बुधवार, जून 22, 2005

उलाहना

यदि कभी मुझे इस जगत के रचयिता ब्रह्मा पुराने लखनऊ की तंग गलियों में मिल गये तो मैं उन्हें रोक कर कहूँगा:

ये तुमने अच्छा नहीं किया....
अच्छा नहीं किया इस ग्रह को इतना बड़ा बना कर....
इसे इतने पर्वतों, ताल तल्लैयों और झरनों से सजा कर....
अच्छा नहीं किया इतने प्रणियों से भर कर....
और अनगिनत विविध रंगों से रंग कर.

यदि इसे इतना विस्तृत रचना ही था....
इतना सजाना ही था....
तो मेरी जीवन रेखा भी थोड़ी और लम्बी कर दी होती.

ये तुमने अच्छा नहीं किया....

कहाँ है समय हिमालय की चोटी पर चढ़ कर तुमसे गले लगने का....
प्रशांत की गोद में झूमते हुये रत्नों को चूमने का....
रेगिस्तान में भटक कर स्वयं को ढूँढने का....
कहाँ है समय टूटे हुये तारों को बटोरने का....
पतंग की डोर पर कल्पनाओं को उड़ाने का....
और कहाँ है समय हरी भरी घाटियों में नंगे पाँव दौड़ने का?

ये तुमने अच्छा नहीं किया....
तुम्हें मेरी जीवन रेखा कुछ और लम्बी करनी ही चहिये थी.
*****

5 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

भाई लखनवी

कर्ता से बात उलाहने तक तो ठीक है पर शिकायन नहीं होनी चाहिए। संतोष।

पंकज
http://hindi.pnarula.com/haanbhai

रेलगाड़ी ने कहा…

लखनवी भैया बहुत बढ़िया लिखा है! ऐसे ही आगे भी लिखते रहो, हमें प्रसन्नता होगी पढ़के।

Pratik ने कहा…

मेरे ख्‍याल से अगर उम्र बढ़ाकर दो-तीन सौ साल भी कर दी गयी, तो भी आप नहीं आने वाले कैलीफोर्निया छोड़कर जंगल, पहाड़, झरने, नदिया, झील और वादियाँ देखने के लिये। वैसे.... आप लखनऊ कब से नही आए? :)

रेलगाड़ी ने कहा…

लखनवी जी कहां गायब हो गये आप?

Mridula ने कहा…

I understand this perfectly so little time and money and so much to see!