शुक्रवार, मई 20, 2005

दुर्दशा

कभी स्वप्न में भी ऐसा भयावह विचार नहीं आया था कि उसका ऐसा हाल हो जायेगा, ऐसी दुर्दशा हो जायेगी. बचपन से ही उसे देखता आ रहा हूँ. उसकी उमर तो उस समय भी अच्छी खासी थी परंतु तब वो इतनी बुढ़िया, थकी माँदी और दयनीय नहीं दिखती थी. गँवार तो वो तब भी दिखती थी पर उसके घर वाले उसे पूरे आदर के साथ सर आँखों पर बिठा कर रखते थे.

दशक बीते और उनके साथ बीती पीढ़ियाँ. और, बदली हुई पीढ़ियाँ अपने साथ लायीं बदले हुये विचार औए एक तथाकतिथ प्रगतिशील द्रष्टिकोण. नयी पीढ़ी के युवा सदस्यों को बुढ़िया का गँवारपन सहन नहीं हुआ. ना जाने क्यों, पर उनको ऐसा लगने लगा कि समाज में अपनी एक सम्मानित छवि बनाने के लिये उन्हें इस बुढ़िया से शीघ्र ही छुटकारा पा लेना चाहिये. घर में जब पढ़े लिखे और देश विदेश के सम्भ्रांत लोग आयेंगे तो क्या सोचेंगे हमारे बारे में यदि ये बुढ़िया उनसे टकरा गयी.

अतः युवा सदस्यों ने एकाकी मत हो कर ये निर्णय लिया कि बुढ़िया और खास कर के उसके गँवारपन के लिये घर में कोई जगह नहीं है. और बस अगले ही दिन बेचारी बुढ़िया आ गयी सड़क पर - ना कोई घर और ना ही कोई ठिकाना. बुढ़िया ने वो सब तो सहन कर लिया पर बात जो उसके ह्र्दय को छेद गयी वो यह कि उसका आदर औए सम्मान कुछ ही क्षणों मे हवा में भाप की तरह विलीन हो गया. इस अपमान के कारण आँखों से अष्रुपात तो नहीं हुआ पर यमराज के दूतों ने हाथ में छड़ी, पीठ पर कूबड़ और चेहरे पर झुर्रियों का रूप लेकर उस बुढ़िया की काया पलट ही कर दी.

अपने ही घर और लोगों से ऐसी उपेक्षा, ऐसा अपमान - दुर्बल अवस्था में, जीर्ण शीर्ण कपड़ों में लिपटी हुई ये बुढ़िया अभी भी जीवित है अपने खोये हुये गौरव एवं महिमा को पुनः पाने के प्रयास में. दिन प्रतिदिन दुर्बल होती हुई इस बुढ़िया को काल ने न जाने कब का ग्रसित कर लिया होता, पर अभी भी कुछ लोग हैं जो यदा कदा इस बुढ़िया के देह में शक्ति का घोल उलट देते हैं. अचम्भे की बात तो यह है कि जहाँ शिक्षित सम्मानित लोग हेय द्रष्टि से देख कर उससे दूर भागना चाहते हैं वहीं झोपड़ पट्टी वाले उसकी अवस्था की परवाह बिना किये कभी कभी उसकी सेवा में रत हो जाते हैं.

प्रतिदिन देखता हूँ उस दयनीय बुढ़िया को. कभी कभी मन कहता है कि ये वो नहीं हो सकती है जो मेरे विद्यालय के दिनों में बन ठन के रहा करती थी. रंग रूप और काया से तो वो नहीं प्रतीत होती है. आज सुबह सुबह गली में दिख गयी - मैंने सोचा आज उस से नाम पूछ कर इस बात की संतुष्टि कर ही ली जाये कि ये वही बुढ़िया है या कोई और.

थोड़ा संकोच के साथ मैं उसके पास गया और धीमे से पूछा, "आपका नाम क्या है?" उसने कूबड़ को सीधा करने के असफल प्रयास के साथ धरा को ताकती हुई आँखों को ऊपर उठाया और मेरी ओर अचरज से देखा. मैं सोच रहा था कि उसके नेत्र नम और दयनीय से दिखेंगे, पर मुझे उनमें गर्व की झलक दिखाई दी. हाँ वाणी अवश्य दुर्बल थी. उसी दुर्बल वाणी में उस बुढ़िया ने लड़खड़ाते हुये उत्तर दिया, "हिन्दी, मेरा नाम हिन्दी है."
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15 टिप्‍पणियां:

Atul Arora ने कहा…

सुँदर
पहली बार किसी लकनवी का हिंदी ब्लाग नजर आया| थोड़ी साज सज्जा करके धमाकेदार आगाज करिए चिठ्ठा जगत में| इधरे कई नये चिठ्ठे उतरे हैं मैदान में | आपका भी स्वागत है|

मिर्ची सेठ ने कहा…

बहुत अच्छे मित्र। ऐसे ही लिखते रहो। क्या पता यही इस बुढ़िया के गालों की लाली वापिस ले आए।

मिर्ची सेठ ने कहा…

और मियाँ, कैलिफोरनिया में कहाँ से हो उत्तरी कोने मे बैइठो हो कि दखिन भाग के निवासी हो। तनिक बताईए तो सही। हमहुँ तो सिली वैली के बाशिंदे हैं।

पंकज
http://hindi.pnarula.com/haanbhai

अतुल श्रीवास्तव ने कहा…

पंकज (उर्फ मिर्ची सेठ) - मैं सैक्रामेंटो में रहता हूँ. ई-मेल के द्वारा विस्तार में बातें हो सकती हैं : shriatku@yahoo.com.

Jitendra Chaudhary ने कहा…

अतुल लखनवी को मेरा प्यार भरा सलाम......अरे नही नही, ये बिनाका गीत माला नही है, ये तो हम है, आपके पड़ोसी, जीतू कानपुरी,
अतुल भाई, आपका हिन्दी ब्लाग जगत मे बहुत बहुत स्वागत, बहुत मजा आयेगा, जब मिल बैठेंगे चार यार.... आप,मै,अतुल रोजनामची ‌और .... (अरें ये तो फिर विज्ञापन हो गया)

खैर भईया, लिखते रहो, किसी भी प्रकार की सहायता की आवश्यकता हो तो बस, अपनी खिड़की से एक आवाज देना, हाजिर हो जायेंगे, आपकी सेवा मे.

आशीष ने कहा…

स्वागत है आपका हिंदी ब्लाग जगत में। हिन्दी की देशव्यापक दुर्दशा का सटीक वर्णन किया है, आशा है कि लोग चेतेंगे।

अनूप शुक्ला ने कहा…

हिंदी की बड़ी दीन-हीन हालत में खोला खाता। बहरहाल बधाई हिंदी चिट्ठा शुरु करने के लिये। शुभकामनायें आगे लिखने के लिये।अतुल नाम के चलते अब हमें या तो अरोरा /श्रीवास्तव की शरण लेनी पड़ेगी या फिर नंबर देना पड़ेगा।तो लखनऊ से भी दो लोग हो गये । फिर से बधाई।

Tarun ने कहा…

badhai ho latul lakhnavi hindi chithha suru karne ka. saath me swagat hai hindi chitha vishva me. Hindi ki durdasha sahi bayan kari hai.

प्रेम पीयूष ने कहा…

श्रीवास्तवजी,
बढिया लिखा हैं साहब, हमारी टोली यूँ ही बढती रहे,
ऐसी ही कामना लेकर तहे दिल से आपका स्वागत करते हैं ।

Raman ने कहा…

अतुल जी,

हमारी बधाइयों को भी झेलिये.. हिन्दी की दुर्दशा के बारे में आपने लिखा है.. इसमें जरुर कोई शक नहीं
कि अंग्रेजी के मुकाबले में हिन्दी की हालत शायद कुछ कमजोर है लेकिन बाकी भारतीय भाषाओं के मुकाबले में हिन्दी की हालत काफ़ी बेहतर है और हिन्दी का प्रभाव, प्रचार और प्रसार दिनोंदिन बढ़ रहा है. अगर आप हिन्दी को अधमरा कहेंगे तो कुछ दूसरी भारतीय भाषाओं (जैसे कि काश्मीरी,सिन्धी,कोंकणी ... वगैरह) को पूरा मरा हुआ कह सकते हैं.

रेलगाड़ी ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने..ऐसे ही आगे भी लिखते रहिये

बेनामी ने कहा…

अतुल की रचनायें पढ़ कर मन आनन्दित हुआ ।अपनी धरती से दूर हो कर भी उसे अपने में बसाये रखना और उससे इतना जुड़े रहना बड़ी बात है ।
इन रचनाओं में अपने देश और अपनी भाषा से जुड़ी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति सहज-सरल भाषा में हुई है जो मन को प्रभावित करती है ।हास्य-व्यंग्य ने लेखन शैली को पैना और विषय को इतना रुचिकर बना दिया है कि बीच में छोड़ने का मन नहीं होता ,पूरा पढ़ना ही पड़ता है ।
टेक्नालॉजी के क्षेत्र में इतना आगे होने के बावजूद, इस देश और परिवेश में साहित्य-विशेष कर हिन्दी साहित्य -से जुड़ाव बहुत कम देखने को मिलता है ।
इन मनोरम रचनाओं के लये अतुल को बधाई
-- प्रतिभा सकेसेना

Derrick ने कहा…

Atul Ji Ek pal ke liye aankhen bheeg gayee apki rachna padhke..bahut badhiya likha hai...Saraswati Mata ka aashirwad hamesha rahe aapke saath yehi prathna hai..

D K ने कहा…

Hindi ki durdashaa to ho hi gayi hai lekin dar hai kahin yeh bhi Sanskrit ki tarh swargvaasi na ho jaya. Hindi filmon ki vazah se logon ki ruchi bani hai anyatha...

लेख बनायें Editor * FREE ACTIVATION ने कहा…

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