शुक्रवार, मई 27, 2005

गुलमोहर के पेड़


ये मात्र तीन या चार वर्ष पुरानी बात है मैं समस्त परिवार के साथ खजुराहो गया हुआ था. खजुराहो में अंतिम दिन था और सबने मिल कर ये निर्णय लिया कि इस प्राचीन नगरी से प्रस्थान करने से पूर्व दूल्हा देव के उपेक्षित मन्दिर का भी दर्शन कर लिया जाये. एक कोने में पड़ा ये मन्दिर अकेले ही लू के थपेड़ों को झेल रहा था. कोई भी दूर दूर तक नहीं दिख रहा था. लग रहा था कि जीर्ण शीर्ण अवस्था में खड़ा ये ढांचा अब गिरा तो तब गिरा. हम लोग दूर से ही वास्तुकला की इस कलाकृति को निहार रहे थे - मारे डर के कि कहीं ऊपर ही ना गिर पड़े.

भीषण गर्मी का मौसम था. तपते हुए लावारिस गरम पत्थर, सूखी हुई धरा और मन्दिर के पीछे रक्त वर्ण फूलों से पूरी तरह लदे हुए तीन या चार गुलमोहर के पेड़... मानो कि उस मन्दिर के एकाकी पन को दूर करने का असफल प्रयास कर रहे हों.

उन पेड़ों के नीचे एक दस या बारह साल का लड़का बैठा हुआ था.. उसके तन पर एक पूरी तरह से फटी हुई बनयान और एक अधफटी नेकर.. और साथ में सुस्त पड़ी हुई कुछ बकरियाँ. ऊपर से गुलमोहर के फूल टपक रहे थे उस लड़के के चारों ओर. मैं मन ही मन हँसा - क्या विडम्बना है.. किसके लिये ये फूल गिर रहे हैं? उस लड़के के लिये जिसके पास इन्हें बटोरने के लिये आँचल का एक टुकड़ा तक नहीं.

शायद उसने मेरा मन ही मन हँसना सुन लिया.. पास आया और मुस्करा कर पूछा - सर गाईड चाहिये? पूरे बीस रुपये कमाये उसने. पता नहीं आँचल का एक टुकड़ा खरीद कर गुलमोहर के फूल बटोरे या...

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2 टिप्‍पणियां:

रेलगाड़ी ने कहा…

बहुत ही अच्छा चित्रांकन है इस घटना का!

jitendra ने कहा…

i like ur short story.