसे ही दुत्कारा.

शाम को एक सम्बन्धी ने रात्रि-भोज पर आमंत्रित किया. मिलने पर उनकी पहली प्रतिक्रिया थी – “You know India has changed a lot in past few years. Now, we are as developed as US. You can get everything right here in India – in Lucknow. Even a rickshaw puller owns a cell phone these days. We have Pizza Hut, KFC, and McDonald. And, now we have few good bars in Lucknow. I will take you there some day.” और उसी समय मेरे सामने शताब्दि का वो झरोखा घूम गया.
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9 टिप्‍पणियां:

Sunil ने कहा…

शायद हमारा उन्नति देखने का नज़रिया अलग है या फ़िर हमारी दृष्टि बेकार की बातों में ही अटक जाती है और जहाँ सही उन्नति हुई है उसे देख नहीं पाती ? भारत की उन्नति नये मालस् में है जहाँ आप गुच्चि और बेनेटोन खरीद सकते हैं, कुछ भि नया डिजिटल कैमरा, टीवी आदि खरीद सकते हैं, घर में नये से नये सामान ला सकते हैं, पर अगर आप इस उन्नति को बाहर सामान्य जीवन में ढ़ूँढ़ना चाहेंगे तो दिल्ली की मेट्रो या फ्लाईओवर या पुणे - बँगलोर हाईवे जैसी कोई चीज़ ढ़ूँढ़िये. उसे गरीबों के जीवन या रेलवे स्टेशनों पर ढ़ूँढ़ कर परेशान नहीं होईये.
सुनील

RC Mishra ने कहा…

आपने वास्तविक चित्रण किया है, सारा द्श्य आन्खो के सामने घूम जाता है, मै लखनऊ मे ४ साल अलीगन्ज और मोती महल (राणा प्रताप मार्ग) मे रहा हू।
लेकिन मै पहली टिप्प्णी से बिल्कुल सहमत नही हू या कहू कि मुझे बहुत अजीब लगा।

आशीष श्रीवास्तव ने कहा…

मै सुनिल जी की बात से कुछ हद तक सहमत हूं, भारत की उन्नती आपको देखना है तो रेल्वे स्टेशन सही नही है. भारत की उन्नती आपको देखना है तो आप भीखमंगो को क्यो देख रहे है ? क्या अमरीका मे भीखमंगे नही है ? न्युयार्क मे आपको हर जगह मिल जायेंगे
भारत की उन्नती देखनी है तो आप लोगो के जिवनस्तर मे आया बदलाव देखिये.
बेरोजगारी मे आयी कमी देखीये. आज किसी भी चिज को खरीदने के लिये आपको कीसी भी कतार मे खडे नही रहना पडता ना महीनो सालो पहले बूकिंग करनी पडती है.
बात उन्नती की नही है बात मानसिकता की है, अमरीका की चौंधियाहट मे हमारी आखें बंद हो जाती है, हम सोच नही पाते, अच्छा देख नही पाते.
जो भी दिखता है वह बूरा ही दिखता है.
बदलाव आ रहा है इसका मतलब यह नही कि हर चिज अमरीका या उन्नत देशो जैसा हो जाये. कुछ समय लगता है, जिसके लिये आपके पास धैर्य चाहीये.

मैरे शब्दो मे कठोरता है जिसके लिये मै क्षमा प्रार्थी हूं.
आशीष

हिमांशु ने कहा…

चलो भाई,

मै भी कुछ बोल ही दूँ. इस देश में जो चीजें मुझे पसन्द नहीं है:

1. रेल - जो चीज मुझे सबसे ज्यादा शर्मिंन्दा करती है. लाखों करोङों की यह सरकारी संस्था रेल के नाम पर कलंक है. जब सरकार करोङों खर्च करती है इन एंजिन/बोगी पर, तो हिताची जैसी कंपनियों से इन्हे क्यों नही लेती ??

2. सङक - इतना पैसा फूँकने के बाद भी हमें दो लेन की सङक नसीब नहीं हुई. पैसा खाने की कोई सीमा होती है यार.

3. सिटी प्लानिंग - ब्लू-प्रिंट क्या होता है, भारतीय सरकार यह जानती ही नहीं है. यहाँ पर तो ब्लू प्रिंट शहर बन जाने के बाद बनाये जाते हैं.

ऊपर के तीन चीजों के कारण यह देश भिखारियों का देश दिखता है.

इसके अलावा मुझे इस देश से कोई परेशानी नहीं.

मेरे हाथ में cdma मोबाइल है जिसे मैं अपने laptop में जोङ कर पूरे भारत में आँनलाइन रह कर घूम सकता हूँ. अमेरिका में रह कर भी यह करना कठिन है.

छत पर DTH की छतरी है,सो, अब 101 चैनल मेरे हाथ में हैं.

ब्राड-बैंड अब लगभग हर शहर में उपलब्ध है.

और हँ, बिजनेस करने के लिये इससे अच्छा देश और कोई नहीं. यहाँ टेक्नोलोजी बिकती है, और जम कर बिकती है.

gsm,cdma,dth/dvb, अगली लहर: DVB-H. मैं अभी से भविष्यवाणी करता हूँ की भारत में लोग इसे दीवानगी की हद तक उपयोग करेंगे.

कभी भारत के किसी टेक कम्पनी में जा कर देखियेगा. पैसा कमाने की यह ललक, और टेक्नोलोजी का संगम, अमेरिका, जापान के बाद आपको भारत में ही देखने को मिलेगा.

जब तक प्राइवेट कपनियाँ हैं, इस देश के बारे में चिंता करने की कोई जरूरत नहीं.

हो सकता है की कुछ दिनों में TATA-HITACHI जैसी कोई कंपनी देखने को मिले जो रेल-सेवा को बदल कर रख दे ??

इस देश में कुछ भी हो सकता है मेरे भाई.पैसे की ताकत सब कुछ कर सकती है.

अनुराग ने कहा…

अतुल,

धर्तराष्ट को तो कौरवों के अवगुण बताये जा सकते थे, लेकिन गन्धारी का क्या करें जो आंख होते ही अन्धी बन बैठी?

हम भारतीय अपने देश के प्रेम 'ढ़ोंग' में ऐसे अन्धे हो गये हैं कि आपने जो दोष बताये उसे रोज़ रोज़ देखते हुये भी अनदेखा कर देते हैं या यूं कहिये कि उसे देखते रहने की ऐसी आदत हो गयी है कि उसमें कोई बुराई नहीं दिखती।

ऐसे ही 'ढ़ोंगी' प्रेम के कारण देश का नुकसान ज़्यादा हो रहा है - ना देख पाने की क्षमता - हमारा अन्धापन।

ज़रा गौर से पढ़िये ये समाज के वो लोग हैं जो "गुच्चि और बेनेटोन खरीद सकते हैं, कुछ भि नया डिजिटल कैमरा, टीवी आदि खरीद सकते हैं, घर में नये से नये सामान ला सकते हैं, पर अगर आप इस उन्नति को बाहर सामान्य जीवन में ढ़ूँढ़ना चाहेंगे तो दिल्ली की मेट्रो या फ्लाईओवर…… " ये वह लोग हैं जिनके लिये देश की प्रगति का अर्थ है "क्वालिटी आफ़ लाइफ़" इनको अपनी गाड़ी चलाने के लिये फ़्लाई ओवर का होना प्रगति का चिह्न लगता है, भले ही उसके नीचे लावारिस, भूखे और नंगे बच्चे सोते रहें।

सुनील जी, देश में मांल होना प्रगति का प्रतीक अवश्य है, लेकिन जिस तेजी से मांल बढ़ रहे है क्या उस तेज़ी से भूखों के पेट में खाना पहुंचाने की चेष्टा करी जा रही है।

एक दिन भूखे रह कर देखिये शायद आप 'असली तरक्की' का अर्थ समझ जायेंगे।

अनुराग

manisha ने कहा…

anurag ji ka kanha sau phisadi sahi hai ....aachi mansikta hamare desh me nahi hai...log guchi pahankar bhi paan-parag road par ki thookege...aap logo ne un kuch indians ki kahani suni hi hogi jo hawaijahaj me baitha kar cell phone ka aadan pradan kar rahe the jiski wajah ki poore jahaj ko escord karke doosare jagah land harwaya gaya....hya woh indians garreb the?nahi par unme bhi Sunil ji ki tarah yahi dikhawa tha ki cheje hone se aadmi pragati sheel hota hai....nahi bhai achi mansikta aadmi ko mahan banati hai

D K ने कहा…

Yeh kaafi purana vad-vivad ka visay raha hai. Kuch chetra jahan hamne pragati ki hai (hardly 10%); Sanchaar- telephone (pahle marne ke chaar din bad telegram milta tha. Aaj sabjiwala bhi mobile hai), telecast (pehli baar TV maine 1980 mein dekha tha- aaj 100 channel se jyada), postal (courier online track kar sakte hain), airlines (not airports), tej economic growth rate 10%, swatantra aur shaktishali media/press. Hamaari kamjoriyan- Railways (private trains chalaiye- Tata railways, reliance raillines; track sarkari hi ho- to begin with,jaise airport authority), Banks(private bank achche hain jab tak aap ATM tak simit hain, branch jaakar dekhiye, govt bank se bhi bekar),Saf/ safaai(apna ghar saaf karke kuda bahar sadak pe phenko- jaisa desh vaisa bhesh-Indians europe mein thik hote hain aur europians ko banares ki galiyon mein biscuit/ toffee ka wrapper sadak par phenkate hue aap dekh sakte hain),townplanning (Dilli ka masterplan political ho gaya hai-har ghar mein dukaan chal sakti hai), Shikhsa aur naukri ka rajnitikaran, power sector(60 saal ke baad bhi raajdhani dilli mein hi lamba loadshedding hota hai), doosroan ki parvah na karna(Shaadi mein shor- bhale hi board exams chal rahe ho), visphotak jansankhya (saath mein padosi videshiyon ka gairkanooni aagman- bagladeshi, tamil/shrilanka, nepali, bhutani, pakis), vikas ka rajnitikaran (Narmda/tehri/almati/ nandigram jaisi lambit pariyojnaye), Dhulmul Suraksha byavastha (khastaur pe Kashmir aur purvottar rajya). Khsama kijiyega main devnagri lipi mein type karna nahin sikh paya.

-D K Singh Dilli se.

Dr. Mukul Srivastava ने कहा…

आपका ब्लॉग देखा लखनऊ वासी होने से आपसे एक जुडाव हो गया मज़ा आया आपकी लेखनी को पढ़कर उम्मीद करता हूँ सिलसिला चलता रहेगा

बेनामी ने कहा…

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