शुक्रवार, सितंबर 28, 2007

सत्य वचन - कटु वचन....

इतनी सरलता, सहजता और संवेदना से मैं भी ये विचार व्यक्त नहीं कर सकता था....





सोमवार, अगस्त 13, 2007

कल, आज और कल - हैप्पी इंडिपेंडेंस डे!!

नवभारत टाईम्स
15 अगस्त, 1977
आज भारत की स्वाधीनता दिवस के पावन पर्व पर प्रधान मंत्री ने ध्वजारोपण के समय देश की समस्त जनता को बधाई दी और देश वासियों से भारत की बहु-आयामी प्रगति में जुट जाने के लिये आग्रह किया. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कई नगरों में झाकियाँ निकाली गयीं और विद्यालयों में छात्रों के लिये मिष्ठान वितरण किया गया...

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नवभारत टाईम्स
15 अगस्त, 2007
आज इंडिया की इंडिपेंडेंस डे के मौके पर प्राईम मिनिस्टर ने फ्लैग सेरोमेनी के समय देश की सारी पॉपुलेशन को कॉंग्रचुलेट किया और सभी सिटिज़ेंस से ये रिक्वेस्ट किया कि वो इंडिया की ऑल-डाईमेंशन प्रोग्रेस में लग जायें. आज इंडपेंडंस डे के दिन कई शहरों में परेड ऑर्गनाईज़ की गयीं और स्कूल्स में स्टुडेंट्स में मिठाईयाँ डिस्ट्रीब्यूट की गयीं...
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Navabhaarat Times
August 15, 2027

Aaj India kee Independence Day ke occasion par Prime Minister ne flag ceremony ke time country kee entire populations ko congratulate kiya aur sabhi citizens se ye request kari ki vo India ki all-dimension progress mein involve ho jayen. Aaj Independence Day ke din kai cities mein parades organize kee gayi aur schools mein students ke liye sweets distribute kee gayee…


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वो कौन थी?

राहुल ने बधाई पत्र को उसके आवरण से निकाल कर पढ़ना प्रारंभ किया, “जीवन का अर्ध शतक सफलतापूर्वक पूर्ण करने की हार्दिक बधाई. आशा है शतक के उत्सव में भी हम सबको आमंत्रित किया जायेगा.”

राहुल ने मुस्कराते हुए सबको धन्यवाद दिया और मेज पर रखे केक पर लगी हुई मोमबत्तियाँ बुझा कर केक को काटने ही जा रहा था कि दृष्टि चौखट पर खड़ी एक छोटी सी लड़की पर जा टिकी. छः या सात साल की वो लड़की मंद मंद मुस्कान के साथ अपने आप को दरवाजे के पीछे छुपाने का असफल प्रयास कर रही थी. राहुल हाथ के इशारे से उसे अंदर बुलाने लगा. सरिता, राहुल की पत्नी, ने पीछे से आकर पूछा, “ये हाथ के इशारे से किसको अंदर बुला रहे हो?”

“वो चौखट पर जो छोटी सी लड़की खड़ी है उसी को अंदर बुला रहा हूँ. बहुत प्यारी सी है. सोचा उसको भी अपने जन्म दिवस की खुशी में सम्मलित कर लूँ.”

“पर वहाँ पर तो कोई नहीं है.”

“चौखट के पीछे ही तो खड़ी थी. लगता है भीड़ देख कर भाग गयी.”

“पर राहुल चौखट तक कोई आ ही नहीं सकता है. बाहर के गेट पर ताला लगा हुआ है. तुमको कोई भ्रम हुआ होगा.”

रात पूर्णतः फैल चुकी थी - अतिथियों ने एक बार पुनः राहुल को पचासवें जन्मदिवस की बधाई दी और एक एक कर के विदा ली. सभी लोगों के चले जाने के बाद सरिता ने राहुल से कहा, “थक गये होगे. तुम चल कर सोने की तैय्यारी करो. मैं बस थोड़ी सफाई कर के आती हूँ.”

राहुल अपने कमरे के दरवाजे तक पहुँचा ही था कि उसे अंदर से एक छोटी लड़की के खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी – कमरे में पहुँचा तो देखा वही छोटी लड़की बिस्तर पर उछल रही थी. पर इस बार उसके बाल दूसरी तरह से बने हुये थे और कपड़े भी भिन्न थे.

“तुम यहाँ कैसे आ गयी?”

ये सुनते ही वो बच्ची बिस्तर से कूद कर खिलखिलाती हुई कमरे में इधर उधर भागने लगी और राहुल भी एक बच्चे की तरह उसका पीछा करने लगा, “ठहर. अभी पकड़ कर मैं तुम्हारी खैर लेता हूँ. तुम हो कौन? यहाँ कैसे आई?”

“राहुल ये क्या बच्चों की तरह भाग दौड़ कर रहे हो? और, ये बातें किससे कर रहे हो?”, सरिता ने पीछे से टोका.

“अरे वही छोटी लड़की....”

“राहुल ये अचानक क्या हो गया है तुमको? थक गये हो चलो अब सो जाओ.”

बिस्तर पर आँख मूँद कर आधा घंटे लेटने के बाद भी राहुल को झपकी नहीं लगी. उठ कर बाहर के कमरे की तरफ चल पड़ा पानी पीने के लिये. जैसे ही राहुल ने फ्रिज खोला, उसकी रोशनी में उसे फ्रिज के बगल में सलवार कुर्ते में सजी एक पंद्रह या सोलह वर्ष की युवती खड़ी दिखाई दी जो राहुल को एकटक देखे जा रही थी. अचंभे की बात कि राहुल को किसी भी प्रकार के भय का अनुभव नहीं हुआ.

“कौन हो तुम? अंदर कैसे आ गई सारे दरवाजे और खिड़कियाँ तो अच्छे से बंद हैं. तुम्हारी शकल तो बिल्कुल उस बच्ची से मिलती है जो अभी कुछ देर पहले मेरे सोने के कमरे में उछल कूद मचा रही थी. लगता है जैसे कि मैं तुम्हें पहले से जानता हूँ. कृपया अपना नाम बताओ.”

राहुल की बड़बड़ाहट से सरिता की आँख खुल गयी. सरिता ने बाहर आ कर देखा कि राहुल फ्रिज का दरवाजा खोल कर अपने आप से ही बातें किये जा रहा था.

“राहुल तबियत ठीक नहीं लग रही है क्या?”

“मैं तो ठीक हूँ. पर इस लड़की से पूछो कि ये अंदर कैसे आ गयी.”

“पर राहुल वहाँ तो कोई भी नहीं है. मुझको तो अब डर लगना शुरू हो गया है. कहीं कोई भटकती हुई आत्मा तो नहीं है? कुछ कहती है तुमसे?”

“कुछ नहीं. बस मंद मंद मुस्कराती रहती है.”

“अभी भी खड़ी है वहाँ पर?”

“नहीं अब चली गयी है.”

राहुल और सरिता दोनों कमरे में आकर सोने का असफल प्रयास करने लगे. सरिता को नींद नहीं आ रही थी भय के कारण, और राहुल सोच रहा था कि वो बच्ची इतनी शीघ्र इतनी बड़ी कैसे हो गयी.

अगले दिन सरिता को कार्यवश घर से बाहर जाना पड़ा. सरिता की अनुपस्तिथि में उसका चाय पीने का मन होने लगा – अतः उठ कर रसोई में जाकर चाय बनाने लगा. पानी के साथ साथ दूध, अदरक और चाय की पत्ती भी खौलने लगे कि राहुल को याद आया कि चीनी का डिब्बा तो बाहर के कमरे में रखा है. वो जब चीना का डिब्बा ले कर लौटा तो देखा कि गैस के चूल्हे के बगल में साड़ी में लिपटी हुई बीस या बाईस साल की एक युवती खड़ी थी. राहुल कुछ कहता उससे पहले ही वो युवती बोल पड़ी, “चाय कबसे बनानी शुरू कर दी? याद है पहली बार जब चाय बनाई थी तो चीनी की जगह नमक डाल दिया था.”

“तुमको कैसे पता?”

युवती कोई उत्तर देती उससे पहले ही घंटी बज उठी. राहुल ने दरवाजा खोला.

“ड्राई क्लीनिंग करवाने वाले कपड़े तो घर में ही भूल गई थी.”, कहते हुए सरिता अंदर आ गई और राहुल को विचलित देख कर पूछा, ““क्या हुआ राहुल? सब ठीक तो है?”

“रसोई में एक औरत खड़ी है.”

सरिता ने भाग कर रसोई में झाँका, “यहाँ तो कोई भी नहीं है. मुझे तो बहुत डर लग रहा है. ऐसा करो तुम घर में अकेले मत रहो. बाहर जा कर पार्क में टहल आओ. मैं ढाई तीन घंटे में वापस आ जाऊँगी.”

राहुल ने स्वीकृति में सर हिलाया और अकेले का समय व्यतीत करने के लिये पार्क में जाकर बैठ गया. अपने चारों ओर टहलते हुये लोगों और इधर उधर भागते हुये बच्चों को निहारने लगा कि अचानक उसकी दृष्टि कोने में अकेले खड़ी हुई एक दस या ग्यारह साल की लड़की पर पड़ी. वही चेहरा.... वो लड़की राहुल को अपने पास बुलाने लगी और राहुल सम्मोहित सा उसकी ओर बढ़ चला. थोड़ी ही देर में राहुल भी उस लड़की के साथ बाकी के बच्चों की तरह खिलखिलाते हुये भाग दौड़ करने लगा. समय कब व्यतीत हो गया उसे तब पता चला जब पीछे से सरिता की आवाज आई, “घर चलें?”

रास्ते में बगल में रहने वाले शर्मा दम्पति मिले. श्रीमति शर्मा ने सरिता से कहा, “आज तो भाई साहब बिलकुल बच्चों की तरह पार्क में खेल रहे थे और वो भी अकेले.”

“पर मैं अकेले...” राहुल ने अपना वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया.

“चलो पार्क में तुम्हारा मन लग गया. पर अकेले ही भाग दौड़...”, घर पहुँच कर सरिता ने राहुल से कहा.
“मैं अकेले नहीं था. मैं तो एक दस या ग्यारह साल की लड़की के साथ... और अचंभे की बात तो ये है कि उसकी शक्ल बिल्कुल उस छोटी बच्ची, किशोर लड़की और युवती से मिलती जुलती थी.”

“राहुल तुम मुझे बहुत डरा रहे हो. मैं सोच रही हूँ पंडित जी को बुलाया जाये. खैर मैं खाना बनाने जा रही हूँ जब तक तुम ऊपर वाले कमरे का फ्यूज़ बल्ब बदल दो. मैं बल्ब ले आई हूँ बाहर के मेज पर रखा है.”

राहुल ने बल्ब उठाया और ऊपर के कमरे की ओर चल पड़ा. ऊपर पहुँचा तो उसने देखा कि कमरे में रखी हुई कुर्सी पर गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहने हुये लंबे बालों वाली लगभग उन्नीस वर्षीय एक युवती बैठी हुई है.

“कौन हो तुम? हर बार अलग अलग वेश-भूषा और आयु में दिखती हो.... मेरे अतिरिक्त किसी और को क्यों नहीं दिखायी देती हो?”

“राहुल मैं मात्र तुम्हारे जीवन का अंश हूँ किसी और को कैसे दिखाई पड़ सकती हूँ? तुम्हें पता है मैं कौन हूँ परंतु न जाने क्यों तुम मुझे स्वीकार करने का साहस नहीं कर पा रहे हो.”

“नहीं पता है मुझे कि कौन हो तुम. क्या नाम है तुम्हारा?”

“मेरा नाम जानने की जिज्ञासा है? मेरा नाम स्मृति है.”

ये सुन कर राहुल कुछ देर चुप रहा और फिर धीरे से बोला, “स्मृति – मेरे बचपन और युवा अवस्था की स्मृति. स्मृति, तुम बहुत निष्ठुर हो.”
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टिस्क!

मेरे एक पुराने घनिष्ठ मित्र हैं आत्म त्रिवेदी. सातवीं कक्षा से लेकर बारहवीं तक मैं और मेरे समस्त साथी गण इन्हें पंडत (पंडित का बिगड़ा रूप) कह कर ही सम्बोधित करते आये हैं.

जब हम सबने नवीं कक्षा में पदार्पण किया तो चिकित्सक बनने की चाह वालों ने जीव विज्ञान और अभियंता बनने का स्वप्न देखने वालों ने गणित का चयन किया. पंडत हिन्दी का पुजारी और भक्त था. जयशंकर प्रसाद और रामधारी सिंह “दिनकर” जैसे लोग उसके प्रेरणा पात्र थे. पंडत का स्वप्न था एक कवि, लेखक और उद्घोषक बनने का. अतः बिना किसी झिझक के उसने जीव विज्ञान और गणित का परित्याग कर के संस्कृत के चरणों में मस्तक रख दिया.

समय बीता – कुछ यार दोस्त डॉक्टर बन गये और कुछ रो पीट कर अभियंता. और, पंडत इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी और संस्कृत का विद्वान बन कर प्रकट हुआ.

पंडत के लेख और कवितायें धर्मयुग और सारिका जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगे. कुछ ही वर्षों में भारी भरकम वेतन के साथ एक मासिक हिन्दी पत्रिका का संपादक भी बन बैठा. पर ये सब तो लगभग बीस-पच्चीस साल पुरानी बात है. समय कुछ अधिक तेजी से ही बदला. समय के हथौड़े से धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं की दोनों टाँगें टूट गयीं - कुछ समय तक तो घिसट घिसट कर चलती रहीं, पर अंततः लाभ और हानि के आँकणों के सामने आकर दम तोड़ दिया. अब भला पंडत की छोटी सी पत्रिका की क्या औकात - उसे भी कुछ वर्षों के उपराँत आत्म-दाह करना ही पड़ गया.

तैंतालीस वर्ष की आयु में पंडत एक बार पुनः ढंग की नौकरी ढूँढने में लग गया. घर में बीबी उलाहना देती फिरती – अरे अगर अंग्रेजी में कुछ किया होता तो कम से कम “एक महिने में फ़र्राटे दार अंग्रेजी बोलना सीखें” जैसे कोचिंग कॉलेज में ठीक ठाक नौकरी मिल जाती. पंडत का पंद्रह साल का किशोर लड़का भी दुखी रहता कि उसके “डैड” बिलकुल भी “कूल” नहीं है.


पंडत के पास कुछ एक हिन्दी के समाचार पत्रों से प्रस्ताव आये, पर इन समाचार पत्रों के हिन्दी के निम्न और घटिया स्तर को देख कर उसका मन खिन्न हो उठा. साथ में उसे ये भी लगा कि इन समाचार पत्रों में नौकरी करने से वो कभी भी अपने पुत्र के लिये एक “कूल डैड” नहीं बन सकेगा.

बस इसी उधेड़बुन के साथ पंडत मेरे साथ बैठा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था, और साथ में बैठे थे मेरे एक और मित्र राजीव सिंह. राजीव ने पंडत की करुण गाथा सुनी और गला खंखारते हुये पंडत को सलाह दी, “त्रिवेदी भाई आप कहानियाँ लिखते हो, कवितायें रचते हो. अपने इन गुणों का सदुपयोग “बॉलीवुड” में क्यों नहीं करते हो? और, आपके बेटे को भी ये कहते हुये गर्व होगा कि उसका “डैडी” भी बॉलीवुड की एक हस्ती है. अगर आप जरा भी रुचि रखते हों तो बेझिझक मुझे बतायें मैं आपकी भेंट बॉलीवुड की कुछ हस्तियों से करवा दूँगा.” मैंने राजीव को एक तिरछी प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. राजीव ने मेरी ओर मुस्कुराते हुये कहा, “अरे भाई ऐसे क्यों देख रहे हो. मुम्बई में नौकरी के साथ साथ रंगमंच पर भी काम करता हूँ. उसी के जरिये किरन गौहर से भेंट हो गयी और उसकी तीन चार फिल्मों में छोटी मोटी भूमिकायें करने को मिल गयीं. किरन से मेरी ठीक ठाक जान पहचान है.”

पंडत ने उत्सुकता से कहा, “हाँ एक महिला के लिये साहित्यिक कार्य करना अच्छा भी रहेगा क्यों कि पुरुषों की अपेक्षा महिलायें अधिक संवेदनाशील होती हैं.” राजीव ने हँस कर उत्तर दिया, “त्रिवेदी भाई, किरन गौहर कोई औरत वौरत नहीं बल्कि आदमी हैं. हाँ हाव भाव अवश्य महिलाओं जैसे हैं. लगता है आपने उनकी ब्लॉक-बस्टर फिल्में देखी नहीं हैं. ‘कभी सुट्टा कभी रम’, ‘कभी आलू बड़ी न खाना’ और ‘कब्ज़ हो न हो’ जैसी महान कृतियाँ उन्हीं के दिमाग की उपज हैं.”

खैर, पंडत ने राजीव की सलाह स्वीकार कर ली और पहुँच गया मुम्बई अपनी लेखनी से सबको सम्मोहित करने. पंडत का सौभाग्य कि किरन ने “क” अक्षर से एक और “कूड़ा” बनाने का निर्णय लिया और एक नये गीतकार की खोज प्रारंभ हो गयी. राजीव भी मौके का लाभ उठाते हुये पंडत को लेकर किरन के समक्ष उपस्थित हो गया. किरन ने मुस्करा कर पंडत और राजीव से पूछा, “विल यू लाईक टु हैव कॉफी विद किरन गौहर.” सारी बेकार की औपचारिकताओं के बाद किरन ने पंडत से कहा, “आत्म डियर, हेयर इज़ ए सीन फ्रॉम माई न्यू मूवी. हेरोईन इज़ गेटिंग मैरिड. हर फ्रेंड्स ऐंड रिलेटिव्ज़ आर सिलेब्रेटिंग, डाँसिंग ऐंड सिंगिंग. कैन यू राईट ए नाईस साँग फॉर दिस सिचुएशन?”

पंडत हाथ में कलम और एक पन्ना लेकर कोने में जा बैठा. करीब आधा घंटा तक सर खुजाने के बाद पंडत के दिमाग के घोड़े थोड़े गतिशील हुये. कुछ देर के बाद वो किरन के समक्ष अपनी रचना लेकर उपस्तिथ हुआ -

सखी तुझे इस पावन बेला पर क्या दूँ मैं उपहार,
बस प्यार के इस दोने में कर कुछ स्मृतियाँ स्वीकार.
जब पिया जायें परदेस, और अकेली हो तुम साँझ सवेरे,
चुम्बन कर लेना दोने का, आ जाऊँगी झूले की पेंग लगा आँगन में तेरे.

“होल्ड इट होल्ड इट.” किरन ने झुँझलाते हुये कहा, “ये कौन सी लैंग्वेज़ में लिख रहे हो? आई आस्क्ड यू टु राईट इन हिन्दी, नॉट इन संस्कृत. ये सब कौन से वर्ड हैं? हू विल अंडरस्टैंड दीज़ – दोना, स्वीकार, उपहार ऐंड समरितया व्हाट एवर दैट इज़. आई वान्ट समथिंग मॉडर्न, पेपी ऐंड स्टाईलिश.”

पंडत को एक हजार वोल्ट का झटका लग गया. बेचारा आँसुओं को किसी तरह रोक कर राजीव के साथ भौंचक्का सा वापस घर आ गया. उसी शाम को राजीव के घर राजीव के एक सॉफ्टवियर इंजीनियर मित्र नितिन पधारे. पंडत से भी मिले. कॉफी पी, समोसे खाये और साथ में गीत लेखन से संबन्धित सुबह का किस्सा सुना. नितिन ने हँसते हुये कहा, “आत्म यार तुम भी कहाँ अकल के घोड़े दौड़ाने में लग गये. कंप्यूटर का जमाना है. अब अगर कंप्यूटर सारे वाद्य यंत्रों की जगह ले सकता है तो गीत की धुन क्यों नहीं बना सकता है? अरे मैं तो यह भी कहूँगा कि गीत की रचना क्यों नहीं कर सकता है? मानता हूँ कि ऐसे गीतों में कोई भावना या मादकता नहीं होगी, पर आजकल संगीत भी तो हर चीज की तरह एक प्रयोज्य (disposable) वस्तु होकर ही तो रह गया है. मैंने एक सॉफ्टवेयर लिखा है “टिस्क” (TISC – The Incredible Song Constructor). आप इसमें अपने मनपसंद शब्दों की सूची डाल दीजिये, “गीत रचना” बटन पर क्लिक कीजिये – बस मेरा जादुई “टिस्क” शब्दों की सूची में से कुछ शब्दों का चुनाव कर के उन्हें एक अनियमित क्रम में रख कर गीत बना डालेगा. मैं अभी ऑफिस से ही आ रहा हूँ. मेरा लैपटॉप साथ में है, अगर तुम चाहो तो “टिस्क” का प्रयोग कर के देख लो.”

पंडत ने मरे मन से कहा – चलो ये भी कर के देख लिया जाये. लैपटॉप चलाया गया. “टिस्क” में गीत श्रेणी चुनी गयी “मॉडर्न”. “मॉडर्न” श्रेणी के लिये नीचे लिखे शब्द पहले से ही शब्द-सूची में पड़े हुये थे:

माही
बल्ले बल्ले
हड़िप्पा
चूड़ियाँ
शरारा
बेबी
पार्टी
लव
यू
कुड़ी
किस
आई
वाना (वांट टू)
आहा आहा
यो
कूल
रब्बा
ओ या
गल
नसीबा
और भी कई अंग्रेजी और पंजाबी के शब्द....

पंडत ने धड़कते हृदय से “गीत रचना” वाला बटन क्लिक कर किया, और ये लो लैपटॉप की स्क्रीन पर एक “मॉडर्न” गीत तैय्यार हो कर आ गया:

ओ या
आहा आहा
ओ या
यो बेबी यो बेबी, ओ या
आई वाना टेल यू आहा आहा
वाना वाना टेल यू बेबी
यू कूल यू क्यूट, आई लव यू ओ या
ओ....
माही.. माही वे...
रब्बा तेरे नसीबा आया...
एक कूल डूड... हाऊज़ दैट..
हियर इज़ द पार्टी...
ओ या
मैं हाथों विच लगा दे मेंहदी..
बालों विच लगा दे गजरा..
पहन दे शरारा...
यो बेबी यू डाँस.
मेरी प्यारी कुड़ी बनी एक दुल्हन...
आई वाना किस यू, वाना वाना किस यू बेबी...
हाऊज़ दैट..
ओ या.

ये पढ़ कर पंडत ने अपना माथा मेज पर दे मारा, बोला, “ये क्या कचरा है. इसको गीत कहते हो?” नितिन ने तत्परता से कहा, “अरे पहले इसे किरन को सुना कर आओ फिर कुछ कहना.”


अगले दिन सुबह सुबह ही पंडत और राजीव जा पहुँचे किरन के घर और पंडत ने एक ही साँस में “अपना” नया “साँग” सुना डाला. “साँग” खतम होने के बाद कमरे में कुछ देर शांति छाई रही, फिर अचानक किरन ने दौड़ कर पंडत को गले लगाते हुये कहा, “फेंटास्टिक, सुपर्ब, माईंड-ब्लोईंग.” पंडत की बोहनी हो गयी और वो एक बार पुनः प्रसिद्धि के पथ पर चल पड़ा.

पिछले हफ्ते काम के सिलसिले में मुम्बई जाना हुआ. पंडत से मिलने उसके घर भी गया. घर और घर की साज सज्जा से पंडत की नयी संपन्नता झलक रही थी. मैंने पंडत से उसके पुनर्जन्म और नये अवतार के बारे में पूछा. एक लम्बी सी आह भरते हुए पंडत ने कहा, “लड़का मुझ पर गर्व करने लग गया है. बीबी भी खुश रहती है. लक्ष्मी देवी भी कृपालु हो गयी हैं. पर ये सब मुझे प्राप्त हुआ है आत्म त्रिवेदी की हत्या कर के. बस यही सोच कर हृदय से ग्लानि का बोझा हटाने का प्रयत्न करता हूँ कि आत्म त्रिवेदी को मैंने अकेले ही नहीं मारा है. उसके और उसके जैसे कई और लोगों की आसमयिक मृत्यु के लिये भारत के कई बड़े नगरों की बड़ी जनसंख्या उत्तरदायी है. दिल ढूँढता है फिर वही....”

साहिर, शैलेन्द्र, कैफी आज़मी और गुलज़ार को समर्पित.
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मंगलवार, मई 08, 2007

ऐसा और कहाँ....

कई दिनों की व्यस्तता के पश्चात पिछले सप्ताहाँत थोड़ा खाली समय मिला. सोचा चलो कुछ घुमाई कर ली जाये. जंग खाती हुई अपनी दस-बारह साल पुरानी खटारा मारुति निकाली और चल पड़ा कनॉट प्लेस की ओर.

किस्मत ने थोड़ा साथ दिया और आसानी से पार्किंग मिल गई. अपनी कार खड़ी ही कर रहा था कि बिना चाहते हुए भी बगल में खड़ी चमचमाती हुई टोयोटा कैमरी पर नजर पड़ ही गयी. सुना है मिला जुला कर तकरीबन बीस या पच्चीस लाख की पड़ती है. मन ही मन सोचा किसी नेता, अभिनेता या स्मगलर की होगी – बिना चोरी चमारी किये कोई इतना पैसा कमा ही नहीं सकता है कि ऐसी कार खरीद सके. चाभी उमेंठ कर अपनी कार का दरवाजा बंद कर के चलने ही वाला था कि बगल वाली कार के रिमोट दरवाजों की बंद होने वाली ध्वनि ने एक बार पुनः ध्यान आकर्षित कर लिया. देखा कार के बगल में अपनी ही उमर के एक महानुभाव सूट और टाई लगाये खड़े हुये थे. नजरें थोड़ी और पैनी हुई तो हाथ में कीमती विदेशी घड़ी और आँखों पर असली रे-बैन का धूप का चश्मा भी दिख गया. रे-बैन से जब नजरें हटीं तो चेहरे पर भी ध्यान चला गया – चेहरा कुछ पहचाना सा लगा. अरे ये तो मनोज सिंह लगता है. पर मन ने ये स्वीकार करने से साफ मना कर दिया.

मनोज सिंह आठवीं से लेकर बारहवीं तक मेरी ही कक्षा में हुआ करता था. पढ़ने लिखने में सबसे पीछे, पर आवारागर्दी, सिगरेट पीने, स्कूल कट करने और बाकी की सभी दुर्गणों में अग्रणी था. जिस प्रकार हिन्दी फिल्मों का नायक लफंगागिरी, आवारागर्दी, चोरी चमारी वगैरह वगैरह करने के उपराँत भी एक नेक इंसान और दिल का अच्छा होता है; उसी प्रकार मनोज भी दिल का बहुत साफ था – और, मात्र इसी कारण मेरी उससे बात चीत हो जाती थी. परंतु मैं था पढ़ाई में अग्रणी. अतः मेरे सभी हितैषियों ने सलाह दी कि मनोज जैसे प्राणी से मुझे कोसों दूर रहना चाहिये. उसके बाद से मेरी मनोज से भूले भटके साल में दो या तीन बार बात हो जाती थी – वो भी तब जब उसका मन गलती से विद्यालय-दर्शन के लिये आतुर हो जाता था. बारहवीं के बाद मैं घिस-घिसा कर भारत के अग्रणी इंजीनियरिंग कालेज में पहुँच गया. कुछ साल के बाद पता चला कि मनोज ने फैज़ाबाद से बी.ए. कर के पढ़ाई छोड़ दी थी और घर में खाली बैठ कर अपने पिताजी का रक्तचाप बढ़ाने में लग गया था.

इतनी घिसाई करने के बाद मैं एक पुरानी मारुति में और मनोज सिंह कैमरी में – ये कुनैन की गोली तो निगली ही नहीं जा पा रही थी. खैर दिल थोड़ा बड़ा कर के मैं उन महानुभाव की ओर बढ़ा और हिम्मत कर के एक प्रश्नवाचक दृष्टि से पूछा, “मनोज सिं...?”


“अरे अतुल! क्या बात है. पूरे 25 साल बाद मिल रहे होंगे. हाँ भाई मैं वही पुराना मनोज हूँ.”

“पुराने वाले मनोज तो नहीं हो सकते हो – ये गाड़ी, ये ठाठ... नेता बन गये, पुलिस में भर्ती हो गये या स्मगलिंग वगैरह करने लग गये?”

“ऐसा कुछ नहीं है. यार मैं आवारा और लफंगा जरूर था पर किसी को नुकसान पहुँचाने वाला गैर कानूनी काम न तो कभी किया और न ही करने का विचार है.”

“तो ये नई नई कैमरी...?”

“अरे यार ये तो भारतीय क्रिकेट टीम के वर्ड कप से बाहर हो जाने का परिणाम है.”

“सट्टा बाजी की थी क्या?”

“तौबा तौबा. भाई मैं इज्जतदार बिजनेस मैन हूँ. अपनी फैक्टरी है. अभी मुझे एक जरूरी मीटिंग में जाना है. अपना पता बताओ मैं कल तुम्हारे घर आता हूँ.”

मैंने अपना कार्ड मनोज के हाथों में थमाया और हम दोनों अपने अपने रास्ते निकल गये. अगले दिन सुबह सुबह ही मनोज घर आ धमका. पाँच दस मिनट बैठा और बोला, “चलो तुमको अपनी फैक्टरी ले चलता हूँ.”

मैं तैय्यार हो कर उसके साथ निकल पड़ा – मन आतुर हो रहा था मनोज की सफलता का रहस्य जानने के लिये. आधे घंटे के बाद मैं उसकी नौएडा की फैक्टरी की सामने खड़ा था. फैक्टरी में जाने से पहले मैंने पूछा, “मनोज, फैक्टरी तो देख ही लेंगे पर पहले ये बताओ कि वर्ड कप और कैमरी का क्या संबंध है.”

“अतुल भाई ये बताओ कि भारत में लोग सबसे अधिक समय क्या करने में बरबाद करते हैं?”

“इस तरफ तो कभी सोचा ही नहीं.”

“मैं बताता हूँ – हड़ताल, धरना देना, मोर्चा निकालना, तोड़ फोड़ करना और इसी से मिलती जुलती कई तरह की हरकतें करना. अब ये बताओ कि इन हरकतों को सफलतापूर्वक करने के लिये किन किन चीजों की आवश्यकता पड़ती है?”

“लोगों की?”

“अरे भारत में फालतू के लोग हजारों लाखों में मिल जाते हैं. लोगों के अलावा जरूरत होती है मालों की, जूते चप्पलों की, पुतलों की, बैनर्स की. जिस दिन भारत वर्ड कप से बाहर हुया – मुझे पता था कि अगले ही दिन पूरे भारत में गली गली धरने दिये जायेंगे; जुलूस निकलेंगे; क्रिकेट की अर्थियाँ जलाई जायेंगी; सचिन, राहुल और धोनी वगैरह के पुतले जलाये जायेंगे और कुछ एक के घरों में ईंटे पत्थर भी फेंके जायेंगे. मतलब कि अगले ही दिन इन सब चीजों की भारी तादात में माँग होगी. बस मेरी फैक्टरी ने तुरंत थोक के भाव सबके पुतले, क्रिकेट की अर्थियाँ, फेंकने योग्य सस्तमूले जूते चप्पल बनाने शुरू कर दिये. अगले तीन हफ्तों में मैंने करीब तीस लाख रुपये का कचरा बेच डाला और बस कैमरी आ गई.”

मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया, “जीनियस यार जीनियस. ऐसा धाँसू आईडिया मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया.”

“अब तो तुम्हें पता ही चल गया होगा कि मेरी फैक्टरी में क्या बनता है. फिर भी अंदर चलो.”

फैक्टरी में प्रवेश करते ही सबसे पहले देखा कि पुतले बनाये जा रहे है. मैं कुछ कहता उससे पहले ही मनोज ने कहना प्रारंभ कर दिया, “सामान की माँग परिस्तिथियों और घटनाओं के हिसाब से बदलती रहती है. पर फेंकने योग्य सस्तमूले जूते चप्पल, मालाओं और ईंटे पत्थर हमेशा ही माँग में रहते हैं.”

“पर कोई ईंटे पत्थर क्यों खरीदेगा. ये तो हर गली नुक्कड़ में भरे पड़े रहते हैं.”

“इन केस अगर आपका धरना या प्रदर्शन किसी साफ सुथरी जगह हो रहा हो तो अचानक थोक में ईंटे पत्थर कहाँ से लाओगे?”

“खैर ये पुतला किसका बन रहा है?”

“ये वाला शिल्पा शेट्टी का है और वो रिचर्ड गियर का है. भला हो दोनों का कि खुले आम किस कर लिया – बस, मेरी योरोप ट्रिप का पैसा निकल आया. महान देश है अपना. आप पैंट और कच्छा उतार कर खुले आम हग और मूत सकते हैं, पर किस नहीं कर सकते हैं. मैं तो मनाता हूँ कि ऐसे लोगों की जनसंख्या दिन दूनी और रात चौगनी बढ़े – भाई अपने धंधे के लिये अच्छा है वरना मेरे जैसा निकम्मा और निखट्टू सुलभ शौचालय साफ करता मिलेगा.”

थोड़ा और आगे बढ़ा तो देखा एक ओर छोटे छोटे पतली प्लास्टिक़ के बैगों का ढेर लगा था और पास में कड़ाहों में लाल रंग का द्रव्य.

“अब ये क्या बन रहा है?”


“टमाटर. विपक्षी दल के नेता के भाषण में सड़े टमाटरों के प्रयोग से तो तुम परिचित हो ही. पर इस युग में इतने महंगे टमाटर कौन फेंकेगा? पहले तो लोग सड़े गले टमाटर फेंक लिया करते थे, पर जबसे ये एम. एन. सी. कंपनियाँ आई हैं सड़े गले टमाटर टोमैटो केचप और सॉस में प्रयुक्त हो जाते हैं”

फैक्टरी देखने के बाद मेरा घर जाने का समय आ गया. वापसी में मैंने मनोज से पूछा, “भारत अब विकास के पथ पर है. तुम्हारा ये धंधा कब तक चलेगा?”


“जब तक सूरज चाँद रहेगा. अब देखो न परसों ही मंदिरा बेदी ने एक साड़ी पहन ली जिस पर भारत का झंडा बना था और वो झंडा मंदिरा के घुटनों के नीचे था – बस मच गयी हाये तौबा. अब अगले एक दो दिन इस घटना के हवन के लियी सामग्री बनानी पड़ेगी. जब तक अपना देश ऐसे बेवकूफों से भरा रहेगा, मेरा धंधा तो फलता फूलता रहेगा. अभी तो मैं सिर्फ बड़े बड़े शहरों में माल सप्लाई करता हूँ. अगर मेरी पहुँच गाँव गाँव हो गयी तो करोड़ों की आमदनी हो जायेगी. चाहो तो मेरे बिजनेस में भागीदार बन जाओ. मुझसे ज्यादा पढ़े लिखे हो – बिजनेस बढ़ाने में मेरी मदद करो. इंटरनेट शिंटरनेट पर भी डालो. ये लो तुम्हारा घर आ गया. और हाँ मेरे प्रस्ताव के बारे में ध्यान से सोचना.”

पूरा एक सप्ताह हो गया है मनोज से मिले हुये. इन पिछले चार पाँच दिनों में मेरी भी दबी हुई इच्छाओं ने पेंगे मारनी शुरू कर दी हैं – अपना भी मन होता है आलीशान गाड़ी चलाने का. सोच रहा हूँ नौकरी छोड़ कर मनोज के व्यवसाय में भागीदार बन जाऊँ. भारत जैसे देश में इस तरह का धंधा तो बंद होने से रहा – इससे अच्छी नौकरी-सुरक्षा और कहाँ मिलेगी. मेरी तो सलाह है कि आप भी हमारे गुट में शामिल होने की सोचें. मेरे प्रस्ताव के बारे में अपने विचार टिप्पणी के माध्यम से छोड़ दें.
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मंगलवार, मार्च 13, 2007

वानरतंत्र

प्राचीन समय में अनंत वन में शक्तिशाली सिंह अभयंकर का एकक्षत्र राज्य था. अभयंकर एक अत्यंत ही निपुण, शिक्षित, साहसी, विद्वान एवं उदार शासक था तथा राज्य को सुचारुपूर्वक चलाने में पूर्णतः सक्षम था. अनंत वन के सभी प्राणी और समस्त पड़ोसी राज्यों के राजा अभयंकर का आदर करते थे.

परंतु हर राज्य या राष्ट्र में ऐसे तत्व अवश्य होते हैं जिनकी मानसिकता विनाशकारी होती है और उनको किसी भी प्रकार के संतुष्ट नहीं किया जा सकता है. दुर्भाग्यवश, अनंत वन के वानर इसी श्रेणी के नागरिकों में आते थे. वानर समुदाय चोरी, तोड़ फोड़, अन्य नागरिकों के कार्य में विघ्न पहुँचाने तथा वन के नियमों का उल्लंघन करने में अग्रणी था. राज्य में उचित व्यवस्था बनाये रखने के लिये अभयंकर ने कड़े नियम स्थापित कर रखे थे और इन्हीं नियमों के कारण वानर खुल कर मनमानी करने में अक्षम थे. इसी कारण से समस्त वानर अभयंकर से क्षुब्ध थे और उसको किसी प्रकार से अपदस्थ करना चाहते थे.

एक दिन वानरों का मुखिया दुष्कामी घूमते घूमते पड़ोसी राज्य जनराष्ट्र में पहुँच गया. जनराष्ट्र अनंत वन का मित्र राज्य था और वहाँ के अधिकांश नागरिक सुशिक्षित तथा स्व-अनुशासित थे. दुष्कामी को जनराष्ट्र के राज-काज की पद्धति अलग सी प्रतीत हुई अतः वो जनराष्ट्र में कुछ दिनों के लिये रुक गया वहाँ के राज-काज की पद्धति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये.

कुछ दिनों के पश्चात दुष्कामी अनंत वन वापस आया और उसने घूम घूम कर सभी नागरिकों को ये बताना प्रारम्भ कर दिया कि जनराष्ट्र किस प्रकार से भिन्न है. दुष्कामी ने एक नागरिक सभा का आयोजन किया और नागरिकों को सभा में आने के लिये निःशुल्क भोजन का लोभ दिया. सभा में दुष्कामी ने बताया कि जनराष्ट्र में प्रजातंत्र है – राज्य के नागरिक मिल जुल कर ये निर्णय लेते हैं कि उनका शासक कौन बने. कोई भी नागरिक राज्य के शासक के पद के लिये अपना नामांकन कर सकता है भले ही वो अशिक्षित या भ्रष्टाचारी ही क्यों न हो. राज्य के नागरिक मतदान देकर निर्वाचन में खड़े किसी एक उम्मीदवार को अपना शासक चुनते हैं.

अनंत वन के सभी नागरिकों को प्रजातंत्र का विचार बहुत ही भाया और सभी ने अभयंकर के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत किये. अभयंकर ने कहा कि यदि प्रजातंत्र के माध्यम से एक अत्यंत सक्षम शासक का चयन हो सकता है जो कि राज्य को कुशलतापूर्वक सुचारु रूप से चला सके, तो मुझे प्रजातंत्र से कोई आपत्ति नहीं है. अभयंकर ने उसी समय घोषणा की कि अनंत वन में प्रजातंत्र की स्थापना की जा रही है और अगले माह शासक चुनने के लिये मतदान किये जायेंगे.

निर्वाचन हेतु दुष्कामी और अभयंकर का नामांकन हुआ. अभयंकर को विश्वास था कि अनंत वन की जनता दुष्कामी जैसे दुराचारी की जगह उस जैसे निपुण, शिक्षित, साहसी, एवं विद्वान को ही अपना शासक चुनेगी. परंतु सभी वानरों ने, जो कि समस्त राज्य की 25 प्रतिशत जनसंख्या थी, दुष्कामी को ही अपना मत दिया. वानरों के अतिरिक्त राज्य के अशिक्षित नागरिकों ने भी दुष्कामी द्वारा दिये गये उपहारों को स्वीकार कर के अपना मत दुष्कामी के हित में डाल दिया. अंततः चुनाव परिणाम ने दुष्कामी को अनंत वन का शासक घोषित किया.

दुष्कामी के विजयी होते ही समस्त वानर और उनके जैसी मानसिकता रखने वाले अन्य नागरिकों की पौ-बारह हो गयी. और, देखते ही देखते समस्त राज्य में अराजकता फैल गयी.

प्रति वर्ष चुनाव होते पर परिणाम सर्वदा एक ही होता – दुष्कामी की विजय, अभयंकर की पराजय और अराजकता का विस्तार. अंततः अभयंकर ने राजनीति से सन्यास ले लिया और एक विद्यालय की स्थापना की. विद्यालय स्थापना के दिवस एक नागरिक ने अभयंकर से पूछा कि उसने किसी और कार्य के बारे में क्यों नहीं सोचा. अभयंकर ने उत्तर दिया -

किसी भी प्रजातंत्र की सफलता के लिये ये अत्यंत ही आवश्यक है कि उस राज्य या राष्ट्र के अधिकांश नागरिक शिक्षित, स्वयं ही अनुशासित हों, भ्रष्ट न हों, और सही और गलत को पहचानते हुये उचित निर्णय में सक्षम हों. और, ये तभी संभव है जब कि शिक्षा की आधारशिला ऐसे नागरिक बनाने के लिये रखी जाये. मेरे विचार से अनंत वन के नागरिक इस प्रकार से शिक्षित नहीं किये गये थे. हम लोगों ने शिक्षा को मात्र गणित, भौतिकी और रसायन शास्त्र की सीमाओं में बाँध दिया है. मेरा ऐसा मानना है कि अनंत वन प्रजातंत्र के लिये तैय्यार नहीं था, और, प्रजातंत्र की इमारत बिना एक ठोस आधारशिला के खड़ी कर दी गयी. बंदर के हाथ में कृपाण दोगे तो वो दूसरों के साथ साथ अपनी भी गर्दन काट डालेगा. प्रजातंत्र एक कृपाण ही है – इसे देने से पूर्व यह निश्चित कर लेना चाहिये कि इसे ग्रहण करने वाला इसको उचित प्रकार से प्रयोग में ला भी पायेगा अथवा नहीं. इस विद्यालय की स्थापना के पीछे मेरा एक मात्र उद्देश्य है अज्ञानता का विनाश कर के अच्छे नागरिक बनाना जो कि प्रजातंत्र को एक उचित दिशा में ले जा सकें – स्वार्थ रहित. और, इस वानरतंत्र को हटा कर एक वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना कर सकें.

अभयंकर ने जगह जगह इस प्रकार के विद्यालयों और महा-विद्यालयों की स्थापना की - परिणाम स्वरूप अगली पीढ़ी के नागरिकों ने अभयंकर जैसे योग्य व्यक्ति को एक बार पुनः शासक के पद पर स्थापित कर दिया.
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नामों का चक्कर.

पुनीत और सुनीत जुड़वा भाई – दोनों ही पढ़ने में अव्वल. बिना कोई कोचिंग किये ही दोनों ने भारतीय औद्योगिकी संस्थान (आई. आई. टी.) की दीवार पार कर ली और चार साल बाद कैंपस में आने वाली प्रसिद्ध कंपनियों की साक्षात्कार की पंक्तियों में खड़ा होना शुरू कर दिया.

अधिकतर भारतीय अभियाँत्रिकी (इंजीनियरिंग) छात्रों की तरह पुनीत और सुनीत भी एक नामी गिरामी साफ्टवेयर कंपनी के अंग बन गये – अब ये बात तो बेकार की ही है कि पुनीत ने मेकैनिकल और सुनीत ने केमिकल में इंजीनियरिंग की है. खैर, अधिकतर भारतीय साफ्टवेयर अभियंताओं (इंजीनियर) के पद चिन्हों पर चलते हुये पुनीत और सुनीत भी पहुँच गये संयुक्त राज्य अमेरिका – संक्षिप्त में अमेरिका.

अभी जेट लैग पूरी तरह से ठीक भी नहीं हुआ था कि ऑफिस के लोगों ने एक पिकनिक का आयोजन कर दिया. दोनों बन्धु भी पहुँच गये – सोचा इसी बहाने लोगों से खुल कर मिलना जुलना भी हो जायेगा. कुछ देर बाद पुनीत को अचानक कुछ याद आया और आदतन सुनीत को उसके घर के नाम से पुकार बैठा, “ए रिंकू, अब घर के लिये निकलते हैं. आज घर फोन करना है.” सुनीत ने पलट कर कहा, “क्या यार चिंकू, अभी से? खैर चल मैं भी साथ में चलता हूँ.”

पुनीत और सुनीत का वार्तालाप पास खड़े डैन के कानों में भी पड़ गया. उससे रहा नहीं गया और उसने सुनीत से पूछ ही डाला, “तुमको पुनीत ने अभी क्या कह कर पुकारा?”

“रिंकू”

“ये क्या है?”

“मेरा नाम.”

“पर तुम्हारा नाम तो सुनीत है.”

“हाँ. पर रिंकू मेरा घर का नाम है. जैसे कि चिंकू पुनीत का.”

“तो क्या तुम दोंनो भाईयों के दो दो नाम हैं.”

“हाँ. अधिकतर भारतीयों के दो नाम होते हैं.”

“वाह. ऐसा तो मैंने आज तक नहीं देखा या सुना था. नामों को छोटा करना तो सामान्य है – जैसे कि थॉमस का टाम, जेफरी का जेफ या रिचर्ड का रिच, पर दो दो नाम... पता करना पड़ेगा कि ऐसा किसी और भी देश में होता है क्या. पर ये दो दो नाम क्यों.”

“अब ये तो मुझे पता नहीं. अब आदमी ही क्यों, हमारे तो देश के भी दो नाम हैं – इंडिया और भारत.”

“ये तो मुझे पता ही नहीं था कि इंडिया का एक और भी नाम है – भारत.”

“भारत नाम उसी तरह है जैसे कि रिंकू या चिंकू. ये नाम बस घर के भीतर ही लिया जाता है. पढ़े लिखे और सभ्य लोगों के बीच में इंडिया नाम ही लिया जाता है जैसे कि पुनीत या सुनीत.”

“रिंकू और सुनीत के अलावा भी और कोई नाम है तुम्हारा?”

“हाँ है न. मेरा राशि का नाम. मेरा राशि का नाम ‘ब’ से शुरू होना था, इसलिये पिता जी ने ‘बद्रीनाथ’ रख दिया.”

“फैसिनेटिंग! तो फिर इंडिया, भारत...”

“और हिन्दुस्तान... ये तीसरा नाम न बस ऐंवे ही होता है.”

“तो क्या मुअन जोदारो के समय से ही दो दो नामों का प्रचलन है?”

“इस बारे में तो कभी सोचा ही नहीं. भाई मैं कोई इतिहासकार तो नहीं हूँ, पर मेरे विचार से पहले शायद ऐसा नहीं था. मैंने अशोक, हर्षवर्धन, चंद्रगुप्त, अकबर, शिवाजी और बिम्बसार वगैरह के कभी दूसरे नाम तो नहीं पढ़े या सुने. मेरे बाबा और पर-बाबा के भी दो नाम नहीं थे.”

“तो फिर ये नया फैशन होगा.”

“नहीं नया तो नहीं है. मुझे लगता है ये सब आजादी के बाद ही शुरू हुआ है.”

“खैर, मुझको तो इतने सारे नामों का कोई खास फायदा नहीं समझ में आता है.”

“सो तो है. इसी लिये अब हम लोग भी दूसरे नाम को छोड़ने लगे हैं. नई पीढ़ी में बच्चों के अब एक ही नाम रखे जाते हैं.”

“तो फिर इंडिया...”

“यहाँ भी दूसरे नाम को छोड़ना शुरू कर दिया है. अब देखो न टीवी कार्यक्रम का नाम रखा गया है ‘शाबाश इंडिया’ गाना लिखा गया है ‘आई लव माई इंडिया, वतन मेरा इंडिया..’”

“देर आये दुरुस्त आये.”

“ओके डैन मैं अब चलता हूँ. घर जाकर इंडिया फोन करना है.”

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ये डे, वो डे