सोमवार, नवंबर 04, 2013

मानव

कभी मैं उसके आँगन में लहराता था,
धूप लू में बाहें फैला, छाँव के आँचल से कुटिया को सहलाता था।
अब उन्हीं गगन चूमती कुटियों की छाँव में पलता हूँ,
कब पड़ेगा वार आरियों का, यही सोच कर डरता हूँ॥
- मैं हूँ पेड़। 

लहरा लहरा आँचल से अपने उसके मैले तन को धोती थी,
प्यार भरे इस आँचल में उसके गंदे कर्मों को ढोती थी।
अब नम आँखों से उसी से मैं कर बद्ध निवेदन करती हूँ,
साफ करो अब तुम तन मेरा बस इसी आस से बहती हूँ॥
- मैं हूँ गंगा।

अपनी जटाओं से भेद कर बादल मैं उसकी प्यास बुझाता था,
अपनी गोदी में फल फूल लिये उसके मन को बहलाता था।
मेरे ही कंधे पर चढ़ कर वो काट रहा मेरा तन मन,
अब भेद न पाऊँ वो बादल जो विचरण करते उच्च गगन॥
- मैं हूँ पर्वत

लम्बे हाथों को फैला कर उन सब की रक्षा करता था,
मानव के तीर कमानों की वर्षा से बचा कर रखता था।
मेरे ही हाथों को काट काट वो मुझको कुचले जाता है,
मेरे परिवार के लोगों को मार मार अपना भवन सजाता है॥
- मैं हूँ जंगल/ हम हैं पशु पक्षी 

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- अतुल श्रीवास्तव

सोमवार, अक्टूबर 21, 2013

पुनरागमन

शीतल पड़ते सम्पर्कों से विचलित था, कुछ क्रोधित भी था,
सिमटते दिवसों की शिथिलता से अंतर्मन क्षोभित भी था।
प्रणय गीतों को रचने वाली विलुप्त हो रही वो भाषा थी,
ह्रदय तल में पनप रही परिवर्तन की आशा थी, उन्मुक्त होने की अभिलाषा थी।


परिवर्तन की आशा ने चहचहाती संध्या का आव्हान किया,
तुम धीरे से निकल गयी, न शोक हुआ, न विरह गीत का गान किया।
हर्ष हुआ, उल्हास हुआ, अपनों के संग आहाते में बैठ हास हुआ परिहास हुआ,
परिवर्तित इन कालों में भ्रमण, विचरण और रवि-किरणों से स्नान हुआ। 

हुआ समय व्यतीत, असहनीय हो चुभने लगा परिवर्तन का बढ़ता ताप,
सम्भवतः तुम्हारा गमन वितरित कर गया क्षणिक परिवर्तन पर एक मूक श्राप।
अनुभूति हुई तुम्हारे स्पर्श की आज उषा काल की बेला में ,
तुमसे मिलने की एक आस जगी, मैं लतपथ हूँ इस मेला में।

शीत लहरी की लघु पेंगो पर तुम आती हो, फिर जाती हो,
आगमन का मन है इसका निश्चय क्यों न कर पाती हो?
विडम्बना है और ये विदित है तुमको कि जब फिर से तुम आओगी,
मुझको एक बार पुनः तुम अपने से दूर भागता ही पाओगी।

छूने का प्रयत्न करोगी, तो मैं छुप जाऊँगा परतों में कपड़ों की,
दूर दूर भागूँगा और बना लूँगा कुटिया कम्बल के टुकड़ों की।
तिस पर भी आधीरता से है तुम्हारे पुनरागमन की अभिलाषा,
क्यों कि ह्रदय तल में फिर से पनप रही है परिवर्तन की आशा।

ओ शीत ऋतु तुम ठुमक ठुमक चपल गति से आ जाओ,
कुछ माह सही, अब आकर के कुछ कोहरे के बादल बिखरा जाओ।
 

- अतुल श्रीवास्तव

मंगलवार, सितंबर 25, 2012

मानसून

कब तक सहोगे ये शुष्क सा जीवन,
क्षीण करो ये ताप का बन्धन।
धो डालो ये ताप-वेदना, अब बूँदो को बहने दो,
नूतन आशा देंगी,इन बूँदो को निर्झर झरने दो।


बूँदो का विचलित प्रवाह ताप हरेगा,
काले मंडराते मेघों का कुछ ह्रास करेगा।
धुँधले पड़ते शीशों को धो डालो, अब बूँदो को गिरने दो,
खुशियों का आव्हान करो,न इन बूँदो को थमने दो।


बूँदों की सलिल-सरिता मरुभूमि में अंकुर जन्मेगी,
सतहों के भीतर दबे हुये बीजों को जब ये सींचेगी।
बीते काल के आघातों को बहने दो,न इन बूँदों को जमने दो,
आस जगेगी, बहने दो - इन आसुओं को सब कहने दो॥


- अतुल श्रीवास्तव

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सोमवार, अगस्त 20, 2012

"शेयर" करें

मंदिर में मिल गये कल हमका सजे धजे से किशन कनहैय्या,
पास आकर धीमे से बोले बात करन क है तुमसे भैय्या।
तनिक बतावा हमका बबुआ काहे हमका सब जन भूले,
इक काम करा दो हमरा तो तोहरी भी सम्पत्ति क्षण क्षण फूले।
डाल के फोटुआ फेसबुक पर कहो कि सब जन करें शेयर,
अब यही तरीके भक्त बढ़ेंगे और यही तरीका लगे फेयर।
पर सुनो ओ बचवा ई ससुरे हैं लालच घूस के सारे मारे,
हाथ फैलाये खड़े मिले हैं हर मंदिर मंदिर द्वारे द्वारे।
कह दो सबका शेयर करें भला हुई है सम्पत्ति बढ़ेगी,
फिर देखो भक्तन की कैसी और शेयर करन की झड़ी लगेगी।
काम बने ना जब लालचवा से तब भय का ही उपयोग करो,
भय सबसे बलवान शस्त्र है हाथन में लेने से न तनिक डरो।
धमका देओ सब ससुरन का कि प्रभु हो जईहैं आग बबूला,
शेयर करो नहीं तो बन जईहो अंधा, लंगड़ा और इक हाथ से लूला।

- अतुल श्रीवास्तव
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मंगलवार, अप्रैल 26, 2011

कटु सत्य

श्री अवधूत जी उन गिने चुने प्राणियों में से हैं जिन्हें ऊपर वाले ने गलती से भारत भूमि पर टपका दिया है। अवधूत जी अधिकतर भारतीयों से थोड़ा भिन्न हैं - ये अनाचार, दुराचार, व्यभिचार, भ्रष्टाचार और सेहत के लिये हानिकारक सभी तरहों के अचारों से कोसों दूर ही रहते हैं। इमानदारी की हद तो ये कि रोज ही लेने के देने पड़ जाते हैं। अवधूत जी एक सच्चे देश भक्त और देश प्रेमी हैं - अपनी मातृ भूमि के लिये कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। पर बेचारे कुछ कर नहीं पाते हैं तो अपने टीवी के सामने बैठ कर "इंडिया" में कोढ़ की तरह फैले हुये भ्रष्टाचार के बारे में देखते और सुनते हुये अपनी आँखो से तीन चार खारे पानी की बूँदे गिरा देते हैं। अब तो ये अवधूत जी की दैनिक दिनचर्या का एक अभिन्न अंग बन गया है।

लोग कहते हैं कि भगवान के घर देर है पर अंधेर नहीं। इतने सालों के बाद भगवान को भी अपनी गलती पर ग्लानि हुई कि ऐसी नेक आत्मा को भारत में क्यों ढकेल दिया। प्रभु ने सोचा कि अवधूत जी के लिये कुछ करना चाहिये - बस आव देखा न ताव और आधी रात को अवधूत जी के कुटिया समान घर में अवतरित हो गये। लोग ये भी कहते हैं कि इमानदार आदमी बहुत चैन की नींद सोता है। प्रभु ने चैन की नींद सोते हुये अवधूत जी को झिझोंड़ झिझोंड़ कर बिस्तर से उठा डाला और बोले - वत्स, मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया। उसी त्रुटि का प्रायश्चित करने के लिये मैं तुम्हें दो वरदान दान में देता हूँ। तुम कुछ भी माँग लो।

अब अवधूत जैसा एक सच्चा देश भक्त भला क्या माँगता - झट से बोल दिया, "हे प्रभु! आप मेरी भारत भूमि से सर्वदा के लिये भ्रष्टाचार गायब कर दो।" ये सुन कर प्रभु चिंतित हो गये और बोले, "मैं स्वयं भगवान हूँ और मुझे ये कहते हुये शोभा नहीं देता कि ये कार्य तो स्वयं भगवान के लिये भी दुष्कर है। परंतु मैं अपनी ओर से भरसक प्रयत्न करूँगा। वत्स ये कार्य करने में थोड़ा समय लगेगा - अभी रात्रि हो गयी है, तुम वापस सो जाओ। सम्भवतः जब तुम कल प्रातः काल उठोगे तो तुम्हारी इक्षा पूर्ति हो चुकी होगी।"

प्रभु के इस आश्वासन के बाद अवधूत अब और चैन की नींद सो गया। अगले दिन जब अवधूत जी सो कर उठे तो बड़ा ही विचित्र नज़ारा था। सारा मोहल्ला, गली, शहर सून सान पड़ा था - सारे नर नारी गायब। पूरे शहर में सिर्फ गाय, गधे, कुत्ते, बिल्ली, सुअर और पशु पक्षी बचे थे। बीच बीच में शिशुओं की रोने की अवाज़ भी सुनाई पड़ रही थी। पर अवधूत जी के पड़ोसी, साथी कर्मचारी, घनिष्ठ मित्र, भाई, सगे सम्बन्धी और रिश्तेदार - सभी गायब - उड़न छू। अवधूत से ये सब सहन न हुआ और उसके ह्र्दय से एक मार्मिक चीत्कार गूँज उठी - हे प्रभु!

लोगों से ऐसा भी सुना है कि अपने भक्तों की करुण पुकार पर प्रभु भागे दौड़े चले आते हैं। कम से कम इस बार तो आ ही गये - वत्स क्या समस्या है? ऐसी गुहार क्यों?

अवधूत ने अष्रुपात करते हुये कहा, "प्रभु! ये कैसी मसखरी? मेरे समस्त पड़ोसी, साथी कर्मचारी, घनिष्ठ मित्र, भाई, सगे सम्बन्धी और रिश्तेदार कहाँ गायब हो गये?"

"वत्स तुम्हीं ने तो वरदान माँगा था कि भारत भूमि से सर्वदा के लिये भ्रष्टाचार गायब कर दो। मैंने वही तो किया।"

"पर प्रभु मैं अपने पड़ोसियों, साथी कर्मचारियों, घनिष्ठ मित्रों, भाई, सगे सम्बन्धियों और रिश्तेदारों के बिना नहीं रह सकता हूँ। मुझे वो सब चाहिये।"

प्रभु ने कहा "तथास्तु", और भारत भूमि पर भ्रष्टाचार वापस आ गया।
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शुक्रवार, नवंबर 12, 2010

महानायक - चन्द्रगुप्त मौर्य।

ईश्वर की कृति वो कृती भी था,
उड़ते अलि का वो आली भी था,
अश्म का अश्व नहीं,
वो अनल भी था और अनिल भी था,
वो समर्थ भी था, उसमें सामर्थ्य भी था,
तृप्त तो था पर तप्त भी था,
वो चक्रवाक एक चक्रवात भी था,
कटिबंध बाँधे सदा कटिबद्ध भी था,
वो नेकु नेक था,
वो पुरुष तनिक परुष भी था,
अपकार के बदले उपकार ही करता,
अपचार नहीं बस उपचार ही करता,
परिणाम के परिमाण को परे हटा,
नित दिन दीन की सेवा करता ,
मात्र मातृ की वो सुधी सुधि करता,
कर्म के क्रम में बंधा हुआ,
धरा की धारा में खड़ा हुआ,
मद्य के मद से वो दूर हटा,
ललित ललिता के प्रणय, परिणय को छोड़ चुका,
वस्तु,वास्तु,बदन,वदन वसन,व्यसन से मोह तुड़ा,
वो सूर नहीं एक शूर ही था,
भुवन ही भवन ये उसका था,
विशाल कूट ही कुट उसका था,
ग्रह का वरदान गृह उसके था,
वो एक उपेक्षा जिसकी अपेक्षा न थी,
उसके वक्ष पर वृक्ष भाँति गिरी,
चिर चीर समान क्लांति त्याग कर क्रांति करी,
तरंग के तुरंग पर,तरणि के तरणी पर पेंग भरी,
पाणि में पानी भर संकल्प किया,
हय पर सवार हो हिय से शंखनाद किया,
हर प्रकार से प्राकार का सर्वनाश किया,
निर्जर समान उन्नति का निर्झर बना,
इतिहास के सर्ग में स्वर्ग को वसुधा पर रचा,
निर्माण किया,निर्वाण मिला,
वो महानायक आमरण भारत का आभरण बना।

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कृति=रचना कृती=निपुण
अलि=भ्रमर आली=सखी
अश्म=पत्थर अश्व=घोड़ा
अनल=आग अनिल=वायु
समर्थ=सक्षम सामर्थ्य=शक्ति
तृप्त=संतुष्ट तप्त=गरम
चक्रवाक=चकवा चक्रवात=बवंडर
कटिबंध=कमरबंध कटिबद्ध=तैयार
नेकु=तनिक नेक=अच्छा
पुरुष=आदमी परुष=कठोर
अपकार=बुरा करना उपकार=भला करना
अपचार=अपराध उपचार=इलाज
परिणाम=फल परिमाण=वजन
दिन=दिवस दीन=दरिद्र
मात्र=केवल मातृ=माता सुधी=बुद्धिमान सुधि=स्मरण
कर्म=काम क्रम=सिलसिला
धरा=पृथ्वी धारा=प्रवाह
मद्य=मदिरा मद=मस्ती
ललित=सुंदर ललिता=गोपी प्रणय=प्रेम परिणय=विवाह
वस्तु=चीज वास्तु=मकान बदन=देह वदन=मुख वसन=वस्त्र व्यसन=नशा
सूर=अंधा शूर=वीर
भुवन=संसार भवन=घर
कूट=पर्वत कुट=घर,किला
ग्रह=सूर्य,चंद्र.. गृह=घर
उपेक्षा=निरादर अपेक्षा=उम्मीद
वक्ष=छाती वृक्ष=पेड़
चिर=पुराना चीर=वस्त्र क्लांति=थकावट क्रांति=विद्रोह
तरंग=लहर तुरंग=घोड़ा तरणि=सूर्य तरणी=नौका
पाणि=हाथ पानी=जल
हय=घोड़ा हिय=हृदय
प्रकार=तरह प्राकार=किला
निर्जर=देवता निर्झर=झरना
सर्ग=अध्याय स्वर्ग=एक लोक
निर्माण=बनाना निर्वाण=मोक्ष
आमरण=मृत्युपर्यंत आभरण=गहना
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शब्दों के चयन हेतु http://pustak.org की सहायता ली गयी।

मंगलवार, नवंबर 09, 2010

खाली दिमाग.

मूर्तियाँ पत्थर की जगह मिट्टी की होती जो,
आँख के गंगा जल से कभी पिघलती तो।

टूटते तारे को देख कर मन्नत माँगी सोचा भला होगा,
पर ये न सोचा कि उसके गिरने से किसी का घर जला होगा।

मारता है, काटता है, मरता है, मज़हब के लिये सब करता है,
धिक्कार है मज़हब पर जो उसी इंसान के लिये कभी न मरता है।

शराबी और सन्यासी में कोई अंतर नहीं, खुश होने का ढोंग रचाते हैं,
खुद को नशे में डुबो कर, जिम्मेदारियों और वास्तविकता से मुँह चुराते हैं।

अगर गली गली नफरत की जगह अकल बंटती होती,
तो शायद मंदिरों,मस्जिदों की जगह पुस्तकालयों की ज़रूरत होती।

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मूर्तियाँ

बहुत दिनों से माननीय सुश्री भानुमती जी समाचार पत्रों और अदालतों की कुंद बुद्धि का शिकार बनी हुई हैं। और, कारण हैं किसी का नुकसान न पहुँचा सकने वाली पत्थर की मूर्तियाँ। ये सब गिरी हुई करतूत है मुये “सभ्य” लोगों की जो न इस महान कार्य की महत्वता को समझते हैं और न ही उन सच्चे भारतीयों के बारे में जानते हैं जिनकी मूर्तियाँ गली गली में खड़ी की जा रही हैं।

सुश्री भानुमती जी के इस पावन और महान कार्य के महत्व से मैं आपको संक्षिप्त में अवगत कराता हूँ – अब आप इस बात से इंकार तो नहीं करेंगे कि आज कल बड़े शहरों में पढ़ रहे बच्चों का भारतीय चीजों का ज्ञान उत्तर प्रदेश के समस्त नेताओं के आई. क्यू. से भी कम है। नहीं सहमत हैं? कोई बात नहीं सेंट अल कपोन (जरूरी बात ये है कि बच्चे के स्कूल का नाम “सेंट” से शुरू होना चहिये और उसके बाद एक धाँसू सा अंग्रेजी नाम होना चाहिये) में पढ़ रहे पंद्रह वर्षीय भरत से पूछिये के पाणिनि कौन थे या वो गार्गी के बारे में क्या जानता है। बस इसी समस्या का समाधान है सुश्री भानुमती का ये पुण्य काम और विकीपीडिया का ज्ञान सागर। जरा सोचिये सुश्री भानुमती जी का ये काम कितना लाभदायक होगा बच्चों को भारत से अवगत कराने में। आप कान में हेडफोन ठूँसे हुये अपने किशोर या किशोरी के साथ गोल मर्केट जायेंगे और वो अपनी “बीच की उँगली” मूर्तियों के ओर उठा कर आपसे पूछेगा – “Dad who is that sick looking dude?”, “Who is that old lady?”, “And, who is that cool looking guy riding a horsie?” और, आप सीना फुला कर कहेंगे – “बेटा वो पाणिनि की स्टैचू है। ये गार्गी की और ये हैं महाराणा प्रताप जी।“ बच्चा मुंडी हिलायेगा - अगर आपकी किस्मत अच्छी हुई और बच्चे के दिमाग में जिज्ञासा नामक कीड़ा होगा तो शाम को फेसबुक पर “जोक्स” पढ़ते पढ़ते विकीपीडिया पर इन महान हस्तियों के बारे में भी पढ़ लेगा।

मैं तो कहूँगा कि हमें हर दस पंद्रह फीट की दूरी पर मूर्तियाँ स्थापित कर देनी चाहिये। एक फायदा तो मैं ऊपर लिख ही चुका हूँ। और भी कई फायदे हैं – जैसे कि कबूतर और चिड़ियों को सुलभ शौचालय और पान खाने वालों को पीकदान मिल जायेंगे।

खैर, मैंने सोचा कि सुश्री भानुमती जी को इस नेक काम के लिये धन्यवाद अवश्य देना चाहिये। बस पहुँच गया उनके निवास स्थल पर। गेट पर ही दरबान ने रोक लिया – “काहे के खातिर आये हो?”

"सुश्री भानुमती जी के चरणों में नत मस्तक करना है।"


“बड़ी कड़क हिन्दी बोले हो भैय्या। खईर बहुत जन आवे हैं माथा टेकन भये। उह वाली लाईनवा मा लग जा।"

लाईन की ओर देखा तो पसीना चू पड़ा। तकरीबन तीन चार सौ लोग चिलचिलाती धूप में लाईन में डटे हुये थे। मैं पलट कर दरबान जी की ओर दौड़ा, “अरे दरबान साहिब मैं तो अम्मा जी को कुछ भेंट देने के लिये आया था।"

“कैस (कैश) है या कौऊनो जमीन जायदाद है?”

बात मेरी कुछ समझ में आई नहीं, इसलिये झट से बोल पड़ा, “कैश है कैश”

"तब जईके दुसरी वाली लईनवा में लग जा।"

ये क्या ये तो अर्थ का अनर्थ हो गया। भेंट वाली लाईन में तो हजार लोग खड़े हो कर पंखा झल रहे थे। उल्टे पाँव दौड़ पड़ा दरबान की ओर, “अरे दरबान भैय्या मैं तो अम्मा जी को मूर्ति के बारे में आईडिया देने आया हूँ।"

“तो ऐसन कहा न। अरे जबसे इह स्रेनी(श्रेणी) वाली कतार बनाई है तुम पहले प्राणी हो जो यह खातिर यहाँ धमके हो। कौऊनो ससुरा उस लाईन माँ हईये नाही – तोहरी तो डिरेक्ट एंट्री है, चला जा सीधा मईया के दरबार मा।"

बस मैं सीधा सुश्री भानुमती जी के सभा कक्ष में प्रवेश कर गया। मेरे ठीक सामने सुश्री भानुमती जी अपने भीमकाय शरीर से एक छोटे से सोफे को कुचल कर मारने का प्रयास कर रहीं थी। मैंने माथा टेका, भानुमती जी ने पूछा कि कैसे पधारे, और मैं पूछ पड़ा, “आप आज कल मूर्तियाँ बनवाने और स्थापित करने में लगी हुई हैं। इसके पीछे मूल कारण क्या है?”

भानुमती जी ने बड़ी आत्मीयता से कहना प्रारंभ किया, “सिरीवास्तव जी, हमारे देस के बड़े बड़े महापुरुस लोग हमें बहुत सिखा कर गये हैं, उन्होंने हमारे जीवन का उद्धार किया, हमें सभ्य बनाया, हमें नयी नयी चीजों से अवगत कराया। हमें उनका सम्मान करना चाहिये – बस ऐसे ही महापुरुसों को याद रखने के लिये हम उनकी मूर्तियाँ स्थापित करते जा रहे हैं।"

इधर भानुमती जी प्रवचन दिये जा रही थीं और दूसरी ओर मेरा द्रुतगामी दिमाग सोचे जा रहा था कि मैं भी एक ऐसी ही महान हस्ती को जानता हूँ जिसने हम असभ्य और गंवार भारतीयों को civilized बना डाला है – ऐसी ऐसी नये चीजें सिखाई हैं जिनके बारे में हमारे दादा और पर दादाओं को हवा तक नहीं थी। मैंने उसी क्षण निर्णय ले लियी कि मुझे भी इस महान हस्ती की मूर्ति बनवा कर न सिर्फ़ हज़रतगंज में वरन India के सारे बड़े और civilized शहरों में स्थापित करनी है।

“भानुमती जी आप ये मूर्तियाँ किससे और कहाँ से बनवाती हैं? क्या आप उस जगह का पता देंगी?”

हाँ हाँ कहते हुये सुश्री भानुमती जी ने जलेबी वाले लिफाफे के पीछे पता लिख कर मेरे हाथों में थमा दिया, और मैं एक विजयी सिपाही की तरह हाथों में पता और चेहरे पर एक चौड़ी सी मुस्कान लिये बाहर आ गया।

अगले ही दिन मैं गजगामिनी और ठुमक ठुमक कर चलने वाली उ.प्र.रा.प.नि. (उत्तर प्रदेश राजकीय परिवहन निगम) की जनता बस में सवार हो गया – तहसील रानीगंज, जिला प्रतापगढ़ जाने के लिये – आखिर मूर्ति जो बनवानी थी। अब आपसे क्या छुपाऊँ 1975 से आज तक ये जनता बसें और रानीगंज जाने वाली सड़कें अविराम यही नारा लगाये जा रही हैं – बदलना हमारी फितरत में नहीं और हमको बदल दे ऐसा कोई जन्मा नहीं। बस चलने से पहले चारबाग बस स्टेशन पर काले पड़ रहे तेल में तले और तरे हुये छोले भटूरों का सेवन किया, बड़ी सी डकार ली और मुँह पानी से भर कर सड़क पर पिच्च से कुल्ला दे मारा। बस चली हिचकोले खाते हुये – सड़क भयंकर थी और समस्या उससे भी गंभीर। छोले भटूरों ने कहा हमें नहीं जाना ऐसी बस में, और ऊपर और नीचे से निकलने का जुगाड़ करने लगे। खैर साढ़े चार घंटो के बाद रोते पीटते सही सलामत मैं पहुँच गया तहसील रानीगंज, जिला प्रतापगढ़। छोटा सा ही कस्बा था इसलिये मूर्तिकार राम खिलावन का घर जल्दी ही और आसानी से मिल गया।

“जय राम जी की राम भैय्या।“

"राम जी की जय बाबू। सकल और कपड़न से तो पढ़े लिखे बाबू लगत हो। हियाँ इस बदबूदार गाँव में कईसन आये गये?”

"अरे अगर सरकारी अधिकारी, नेता या अभिनेता होता तो कुआँ खुद ही प्यासे के पास चला जाता। पर मैं तो साधारण सा आदमी हूँ इसी लिये ये प्यासा कुयें के पास आया है। आपसे एक मूर्ति बनवानी है।"

"सही कहे हो बाबू। पढ़े लिखे लोग तो जरूरत पड़न पर भी गाँवन का रुख नाही करे हैं – चपरासी और नौकर जाति को हियाँ भेज देवे हैं मच्छरवन से कटवाई खातिर। पर बाबू काहे हो पैसा बरबाद करै पर तुले हो। मुर्तियाँ तो तबही अच्छीं जब मंदिर में बैठें – कम से कम लोग जना फल, फूल और रुपैय्या पैसा तो चढ़ाये हैं। गली नुक्कड़ पर लगी मूर्तियन पर तो कुकुर (कुत्ता) मूतें और चिड़ियाँ करें टट्टी – चाहे वो हो गाँधी बाबा या लाल बहादुर सासतरी।"

मैंने राम खिलावन को भाषण पिला डाला, “उन सभी महापुरुषों या हस्तियों की मूर्ति स्थापना होनी ही चहिये जिन्होंने हमारा जीवन परिवर्तित किया है, सिखाया है और प्रगति के पथ पर ढकेला है...”

"ठीक है ठीक है बाबू। आपको कौनो महापुरुस की मूर्ति बनवाये क है?”

"अंकल सैम की। अमेरिका मतलब कि अमरीका की।"

"अब ई अंकल सैम कौन हैं और का किहिन हैं हमरी खातिर?”

“अरे राम खिलावन जी इन्हीं ने तो भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या तो ठीक और सभ्य तरीके से बोलना सिखाया है – गंवारों को सिविलाईज़्ड बनाया है। अब आप ही बताओ जब आप टी वी और “हिन्दी” फिल्मों में लोगों को टिपिर टिपिर अंग्रेजी बोलते देखते हो तो आपके नहीं लगता कि आप और आपका बेटा भी ऐसी ही फर्राटे से अंग्रेजी बोले। आप जब शहर जाते हो तो थोड़ी बहुत शरम तो आती ही होगी शहरी बाबुओं के बीच में?”


"बात तो सही है तोहरी। इही खातिर हमहूँ अपने बिटवा को अंगरेजी इसकूल में डाले हैं। पर बाबू अंग्रेजी तो हमका अंग्रेज सिखाये हैं – ये सैम टैम कौऊन प्रानी हैं?”

"आप भी न... भारत आजाद हुआ था 1947 में, पर अंग्रेज वो न कर पाये जो अंकल सैम ने पिछले 10-15 सालों में कर डाला। सिर्फ़ अंग्रेजी ही नहीं उन्होंने हमें और भी कई चीजों में शिक्षित किया है...”

"जैसे कि...”

"अच्छा आपको पता है कि नीला रंग लड़कों के लिये और गुलाबी रंग लड़कियों के लिये होता है...”

"नहीं..."

"मुझे और मेरे दादा को भी नहीं पता था। भला हो अंकल सैम का कि अब अधिकतर भारतीय न सिर्फ जानते हैं पर उसका पालन भी करते हैं।"

"बाबू और क्या सिखाये हैं ई सैम बाबू हमका..”

"अब आप देखो ये ससुरे दूरदर्शन वाले हम सबको सालों साल घिसे पिटे, बोर करने वाले, सीख देने वाले और नीरस कार्यक्रम दिखाते रहे – भारत एक खोज, चाण्क्य, श्रीकांत, मालगुडी डेज़... भला हो अंकल सैम का कि अब हमारे टी वी वालों को दिमाग पर जोर नहीं डालना पड़ता है, और फ़टाफ़ट मसाले दार और सेक्सी लड़कियों से भरपूर तरह तरह के उच्च स्तरीय टी वी प्रोग्राम हमारी सेवा में परोस देते हैं।"

"और बताओ बाबू...”

"हमारे होनहार बच्चों को जयपुर घराना या लखनऊ घराना पता हो या न हो पर सबको हिप हॉप और ब्रेक डांस जरूर पता है। वैसे खिलावन जी आज कल नृत्य को डांस कहते हैं। भातखंडे गया भात खाने, बच्चों को नयी अच्छे चीज़ सीखने को मिली है – रैप।"

"पर रेप तो कनूनी अपराध है...”

"आप चिंता न करें ये वाला सिर्फ गानों के साथ किया जाता है..। और अगर रैप अमरीकन घेटो (Ghetto) स्टाईल में न करें तो फिर फायदा क्या?”

"हाँ बचुआ बताई क रही कि आज कल बड़ा बड़ा सहरों मा लोग कौऊनो नये तरीका का डांस किये हैं सब लोग – हियाँ तक क महरारू (औरत) जना भी...”

"हमारी फिल्में भी देखो तो लगता है कि हॉलीवुड का हिन्दी रूपांतर चल रहा है। मुझे तो लगता है कि अगर हॉलीवुड ने फिल्में बनाना बंद कर दिया तो हमारे लोग पुरानी फिल्मों को तब तक रिसाईकल करते रहेंगे जब तक वो फट फटा कर चिथड़े चिथड़े नही हो जायेंगी। अब देहाती तरीके के गोद भराई के दिन भी गये। भला हो सैम जी का कि हम उजड्डों को Baby Shower और Bachelor Party का शऊर आ गया।"

“अरे हम तो पूछना ही भूल गये। कुछ पीहैं (पियेंगे) आप? अरे बचऊ जरा साहिब के लिये एक ठो ठंढा पेप्सी और एक पैकटवा लेज़ चिपस का ले आ।"


"अरे दिक्कत क्यों करते हो? हो सके तो छाछ पिलाओ।"

"आप भी मजाक करते हो बाबू। अब ई सब देहाती चीज़ कौन पिये है? आप तो बस सैमवा के बारे में बताये जाओ।"

"अब आप से क्या कहना। वैसे तो हमारे देश में सैकड़ों त्योहार हैं, पर सब के सब बहुत पुराने हो गये हैं और उनमें वो मौज मस्ती नहीं रही। तो सैम जी ने हम लोगों को नये नये और ज्यादा मजेदार त्योहारों से लैस कर दिया जैसे कि Friendship Day, Valentine Day, Christmas (more like a fashion trend for “cool” and Americanized people) और जल्दी ही हम लोगों को Thanksgiving Day और Halloween Day के बारे में भी सिखाया जायेगा।"


“साहिब, भगवान भला करें इन सैम जी का। बड़ा पुन्न (पुण्य) का काज किये हैं ये, वरना हम तो ससुर गंवार के गंवार ही रह जाते।"

"अब देखो क्रिकेट जैसा खेल जो नीरस होने की कगार पर खड़ा था, उसका भी अमरीकी-करण तो करना ही था – आयातित गोरी बलायें चौका या छ्क्का लगने पर ठुमक ठुमक कर पुरुष जाति के दर्शकों का कैसे मनोरंजन करती हैं। अच्छा आप ये तो मानोगे कि सभी प्राणी महापुरुषों का आशिर्वाद पाने के लिये लालायित रहते हैं, और जब महापुरुष उनके सर पर हाथ रख देते हैं तो अपने आप को धन्य समझने लगते हैं और गर्व से कहते हैं कि फलाँ फलाँ महापुरुष ने स्वयं अपने हाथ से उनको प्रसाद या भभूति दी।"

"हाँ ये सोलहो आना सच्ची बात है।"

"बस सैम जी का भी कुछ कुछ ऐसा ही प्रभाव है। कोई कितना भी बड़ा कलाकार क्यों न हो, पर जब तक सैम अंकल अपने हाथ से भभूति न दे दें तब तक वो महान कहला ही नहीं सकता। या ये भी कहा जा सकता है कि अगर सैम अंकल किसी गधे पर भी भभूति छिड़क दें तो हम सब गर्व से फूल कर गधे को भी पूजने लगते हैं। हम कितने महान हैं या हमने कितनी तरक्की कर ली है इस पर हम तभी विश्वास करते हैं या उसे सच मान लेते हैं जब सैम जी हमें Newsweek, Times या The Economist के जरिये से बताते हैं।"

"बड़े परभावसाली हैं ये सैम चचा तो।"

"सो तो ये हैं ही, वरना हमें शालीन तरीके से गालियाँ बकना कौन सिखाता। जैसे कि शिट, फ# और आसहो@। आप टी वी देखो – लोग क्या धड़्ड़ले से शिट बोलते हैं।"

"ई शिट का बला होवे है?"

"अरे वही जो चिड़ियाँ मूर्तियों पर करती फिरती हैं और आप सुबह सुबह खेतों में करने जाते हो।"

"हा हा हा ई तो बड़ा मजेदार बात हुई। सोचो कोई हमसे पूछे कि भैंसवा का चारा दियो कि नाही और हम कहें – अरे पैखाना, भूल गया... हा हा हा।"

"कल ही मैने एक महानुभाव को टी वी पर एक टी-शर्ट पहने देखा जिसपे लिखा था “FCUK” – अब भाई गाली देने और दिखाने का शालीन तरीका तो हमने सैम अंकल से ही सीखा है न?”

“और बतायें...”

“खिलावन भाई आपकी शादी कैसे हुयी थी...”

"अरे आप तो हमरी दुखती रग पर नमक रगड़ रहे हो। बापू और अम्मा हमार कनवा (कान) उमेंठ कर हमका सावितरिया (सावित्री) संग बियाह दिये रहें।"

“अरे आप समझे नहीं। खैर अब आजकल अगर आप को शादी करनी है तो एक घुटने पर बैठ कर, एक हाथ से हीरे की अंगूठी आगे करते हुये कहना होगा – Will you marry me? और, ये किसने सिखाया? अंकल सैम के हॉलीवुड ने। बॉलीवुड नाम की प्रेरणा किसने दी? अंकल सैम के हॉलीवुड ने।"

“हुजूर आप तो बड़ी गजब की बातें बताये रहे हो...”

"खिलावन भाई आप ही बताओ हम महान हैं कि सैम चाचा? हम पिछले पचास सालों में दुनिया को कुछ न सिखा पाये, पर सैम जी ने हमको खाना, पीना, बोलना, नाचना, गाना और तो और उनकी तरह सोचना भी सिखा दिया और वो भी सिर्फ़ पिछले 10-15 सालों में। हैं न महापुरुष?”

"सही कह रहे हैं आप। मेरे बिचार से तो सैम जी की मुर्तिया तो कौऊनू गली नुक्कड़ मा नाही बलकी मंदिरवा मा लगाई क चाही।"

“तो फिर देर किस बात की है फटाफट बनाओ और स्थापित करो।"

"पर साहिब एक ठो पिराबलम है। यदि सैम जी की मूर्तिया बनाई के मंदिरवा मा लगाई गई तो हमरे देस बासियों को सुहायेगा नहीं। अरे बहुतै (बहुत ही) बड़ा हंगामा हुई जईहै।"

"सो तो है, पर क्या कहें अब ये भारतीय नास्तिक भी हो चले हैं। जिसको अपना रहे हैं, उसी को नकार भी रहे हैं। पर आप मायूस न हों – दिल से तो सब मानते हैं और एक न एक दिन सब एक स्वर में बोलेंगे भी जरूर कि सैम बाबा की जय हो..."

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रविवार, जनवरी 17, 2010

असमंजस

गरमी के ताप से सुलगती धरा की वेदना को देख कर सावन के माह ने पदार्पण करने का निश्चय ले ही लिया। धरती को अविराम अपनी उष्मा से सींचता हुआ सूर्य भी थक सा गया था अत: काले घने बादलों की चादर के पीछे मुँह छुपा कर कुछ क्षण के लिये सोने का प्रयत्न करने लगा। वायुगति से भागते हुये बादलों ने भी जब विश्राम के लिये रुक कर गर्मी से व्याकुल वसुन्धरा की स्तिथि देखी तो अपने अश्रुपात को रोक न सके। पानी की शीतल छीटों से अपने आप को भिगो भिगो कर समस्त प्राणी बाहें फैला कर सावन के आगमन का स्वागत करने लगे।

जहाँ सारा देश प्रसन्नचित हो कर सावन के आने की खुशियाँ मनाने लगा, छोटे बच्चे पेड़ की डालों पर झूले डालने की तैय्यारियाँ करने लगे, वहीं सोनभदर नाम के एक छोटे से गाँव के लोगों में आने वाले संकट का भय फैलना प्रारंभ हो गया। भय इस लिये क्यों कि सोनभदर स्थित है कर्मनाशा नदी के तट पर। वही कुख्यात कर्मनाशा नदी जिसके बारे में ये किंवदंती प्रचलित है कि 'ई नदिया बाढ़ी, जिया लेके मानी'। गाँव के वृद्ध विचलित होने लगे कि यदि इस वर्ष वर्षा मूसलाधार हुई और ये जान-लेवा कर्मनाशा सर्प की भाँति रेंगती हुई गाँव में प्रवेश कर गयी तो बिना किसी की जान लिये वापस न जायेगी। अगर ऐसा हो गया तो कौन बलि के लिये आगे आयेगा?


इस वर्ष इन्द्र के पास जल भंडार कुछ अधिक ही था – बिना कोई विराम लिये पानी बरसाये जा रहे थे। जैसे जैसे कर्मनाशा का जल स्तर ऊपर उठता वैसे वैसे सोनभदर के लोगों का भय और बल पकड़ता जाता।

जहाँ एक ओर गाँव के निवासी अपनी आने वाले संकट के निवारण के बारे में सोच रहे थे, वहीं दूसरी ओर सोनभदर के थाने में तैनात एकमात्र थानेदार बिसम्भर सिंह बस यही सोचता रहता कि अपने पद के भय को और कैसे प्रयोग में लाया जाये। गाँव के निवासियों के संकट और पीड़ा से कोसों दूर रहने वाला बिसम्भर दिन भर थाने के बाहर स्टूल पर बैठ कर चिलम फूँकता और रात को ताड़ी पी कर गली चलते लोगों को परेशान करता। पर सोनभदर के लिये ये कोई नई व्यथा न थी। आजतक गाँव मे संरक्षक के रूप में आये हुये सभी थानेदारों की करतूतें ऐसी ही रही हैं। पर शायद अभी तक आये हुये सभी थानेदारों में बिसम्भर सबसे तुच्छ कोटि का प्राणी था – गाँजा लगाना, ताड़ी पीना और पैसे उमेंठना तो सभी थानेदारों ने किया, पर बिसम्भर की तरह गाँव की किशोरियों को ललचाई कुदृष्टि से किसी और ने न देखा था। पिछले कई सप्ताहों से बिसम्भर की कामयुक्त कुदृष्टि राम खिलावन की उन्नीस वर्षीय पुत्री बेला का पीछा किये जा रही है।

वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही है और कर्मनाशा के तरंगे प्रसन्नता से उछलना शुरू हो गयी हैं कि शीघ्र ही सोनभदर से मानव बलि प्राप्त होगी। गलियों में भरते हुये पानी ने नित्य प्रतिदिन का जीवन अस्त व्यस्त कर दिया है – लोग बाहर कम निकल रहे हैं, घरों में ही कैद होकर बैठे हुये हैं। ऐसे में बिसम्भर के पास भी कुछ करने को नहीं है। बस बिसम्भर के खाली दिमाग को शैतानी विचारों ने अपना घर बना लिया है और उसके समक्ष सर्वदा बेला की छवि मंडराने लगी है।


थाने के बाहर बैठ कर चिलम फूँकता हुआ बिसम्भर पानी के बढ़ाव को देख रहा था। आज कर्मनाशा का जल स्तर कुछ अधिक तीव्रता से ऊपर उठना शुरू हो गया है। और, उसी आवेग से बिसम्भर के कामुक विचारों ने भी पेंगे मारना प्रारम्भ कर दिया है। सहसा उसकी नजर गली में जाती हुई बेला पर पड़ गई। बिसम्भर ने दूर से ही चिल्ला कर पूछा, “अरी बेलवा इतनी बारिस और बीहड़ मौसम में काहे की खातिर घरे दुवारे से बाहर निकली हो?”

बेला ने बिसम्भर की ओर बिना देखे ही चिल्ला कर जवाब दिया, “थानेदार जी तनि खेतवा की ओर जाई क है।“

ये कह कर बेला चल पड़ी खेत की ओर। और, थोड़ी ही देर के बाद बिसम्भर भी चल पड़ा बेला के खेत की ओर। बिसम्भर के पैर जितनी गति से खेत की ओर बढ़ रहे थे उससे अधिक गति से कर्मनाशा बढ़ रही थी सोनभदर की ओर।

सोनभदर के लोगों को जिस बात का भय था अंततः वही हो गया – समस्त गाँव को कर्मनाशा ने डुबोना प्रारम्भ कर दिया। कर्मनाशा के प्रचंड को शांत करने का एक ही उपाय था – बलि। पर किसकी बलि? संध्या का समय था – गाँव के लोग चौपाल पर एकत्रित हो कर इस विचार विमर्श में लीन थे कि इस बार कर्मनाशा को भोग के लिये क्या परोसा जाये। उनके इस विचार विमर्श को भंग किया चौपाल में गिरती हुई मन और तन से विक्षत बेला ने। बस पल भर में निर्णय हो गया अपवित्र और कलंकिनी बेला को कर्मनाशा को सौंपने का।

न जाने कहाँ से गली में सैकड़ों लोग आ गये – भीड़ चलने लगी कर्मनाशा की ओर सुतलियों से बंधी हुई बेला की भेंट चढ़ाने। रास्ते में ही राम खिलावन का झोपड़ा पड़ता था। शोर शराबा सुन कर बाहर आ गया। अपनी बेटी को ऐसी अवस्था में देख कर चीत्कार कर उठा। उसने गाँव वालों की कथा और अपनी बेटी की व्यथा सुनी – कुछ क्षण के लिये चुप रहा फिर अपने झोपड़े में चला गया। बाहर आया तो हाथ में कर्मनाशा की लहरों की तरह एक लम्बा सा गंडासा लहरा रहा था। भीड़ से उत्तेजित आवाज में रुकने को कहा और दौड़ पड़ा थाने की ओर।

कुछ पल बाद ही घनघोर बारिश की गिरती हुई सतहों के बीच में से राम खिलावन की काया दिखनी शुरू हुई और उसके साथ साथ गली में घिसटती हुई आ रही थी रक्तमय जीवन रहित बिसम्भर की काया। राम खिलावन ने आगे बढ़ कर बेला को सुतलियों के बंधन से मुक्त कराया, अपने कंधे से लगाया और बिसम्भर की ओर संकेत करते हुये प्रबल वाणी में कहा – ई रहा तोहार पापी और कर्मनसवा का भोग।

भीड़ ने बिसम्भर का शव उठाया और कर्मनाशा को बलि के रूप में सौंप दिया। परंतु आज कर्मनाशा असमंजस में पड़ गयी। ये कर्मनाशा की हार थी या जीत? यदि वो गाँव वालों की इस जीत को अपनी जीत मान कर उसमें सम्मलित होना चाह्ती है तो उसे गाँव में ही रहना होगा, और यदि वो गाँव छोड़ कर जाती है तो ये उसकी हार होगी अर्थात वो गाँव वालों की जीत को अपनी हार मानती है।

*****

कमबख़्त जेबें.

ऐशबाग में रहने के कई फायदे हैं, पर जो सबसे बड़ा फायदा है वो ये है कि सुबह सुबह आँख खोलने के लिये कभी मुर्गे की बाँग या अलार्म घड़ी के टिन टिन की ज़रूरत नहीं पड़ती है। गली में सुबह छह बजे से जो हो-हल्ला और चिल्ल-पों शुरू होता है वो एक साधारण आदमी तो क्या, धतूरे के नशे में धुत्त कुम्भकरण की आँखों से नींद उसी तरह से उड़ा दे जैसे चुनाव जीतते ही नेता गण अपने क्षेत्र से गायब हो जाते हैं।

रोज़ की ही तरह आज भी गली में भौंकते कुत्तों ने और गली के नाई के रेडियो पर जोर जोर से बजते “मेरा सुन्दर सपना टूट गया...” गाने ने भारतीय जी की निद्रा को भंग कर दिया। आँख मसलते हुये भारतीय जी ने खटिया का परित्याग किया, पर आज भारतीय जी का मन कुछ खिन्न सा था। बस उसी खिन्न मन से भारतीय जी ने दातों पर दातून मसली, और कुर्ता पैंट डाल कर निकल पड़े सुबह की सैर के लिये – पर आज थोड़ा भुनभुनाते हुये कि किस गधे ने इस जगह का नाम ऐशबाग रख दिया – यहाँ न तो कोई बाग है और ऐसे शोर शराबे में भला कोई ऐश क्या करेगा।

भारतीय जी अभी पंद्रह-बीस फर्लांग ही चले होंगे कि अख़्तर मियाँ से टकरा गये। अब क्यों कि मोहल्ले में पानी की किल्लत रहती है इस लिये अख़्तर मियाँ ने पान की पिचकारी से ही गली को धोया और अपना रोज़ सुबह वाला सलाम भारतीय जी की ख़िदमत में ठोंक दिया। अख़्तर मियाँ की गली में ही छोटी सी एक दर्जी की दुकान है – अंजुमन लेडीज़ एंड जेंट्स टेलर्स। अख़्तर मियाँ हमारे भारतीय जी के सदियों से दर्जी रहे हैं; और अख़्तर मियाँ के अब्बू मुश्ताक़ ज़नाब सदियों तक भारतीय जी के पिता जी के कपड़े सिलते रहे – शायद ये संबन्ध और भी पीढ़ियों पुराना है। और, शायद इसी लिये दोनों में अगाढ़ प्रेम और अटूट दोस्ती है।


पर आज भारतीय जी चिडचिड़ाये हुये थे, और ऐसे में जो भी सबसे पहले सामने आता है उसी पर गुस्से का गुबार फूट पड़ता है। और, आज अख़्तर मियाँ का दिन था गुस्से के झोंको को झेलने का।

अख़्तर मियाँ: भारतीय ज़नाब आज किस तरफ का रुख़ है?

भारतीय जी: जहन्नुम की तरफ।


अख़्तर मियाँ: क्या हो गया मियाँ? मिज़ाज़ तो ठीक हैं?

भारतीय जी: मेरे मिज़ाज़ को क्या होगा? अपनी सुनाईये – पैंट की कटाई छंटाई कैसी चल रही है?

अख़्तर मियाँ: ऊपर वाले और आप जैसे कद्र-दानों की दुआ है। काम बढ़िया चल रहा है।

भारतीय जी: हमारे जैसे कद्र-दान ज्यादा दिन टिकने वाले नहीं हैं।

अख़्तर मियाँ: जनाब ऐसी क्या गुस्ताख़ी हो गयी हमसे?

भारतीय जी: अख़्तर मियाँ ये बताईये आप कितने सालों से मेरे कपड़े सी रहे हैं?

अख़्तर मियाँ: यही कोई बीस-तीस साल से।

भारतीय जी: पर आपको अभी तक पैंट में सही ढंग से जेबें लगानी नहीं आई। हाथ डालो कुछ निकालने के लिये तो निकलता कुछ और ही है – मुझको तो लगता है आप कोई जादू टोना फूँक देते हैं मेरी जेबों में।

अख़्तर मियाँ: अचानक पैंटों की जेबों को क्या हो गया? आज तक तो आपने ऐसी कोई शिकायत नहीं की।

भारतीय जी: क्यों कि आज तक ऐसा कोई हादसा ही नहीं हुआ।

अख़्तर मियाँ: अब पहेलियाँ ही बुझाते रहियेगा या कुछ खुलासा भी करियेगा।

भारतीय जी: अख़्तर मियाँ आप को पता है कि पिछले महिने ही पास मे एक अनाथालय खुला है?

अख़्तर मियाँ: हाँ सुना है कि ...

भारतीय जी (बात काटते हुये): बस कल शाम को उसी अनाथालय के प्रबन्धक महोदय अपने साथ बच्चों का एक काफिला ले कर मेरे घर टपक पड़े...

अख़्तर मियाँ: पर जनाब इस हादसे का मेरी पैंट सिलाई से क्या लेना देना?

भारतीय जी: अरे बीच में मत बोलिये। जो कह रहा हूँ बस सुनते जाईये। प्रबन्धक महोदय – क्या नाम था उनका – हाँ, ज्ञानदत्त शुक्ला – हाँ तो ज्ञानदत्त जी ने सबसे पहले तो दस मिनट तक मुझे ये सुनाया कि हमारे देश में कितने लाखों अनाथ बच्चे हैं जिनके लिये कोई भी, यहाँ तक सरकार भी, कुछ नहीं करती है। कैसे उनका अनाथ आश्रम ऐसे बच्चों की देखभाल करता है, स्कूल भेजता है... अरे आप सुन भी रहे हैं?

अख़्तर मियाँ: अरे आप ही ने तो कहा था कि बीच में मत बोलिये, इसी लिये चुप चाप सुने जा रहा हूँ। पर अभी तक मुझे समझ में नहीं आया है कि इसका पैंटो की जेबों से क्या...

भारतीय जी: शिवेन्द्र जी ने ये भी बताया कि अनाथ आश्रम का खर्चा पानी सामान्य नागरिकों के दान के फलस्वरूप ही चलता है – और, ये कहते कहते उन्होंने पीछे छिपे हुये कुछ एक दयनीय बच्चों को पीछे से घसीट कर मेरे सामने ला खड़ा कर दिया। फिर अपने झोले से एक पेन और रजिस्टर निकालते हुए बोले - भारतीय जी, इस अनाथ आश्रम को चलाने में हमारी कुछ मदद कीजिये और सौ, हज़ार रुपये का दान दे दीजिये। बोले – ये बड़ा पुण्य का काम है – मानवता और देश दोनों के लिये।

अख़्तर मियाँ: वो तो सब ठीक है, पर इसका पैंट की जेबों से क्या वास्ता?

भारतीय जी: अरे सुनिये भी तो। मैंने उनकी दिल खोल कर सराहना करी। फिर अपनी पैंट की बाँयी जेब में हाथ डाला। और जब हाथ बाहर निकाला तो मुट्ठी भर दया निकल आई पर ससुरा मेरा बटुआ नहीं निकला। कई बार कोशिश करी, हाथ कई कई तरीकों से डाला, पर कमबख़्त बटुआ तो जैसे कसम खा के बैठा हो कि उसे निकलना ही नहीं है। पर मियाँ गौर करने वाली बात ये है कि दया नॉन-स्टॉप निकलती रही।

अख़्तर मियाँ: अब बात कुछ कुछ समझ में आ रही है...

भारतीय जी: फिर मुझे याद आया कि दायीं जेब में कुछ रुपये रखे हैं। जब दायीं जेब में हाथ डाल कर रुपये निकालने की कोशिश करी तो जेब से ढेर सारी सराहना और तरीफों के पुल तो निकल आये पर रुपये न निकले। फिर से कई बार कोशिश करी, पर रुपये तो मानों जेब से ऐसे चिपक गये थे जैसे अमर सिंह के साथ अमिताभ। हाँ, पर सराहना निकलनी बंद न हुई।

अख़्तर मियाँ: जनाब आपको पूरा यकीन है कि इससे पहले ऐसा कभी नहीं हुआ आपके साथ – खासकर के जब कोई आपसे पैसा माँगने आया हो...

भारतीय जी: अरे कभी नहीं मियाँ, कभी नहीं। हाँ ये बात जरूर है कि इससे पहले हमेशा लोग धार्मिक चीजों के लिये पैसा माँगने आये – कभी मंदिर निर्माण के चंदे कि लिये तो कभी माता जागरण, अखंड रामायण और पूजा पाठ जैसे पुण्य कामों के लिये। और, हमेशा मेरी जेब से भक्ति और श्रद्धा के साथ साथ बटुआ भी निकला। यहाँ तक कि चेक बुक भी निकल आई जो कि मैं कभी जेब में रख कर घूमता ही नहीं हूँ। अख़्तर मियाँ मुझे पूरा यकीन है आप जेबों पर जरूर कोई जादू टोना फेरते हो।

अख़्तर मियाँ: भारतीय बाबू ये कोई जादू टोना नहीं है। असलियत तो ये है कि आपकी जेबों में ऊपर वाले के लिये तो जगह है, पर शायद इस ज़मीन पर रहने वालों के लिये नहीं...

इसी बीच दुकान से तौकीर बाहर निकल कर आया और भारतीय जी से बोला – आपने परसों एक पैंट सिलने को दी थी। क्या कहते हैं पीछे एक हिप पॉकेट लगा दूँ?

भारतीय जी कुछ बोलते उससे पहले ही अख़्तर मियाँ बोल पड़े – अरे जा और दोंनो ओर हिप पॉकेट लगा दे। और, उनके ऊपर फ्लैप मत लगईयो, हो सके तो जेबों का साईज़ भी बड़ा ही रखना – क्या पता अगली बार इन्हीं जेबों से भारतीय जी का बटुआ निकल आये।

बात आगे बढ़ती उससे पहले ही सड़क के बीचों बीच खड़े हनुमान मंदिर के लाऊड स्पीकरों से भजनों का प्रसारण प्रारम्भ हो गया। बस भारतीय जी ने अपनी दोनों जेबों में हाथ डाला और दौड़ पड़े मंदिर की ओर माथा टेकने और नमन करने।

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मंगलवार, जून 02, 2009

प्रार्थना

हर वर्ष की भाँति इस बार भी मोहल्ले के लोगों ने महिने भर पहले से ही होली के साँध्य कार्यक्रमों की तैय्यारियाँ प्रारम्भ कर दीं। होली की संध्या को होने वाले कार्यक्रम विविध श्रेणियों में बाँटे जाते हैं – गायन, नृत्य, नाटक तथा वाद्य यंत्र इत्यादि। और, गायन की श्रेणी में एक उप-श्रेणी होती है पाँच से बारह साल के बच्चों की – जो कि मेरी सबसे प्रिय श्रेणी है।

मेरे पड़ोसी सिन्हा जी का दस वर्षीय पुत्र “एकाग्र” गत तीन वर्षों से इस स्पर्धा में भाग ले रहा है, परंतु सर्वथा उसे द्वतीय या तृतीय स्थान से ही संतुष्ट होना पड़ा। “होनहार बिरवान के होत चीकने पात” वाली कहावत एकाग्र पर पूरी तरह से चरितार्थ होती है – अल्प आयु से ही शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ले रहा है, और गायन इतना मँझा हुआ है कि दिग्गजों को भी मात दे दे। मेरे विचार से तो एकाग्र मोहल्ले क्या शहर, प्रदेश और राष्ट्र स्तर की प्रतिस्पर्धा को भी सरलता से जीत सकता है। परंतु, यदि परिणाम जनमत पर आधारित हो तो गुणों के अतिरिक्त कई अन्य कारक भी परिणाम को प्रभावित करते हैं। और, कदाचित इन्हीं अन्य “कारणॉ” के कारण एकाग्र प्रथम स्थान पाने से सदैव वंचित रहा।

गत वर्ष शुक्ला जी की इकलौती प्यारी सी नौ वर्षीय बिटिया गरिमा ने प्रथम स्थान प्राप्त किया था। गरिमा नेत्र हीन है। और, उससे पहले साल पोलियो की मार से ग्रसित अंकुश ने प्रतिस्पर्धा जीती थी।


सारे बच्चे जी-जान से अभ्यास में लगे हुये थे इस बार प्रथम स्थान पाने के लिये। गरिमा ने लता के एक पुराने शास्त्रीय गाने का चयन किया हुआ था, और एकाग्र मन्ना डे के गीतों से लोगों को लुभाने की सोच रहा था।

होली से पहले वाली भीनी भीनी ठंढक थी, सूर्यास्त होने वाला था और मंगलवार का दिन था - मैं हनुमान जी के मंदिर की ओर निकल पड़ा। रास्ते में बाग में देखा कि एकाग्र कई बच्चों के साथ खेलने में व्यस्त है। मैंने पास जाकर पूछा, “एकाग्र, क्यों आज गाने का अभ्यास नहीं हो रहा है?”


"अंकल उससे क्या फायदा होगा। मैं जीतने वाला तो हूँ नहीं।"
"फिर भी प्रयत्न तो करना ही चाहिये।" ये कहते हुये मेरे मन में गीता के श्लोक “कर्मण्ये वाधुकारस्ते...” का ध्यान आ गया। पर जब स्वयं को ही उस पर विश्वास न हो तो बच्चे को घुट्टी पिलाना व्यर्थ ही समझा।


“आप कहाँ जा रहे हैं?”, एकाग्र ने पूछा।

“आज मंगल है। हनुमान जी के दर्शन के लिये जा रहा हूँ। साथ चलोगे? परसों ही तुम्हारी गायन प्रतियोगिता है – भगवान के समक्ष माथा टेक लो, शुभ होगा। प्रार्थना कर लेना कि बजरंग बली तुमको ही इस बार विजयी बनायें।"

एकाग्र सहमति में सर हिलाते हुये मेरे साथ मंदिर की ओर चल पड़ा। मंदिर पहुँच कर हम दोनों ने बेसन के लड्डुओं का प्रसाद चढ़ाया और हाथ जोड़ कर कुछ क्षणों के लिये प्रभु की प्रार्थना करी।

“तो एकाग्र तुमने क्या प्रार्थना की?”

“अंकल, अगर मेरी प्रार्थना स्वीकार हो गयी तो अगले वर्ष मैं ही गायन प्रतियोगिता जीतूँगा।"

"आखिर ऐसा क्या माँग लिया तुमने?”

“मैंने भगवान से कहा कि मुझे भी अंधा या लंगड़ा बना दें।"
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गुरुवार, मार्च 26, 2009

भैय्या.

कुछ ही महिनों पहले की बात है भगवान श्री राम चंद्र जी स्वर्ग में बैठे बैठे उकता गये। सीता मैय्या से बोले, "हे सीते! मैं क्या करूँ? इतने युगों से एक ही जगह रहते रहते मन उकता सा गया है। सोचता हूँ किसी दूसरी जगह का भ्रमण कर आऊँ।"

"जैसा आप उचित समझें।", जानकी ने उत्तर दिया।


"सोचता हूँ अपनी जन्म भूमि के दर्शन कर आऊँ।" ये कहते हुये श्री राम अपनी अयोध्या यात्रा का प्रबंध करने के बारे में विचार करने लगे। श्री राम ने अभी सोचना प्रारंभ ही किया था कि श्री कृष्ण का आगमन हो गया।

"राम, आप किस विषय के बारे में सोच रहे हैं।", श्री कृष्ण ने बिना किसी विलम्ब के प्रश्न पूछ डाला।

"कुछ नहीं, सोच रहा हूँ कुछ दिनों के लिये अयोध्या का भ्रमण कर आऊँ।"

"अत्यंत ही नेक विचार है। मैं भी आपके साथ चलता हूँ - साथ ही साथ मथुरा और ब्रज के भी दर्शन कर लेंगे।"

बात अभी आगे बढ़ती कि उससे पहले ही हमेशा की तरह नारद मुनि बिना बुलाये आगंतुक की भाँति आ धमके।

"श्री राम, श्री कृष्ण, आप दोनों किस विचार विमर्श में व्यस्त हैं?"

"कुछ नहीं मुनिवर। राम और मैं अयोध्या, मथुरा और ब्रज भूमि के भ्रमण हेतु पृथ्वी लोक जाने कार्यक्रम बना रहे हैं।", श्री कृष्ण ने तत्परता से उत्तर दिया।

"हरे हरे, प्रभु प्रभु! आप लोगों को भारत भूमि के किसी और नगर में जाना चाहिये - कुछ नया कीजिये। पिछले कई युगों ने भारतीयों ने बहु-आयामी प्रगति की है। भारतीयों द्वारा की हुई प्रगति के दर्श्नार्थ हेतु आप दोनों को मुम्बई नामक नगर की ओर प्रस्थान करना चाहिये।", नारद मुनि ने भारतीय परंपरा का अनुसरण करते हुये बिन माँगी सलाह दे डाली।

श्री कृष्ण और श्री राम को नारद मुनि का सुझाव अत्यंत रोचक लगा और दोनों ने नारद मुनि से आग्रह किया कि पुष्पक विमान का मुम्बई प्रस्थान के लिये प्रबंध किया जाये।

नारद मिनु ने कहा, "प्रभु, विमान की व्यवस्था तो मैं कर देता हूँ, परंतु एक सलाह है - आप दोनों एक साधारण नागरिक के परिवेष में ही मुम्बई जायें न कि अपने दैवीय वेश भूषा और अलंकारों में।"

अंततः वो दिवस भी आ गया जब श्री राम और कृष्ण एक आम भारतीय के भाँति मुम्बई नगरी में अवतरित हो गये। प्रातः से सान्ध्य काल तक दोनों ने मुम्बई नगरी का आनन्द लिया और जब मुम्बई नगरी रात्रि के अंधकार से घिर गई तो दोनों ने एक साधारण भारतीय की भाँति लोकल ट्रेन से अपने निवास स्थान जाने का निर्णय लिया।


लोकल ट्रेन में अधिक भीड़ न थी अतः दोनों देवता खिड़की के पास बैठ गये ताकि द्रुत गामी ट्रेन की खिड़की से बाहर देखा जा सके।

ट्रेन चलते हुये अभी कुछ ही क्षण व्यतीत हुये होंगे कि सात या आठ युवकों का एक समूह दोनों देवताओं के बगल में आ खड़ा हुआ।


एक नवयुवक बोला, "ओये शाणों बाप की ट्रेन है जो खिड़की हथियाये बैठे हो?"

"वत्स, ऐसी अभद्र भाषा.."

श्री राम अपना वाक्य पूरा भी न कर पाये थे कि दूसरा युवक चिंघाड़ पड़ा, "अबे तुम दोनो साले भैय्या हो क्या?"

"वत्स ये भैय्या क्या होता है? मैं तुम्हारा तात्पर्य नहीं समझा।"

"अरे ये साले सौ परसेंट भैय्या हैं। हिन्दी तो सुनो इन सालों की। ओये शाणों नाम क्या है और किस जगह के रहने वाले हो तुम दोनों?"

"मेरा नाम राम चंद्र है और मैं अयोध्या नगरी का निवासी हूँ। और, मेरे मित्र का नाम कृष्ण है और ये मथुरा निवासी हैं।"

"मैं बोलता था न कि दोनों भैय्या हैं। अबे सालों तुम लोग यहाँ क्यों आ जाते हो हमारे महाराष्ट्र में - गंदगी फैलाने? तुम लोगों को तो मार मार कर वापस अयोध्या और मथुरा भेज देना चाहिये।"

बस ये कहते हुये "वनमानुष" निर्माण सेना के सिपाही डंडा, जूता और चप्पल ले कर पिल पड़े श्री राम और श्री कृष्ण के ऊपर। दुर्भाग्यवश धनुष, चक्र और अपनी दैवीय शक्ति के बिना हमारे देवता अपना बचाव भी न कर सके। उस दिन खूब धुनाई हुई दोनों की - वो तो भला हो भगवान का कि बस जान बच गई।

ट्रेन से उतरते ही दोनों ने त्वरित गति से मुम्बई नगरी से प्रस्थान किया और भविष्य में भारत भूमि पर वापस आने का विचार सर्वथा के लिये त्याग दिया।

अब सारी हाये तौबा का हल हमें स्वयं ही निकालना है क्यों कि भगवान भी अब भारत भूमि पर आने से रहे....
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बुधवार, फ़रवरी 11, 2009

हे भगवान!

कुछ दिन पहले की ही बात है मैं निराशाओं के बादलों से घिरा हुआ था। सोचा चलो प्रभु से ही याचना की जाये। बस पड़ोस के मंदिर में जा धमका। हर भक्त की तरह मैंने भी सौ डेसिबल का घंटा टनटनाया और हाथ जोड़ कर एक पैर पर खड़े हो कर प्रभु से प्रार्थना की - हे प्रभु! अपने इस भटके हुये भक्त का मार्ग प्रदर्शन करो। एक बड़े जोर का धमाका हुआ और जब धुँआ हटा तो अपने समक्ष प्रभु विष्णु को खड़ा पाया।

"बोल वत्स तुझे क्या चाहिये?"

"प्रभु आप भी न मजाक करते है। अभी एक मिनट पहले ही तो कहा था कि अपने इस भटके हुये भक्त को सही रास्ता दिखायें।"

"वत्स उस समय मैं पारगमन (transit) में था। परंतु तुम चिंतित न हो। समझो तुम्हरी समस्या का निवारण हो गया है। मेरे पास उपाय है।"

"प्रभु बताईये मुझ तुक्ष प्राणी को क्या करना होगा।"

"वत्स तुम्हें कुछ नहीं करना होगा। ये GPS Navigation System ग्रहण करो, बस अब तुम भविष्य में मार्ग से कदापि न भटकोगे।"
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गुरुवार, दिसंबर 18, 2008

महापुरुष

लखनऊ में निवास करते हुये भी मेरा चौक की तरफ जाना यदा-कदा ही होता है। पिछले सप्ताहाँत किसी कारणवश मुझे चौक की ओर जाना ही पड़ गया। मैं चौक के अंगद के पाँव की तरह न हिलने वाले यातायात में फंसा हुआ अपने भाग्य और वाहनों की बढ़ती हुई जनसंख्या को कुशब्दों से अलंकृत कर ही रहा था कि मुझे अपने चौक निवासी परम मित्र संजय त्रिपाठी की याद आ गयी। संजय मेरा बचपन का साथी है - मेरा परम मित्र, लंगोटिया यार। परंतु दुर्भाग्यवश अपरिहार्य कारणों के कारण मैं उससे पिछले एक या दो सालों से मिल नहीं सका हूँ। सोचा आज जब चौक की ओर आ ही गया हूँ तो संजय के घर भी हो लिया जाये। संजय महात्मा गाँधी का परम भक्त, पुजारी और महात्मा की शिक्षायों का अनुयायी रहा है। संजय के जीवन में गाँधी का स्थान समस्त देवी-देवताओं और उसके स्वयं के माता-पिता से ऊपर है। मुझे अच्छे से याद है जब पिछली बार मैं उसके घर गया था तो उसके घर की बैठक की दीवारें पूरी तरह से गाँधी जी के चित्रों से ढंकी हुई थीं।

अपना व्यक्तिगत कार्य निपटा कर मैं संजय के घर की ओर चल पड़ा। घर पहुँच कर द्वार पर दस्तक दी - संजय ने स्वयं दरवाजा खोला, और मुझे सामने खड़ा देख कर पल भर के लिये जड़वत हो गया।

"और संजय क्या हाल चाल हैं?" मेरे इस प्रश्न ने जैसे उसकी निद्रा भंग कर दी हो - दौड़ कर गले लगाया और कोसा भी कि इतने दिनों तक मैं कहाँ गायब रहा। मेरा हाथ पकड़ कर अंदर की ओर खींचता हुआ बोला, "आओ यार, अंदर आओ।"

घर की बैठक में प्रवेश करते ही मुझे एक झटका सा लगा - ये क्या दीवार पर गाँधी जी का एक भी चित्र नहीं।


मैंने कौतहूलतापूर्वक पूछा, "संजय, गाँधी जी के सारे चित्र कहाँ चले गये?"

संजय ने मेरे प्रश्न का उत्तर देने के बजाय अपना टीवी चलाया और कोई संगीत प्रतियोगिता का कार्यक्रम लगा दिया।

"लो ये कार्यक्रम देखो। तुम्हें अपने प्रश्न का उत्तर स्वयं ही मिल जायेगा।", संजय ने आक्रोश युक्त वाणी में कहा।

वैसे मैं भारतीय टीवी के कार्यक्रमों से उतना ही दूर रहता हूँ जितना कि हमारे नेता गण सच्चाई और इमानदारी से, पर मैंने बड़े संयम के साथ ये वाला कार्यक्रम पूरा देख डाला क्यों कि मुझे अपने प्रश्न का उत्तर जो खोजना था। एक घंटे के उस कार्यक्रम में बारह या तेरह युवक और युवतियों ने फिल्मी गीत गाये - कुछ ने अति सुंदर गाया, कुछ ने ठीक-ठीक और कुछ ने असहनीय। परंतु आश्चर्य की बात कि समस्त निर्णायक एवं स्वयं उद्घोषक महोदय उन प्रतियोगियों का गुणगान किये जा रहे थे जिनका गायन मेरे विचार में अपेक्षाकृत निम्न स्तर का था। और, अंत में निर्णायकों ने एक ऐसे प्रतियोगी को प्रतियोगिता से निकाल दिया जो मेरे विचार में उन निम्न स्तर प्रतियोगियों से कई स्तर ऊपर था। मुझे ये बात समझ में नहीं आई और न ही मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिला। अत: मैंने संजय से पूछ ही डाला, "ये क्या पहेलियाँ बुझा रहे हो?"

अब संजय की बारी थी और इस बार उसने अविराम कहना प्रारम्भ किया - अतुल, तुमने स्वयं देखा कि कुछ प्रतियोगियों ने कोई बहुत अच्छा नहीं गाया। फिर भी सभी निर्णायकों ने उनकी अधिक प्रसंशा की और कई अच्छा गाने वाले प्रतियोगियों की न केवल उपेक्षा की बल्कि अनावश्यक रूप से उनकी कमियों को ढूँढा। तुम्हें पता है कि जिन प्रतियोगियों के लिये तुमने कहा कि उन्होंने अच्छा नहीं गाया वो सभी पाकिस्तान से आये हैं; और वो प्रतियोगी जिन्हें अच्छे गायन के बावजूद भी फटकार मिली भारतीय हैं। मुझे ये नहीं समझ में आता है कि ये कहाँ का तर्क है कि अपने आप को महान सिद्ध करने के लिये अपने ही लोगों की उपेक्षा की जाये, और दूसरों की अनावश्यक बढ़ा चढ़ा कर प्रसंशा की जाये - उन्हें गले लगाया जाये, उनकी झोली में आँख मूँद कर सब डाल दिया जाये भले ही वो उस योग्य हों या नहीं। अतुल, मुझे पहली बार ये आभास हुआ है कि कुछ लोगों को गाँधी जी क्यों नहीं पसंद थे। हम लोग दूसरों की दृष्टि में महान बनने.....


संजय बोलता ही रहा, पर अब मुझे अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया था। थोड़ा समय संजय के साथ बिता कर मैंने एक विचलित मन के साथ उससे विदा ली। पूरे रास्ते मैं बस यही सोचता रहा कि महात्मा ने जो किया क्या वो.....
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सोमवार, अगस्त 13, 2007

कल, आज और कल - हैप्पी इंडिपेंडेंस डे!!

नवभारत टाईम्स
15 अगस्त, 1977
आज भारत की स्वाधीनता दिवस के पावन पर्व पर प्रधान मंत्री ने ध्वजारोपण के समय देश की समस्त जनता को बधाई दी और देश वासियों से भारत की बहु-आयामी प्रगति में जुट जाने के लिये आग्रह किया. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर कई नगरों में झाकियाँ निकाली गयीं और विद्यालयों में छात्रों के लिये मिष्ठान वितरण किया गया...

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नवभारत टाईम्स
15 अगस्त, 2007
आज इंडिया की इंडिपेंडेंस डे के मौके पर प्राईम मिनिस्टर ने फ्लैग सेरोमेनी के समय देश की सारी पॉपुलेशन को कॉंग्रचुलेट किया और सभी सिटिज़ेंस से ये रिक्वेस्ट किया कि वो इंडिया की ऑल-डाईमेंशन प्रोग्रेस में लग जायें. आज इंडपेंडंस डे के दिन कई शहरों में परेड ऑर्गनाईज़ की गयीं और स्कूल्स में स्टुडेंट्स में मिठाईयाँ डिस्ट्रीब्यूट की गयीं...
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Navabhaarat Times
August 15, 2027

Aaj India kee Independence Day ke occasion par Prime Minister ne flag ceremony ke time country kee entire populations ko congratulate kiya aur sabhi citizens se ye request kari ki vo India ki all-dimension progress mein involve ho jayen. Aaj Independence Day ke din kai cities mein parades organize kee gayi aur schools mein students ke liye sweets distribute kee gayee…


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वो कौन थी?

राहुल ने बधाई पत्र को उसके आवरण से निकाल कर पढ़ना प्रारंभ किया, “जीवन का अर्ध शतक सफलतापूर्वक पूर्ण करने की हार्दिक बधाई. आशा है शतक के उत्सव में भी हम सबको आमंत्रित किया जायेगा.”

राहुल ने मुस्कराते हुए सबको धन्यवाद दिया और मेज पर रखे केक पर लगी हुई मोमबत्तियाँ बुझा कर केक को काटने ही जा रहा था कि दृष्टि चौखट पर खड़ी एक छोटी सी लड़की पर जा टिकी. छः या सात साल की वो लड़की मंद मंद मुस्कान के साथ अपने आप को दरवाजे के पीछे छुपाने का असफल प्रयास कर रही थी. राहुल हाथ के इशारे से उसे अंदर बुलाने लगा. सरिता, राहुल की पत्नी, ने पीछे से आकर पूछा, “ये हाथ के इशारे से किसको अंदर बुला रहे हो?”

“वो चौखट पर जो छोटी सी लड़की खड़ी है उसी को अंदर बुला रहा हूँ. बहुत प्यारी सी है. सोचा उसको भी अपने जन्म दिवस की खुशी में सम्मलित कर लूँ.”

“पर वहाँ पर तो कोई नहीं है.”

“चौखट के पीछे ही तो खड़ी थी. लगता है भीड़ देख कर भाग गयी.”

“पर राहुल चौखट तक कोई आ ही नहीं सकता है. बाहर के गेट पर ताला लगा हुआ है. तुमको कोई भ्रम हुआ होगा.”

रात पूर्णतः फैल चुकी थी - अतिथियों ने एक बार पुनः राहुल को पचासवें जन्मदिवस की बधाई दी और एक एक कर के विदा ली. सभी लोगों के चले जाने के बाद सरिता ने राहुल से कहा, “थक गये होगे. तुम चल कर सोने की तैय्यारी करो. मैं बस थोड़ी सफाई कर के आती हूँ.”

राहुल अपने कमरे के दरवाजे तक पहुँचा ही था कि उसे अंदर से एक छोटी लड़की के खिलखिलाने की आवाज सुनाई दी – कमरे में पहुँचा तो देखा वही छोटी लड़की बिस्तर पर उछल रही थी. पर इस बार उसके बाल दूसरी तरह से बने हुये थे और कपड़े भी भिन्न थे.

“तुम यहाँ कैसे आ गयी?”

ये सुनते ही वो बच्ची बिस्तर से कूद कर खिलखिलाती हुई कमरे में इधर उधर भागने लगी और राहुल भी एक बच्चे की तरह उसका पीछा करने लगा, “ठहर. अभी पकड़ कर मैं तुम्हारी खैर लेता हूँ. तुम हो कौन? यहाँ कैसे आई?”

“राहुल ये क्या बच्चों की तरह भाग दौड़ कर रहे हो? और, ये बातें किससे कर रहे हो?”, सरिता ने पीछे से टोका.

“अरे वही छोटी लड़की....”

“राहुल ये अचानक क्या हो गया है तुमको? थक गये हो चलो अब सो जाओ.”

बिस्तर पर आँख मूँद कर आधा घंटे लेटने के बाद भी राहुल को झपकी नहीं लगी. उठ कर बाहर के कमरे की तरफ चल पड़ा पानी पीने के लिये. जैसे ही राहुल ने फ्रिज खोला, उसकी रोशनी में उसे फ्रिज के बगल में सलवार कुर्ते में सजी एक पंद्रह या सोलह वर्ष की युवती खड़ी दिखाई दी जो राहुल को एकटक देखे जा रही थी. अचंभे की बात कि राहुल को किसी भी प्रकार के भय का अनुभव नहीं हुआ.

“कौन हो तुम? अंदर कैसे आ गई सारे दरवाजे और खिड़कियाँ तो अच्छे से बंद हैं. तुम्हारी शकल तो बिल्कुल उस बच्ची से मिलती है जो अभी कुछ देर पहले मेरे सोने के कमरे में उछल कूद मचा रही थी. लगता है जैसे कि मैं तुम्हें पहले से जानता हूँ. कृपया अपना नाम बताओ.”

राहुल की बड़बड़ाहट से सरिता की आँख खुल गयी. सरिता ने बाहर आ कर देखा कि राहुल फ्रिज का दरवाजा खोल कर अपने आप से ही बातें किये जा रहा था.

“राहुल तबियत ठीक नहीं लग रही है क्या?”

“मैं तो ठीक हूँ. पर इस लड़की से पूछो कि ये अंदर कैसे आ गयी.”

“पर राहुल वहाँ तो कोई भी नहीं है. मुझको तो अब डर लगना शुरू हो गया है. कहीं कोई भटकती हुई आत्मा तो नहीं है? कुछ कहती है तुमसे?”

“कुछ नहीं. बस मंद मंद मुस्कराती रहती है.”

“अभी भी खड़ी है वहाँ पर?”

“नहीं अब चली गयी है.”

राहुल और सरिता दोनों कमरे में आकर सोने का असफल प्रयास करने लगे. सरिता को नींद नहीं आ रही थी भय के कारण, और राहुल सोच रहा था कि वो बच्ची इतनी शीघ्र इतनी बड़ी कैसे हो गयी.

अगले दिन सरिता को कार्यवश घर से बाहर जाना पड़ा. सरिता की अनुपस्तिथि में उसका चाय पीने का मन होने लगा – अतः उठ कर रसोई में जाकर चाय बनाने लगा. पानी के साथ साथ दूध, अदरक और चाय की पत्ती भी खौलने लगे कि राहुल को याद आया कि चीनी का डिब्बा तो बाहर के कमरे में रखा है. वो जब चीना का डिब्बा ले कर लौटा तो देखा कि गैस के चूल्हे के बगल में साड़ी में लिपटी हुई बीस या बाईस साल की एक युवती खड़ी थी. राहुल कुछ कहता उससे पहले ही वो युवती बोल पड़ी, “चाय कबसे बनानी शुरू कर दी? याद है पहली बार जब चाय बनाई थी तो चीनी की जगह नमक डाल दिया था.”

“तुमको कैसे पता?”

युवती कोई उत्तर देती उससे पहले ही घंटी बज उठी. राहुल ने दरवाजा खोला.

“ड्राई क्लीनिंग करवाने वाले कपड़े तो घर में ही भूल गई थी.”, कहते हुए सरिता अंदर आ गई और राहुल को विचलित देख कर पूछा, ““क्या हुआ राहुल? सब ठीक तो है?”

“रसोई में एक औरत खड़ी है.”

सरिता ने भाग कर रसोई में झाँका, “यहाँ तो कोई भी नहीं है. मुझे तो बहुत डर लग रहा है. ऐसा करो तुम घर में अकेले मत रहो. बाहर जा कर पार्क में टहल आओ. मैं ढाई तीन घंटे में वापस आ जाऊँगी.”

राहुल ने स्वीकृति में सर हिलाया और अकेले का समय व्यतीत करने के लिये पार्क में जाकर बैठ गया. अपने चारों ओर टहलते हुये लोगों और इधर उधर भागते हुये बच्चों को निहारने लगा कि अचानक उसकी दृष्टि कोने में अकेले खड़ी हुई एक दस या ग्यारह साल की लड़की पर पड़ी. वही चेहरा.... वो लड़की राहुल को अपने पास बुलाने लगी और राहुल सम्मोहित सा उसकी ओर बढ़ चला. थोड़ी ही देर में राहुल भी उस लड़की के साथ बाकी के बच्चों की तरह खिलखिलाते हुये भाग दौड़ करने लगा. समय कब व्यतीत हो गया उसे तब पता चला जब पीछे से सरिता की आवाज आई, “घर चलें?”

रास्ते में बगल में रहने वाले शर्मा दम्पति मिले. श्रीमति शर्मा ने सरिता से कहा, “आज तो भाई साहब बिलकुल बच्चों की तरह पार्क में खेल रहे थे और वो भी अकेले.”

“पर मैं अकेले...” राहुल ने अपना वाक्य अधूरा ही छोड़ दिया.

“चलो पार्क में तुम्हारा मन लग गया. पर अकेले ही भाग दौड़...”, घर पहुँच कर सरिता ने राहुल से कहा.
“मैं अकेले नहीं था. मैं तो एक दस या ग्यारह साल की लड़की के साथ... और अचंभे की बात तो ये है कि उसकी शक्ल बिल्कुल उस छोटी बच्ची, किशोर लड़की और युवती से मिलती जुलती थी.”

“राहुल तुम मुझे बहुत डरा रहे हो. मैं सोच रही हूँ पंडित जी को बुलाया जाये. खैर मैं खाना बनाने जा रही हूँ जब तक तुम ऊपर वाले कमरे का फ्यूज़ बल्ब बदल दो. मैं बल्ब ले आई हूँ बाहर के मेज पर रखा है.”

राहुल ने बल्ब उठाया और ऊपर के कमरे की ओर चल पड़ा. ऊपर पहुँचा तो उसने देखा कि कमरे में रखी हुई कुर्सी पर गुलाबी रंग का सलवार कुर्ता पहने हुये लंबे बालों वाली लगभग उन्नीस वर्षीय एक युवती बैठी हुई है.

“कौन हो तुम? हर बार अलग अलग वेश-भूषा और आयु में दिखती हो.... मेरे अतिरिक्त किसी और को क्यों नहीं दिखायी देती हो?”

“राहुल मैं मात्र तुम्हारे जीवन का अंश हूँ किसी और को कैसे दिखाई पड़ सकती हूँ? तुम्हें पता है मैं कौन हूँ परंतु न जाने क्यों तुम मुझे स्वीकार करने का साहस नहीं कर पा रहे हो.”

“नहीं पता है मुझे कि कौन हो तुम. क्या नाम है तुम्हारा?”

“मेरा नाम जानने की जिज्ञासा है? मेरा नाम स्मृति है.”

ये सुन कर राहुल कुछ देर चुप रहा और फिर धीरे से बोला, “स्मृति – मेरे बचपन और युवा अवस्था की स्मृति. स्मृति, तुम बहुत निष्ठुर हो.”
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टिस्क!

मेरे एक पुराने घनिष्ठ मित्र हैं आत्म त्रिवेदी. सातवीं कक्षा से लेकर बारहवीं तक मैं और मेरे समस्त साथी गण इन्हें पंडत (पंडित का बिगड़ा रूप) कह कर ही सम्बोधित करते आये हैं.

जब हम सबने नवीं कक्षा में पदार्पण किया तो चिकित्सक बनने की चाह वालों ने जीव विज्ञान और अभियंता बनने का स्वप्न देखने वालों ने गणित का चयन किया. पंडत हिन्दी का पुजारी और भक्त था. जयशंकर प्रसाद और रामधारी सिंह “दिनकर” जैसे लोग उसके प्रेरणा पात्र थे. पंडत का स्वप्न था एक कवि, लेखक और उद्घोषक बनने का. अतः बिना किसी झिझक के उसने जीव विज्ञान और गणित का परित्याग कर के संस्कृत के चरणों में मस्तक रख दिया.

समय बीता – कुछ यार दोस्त डॉक्टर बन गये और कुछ रो पीट कर अभियंता. और, पंडत इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी और संस्कृत का विद्वान बन कर प्रकट हुआ.

पंडत के लेख और कवितायें धर्मयुग और सारिका जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपने लगे. कुछ ही वर्षों में भारी भरकम वेतन के साथ एक मासिक हिन्दी पत्रिका का संपादक भी बन बैठा. पर ये सब तो लगभग बीस-पच्चीस साल पुरानी बात है. समय कुछ अधिक तेजी से ही बदला. समय के हथौड़े से धर्मयुग जैसी पत्रिकाओं की दोनों टाँगें टूट गयीं - कुछ समय तक तो घिसट घिसट कर चलती रहीं, पर अंततः लाभ और हानि के आँकणों के सामने आकर दम तोड़ दिया. अब भला पंडत की छोटी सी पत्रिका की क्या औकात - उसे भी कुछ वर्षों के उपराँत आत्म-दाह करना ही पड़ गया.

तैंतालीस वर्ष की आयु में पंडत एक बार पुनः ढंग की नौकरी ढूँढने में लग गया. घर में बीबी उलाहना देती फिरती – अरे अगर अंग्रेजी में कुछ किया होता तो कम से कम “एक महिने में फ़र्राटे दार अंग्रेजी बोलना सीखें” जैसे कोचिंग कॉलेज में ठीक ठाक नौकरी मिल जाती. पंडत का पंद्रह साल का किशोर लड़का भी दुखी रहता कि उसके “डैड” बिलकुल भी “कूल” नहीं है.


पंडत के पास कुछ एक हिन्दी के समाचार पत्रों से प्रस्ताव आये, पर इन समाचार पत्रों के हिन्दी के निम्न और घटिया स्तर को देख कर उसका मन खिन्न हो उठा. साथ में उसे ये भी लगा कि इन समाचार पत्रों में नौकरी करने से वो कभी भी अपने पुत्र के लिये एक “कूल डैड” नहीं बन सकेगा.

बस इसी उधेड़बुन के साथ पंडत मेरे साथ बैठा चाय की चुस्कियाँ ले रहा था, और साथ में बैठे थे मेरे एक और मित्र राजीव सिंह. राजीव ने पंडत की करुण गाथा सुनी और गला खंखारते हुये पंडत को सलाह दी, “त्रिवेदी भाई आप कहानियाँ लिखते हो, कवितायें रचते हो. अपने इन गुणों का सदुपयोग “बॉलीवुड” में क्यों नहीं करते हो? और, आपके बेटे को भी ये कहते हुये गर्व होगा कि उसका “डैडी” भी बॉलीवुड की एक हस्ती है. अगर आप जरा भी रुचि रखते हों तो बेझिझक मुझे बतायें मैं आपकी भेंट बॉलीवुड की कुछ हस्तियों से करवा दूँगा.” मैंने राजीव को एक तिरछी प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. राजीव ने मेरी ओर मुस्कुराते हुये कहा, “अरे भाई ऐसे क्यों देख रहे हो. मुम्बई में नौकरी के साथ साथ रंगमंच पर भी काम करता हूँ. उसी के जरिये किरन गौहर से भेंट हो गयी और उसकी तीन चार फिल्मों में छोटी मोटी भूमिकायें करने को मिल गयीं. किरन से मेरी ठीक ठाक जान पहचान है.”

पंडत ने उत्सुकता से कहा, “हाँ एक महिला के लिये साहित्यिक कार्य करना अच्छा भी रहेगा क्यों कि पुरुषों की अपेक्षा महिलायें अधिक संवेदनाशील होती हैं.” राजीव ने हँस कर उत्तर दिया, “त्रिवेदी भाई, किरन गौहर कोई औरत वौरत नहीं बल्कि आदमी हैं. हाँ हाव भाव अवश्य महिलाओं जैसे हैं. लगता है आपने उनकी ब्लॉक-बस्टर फिल्में देखी नहीं हैं. ‘कभी सुट्टा कभी रम’, ‘कभी आलू बड़ी न खाना’ और ‘कब्ज़ हो न हो’ जैसी महान कृतियाँ उन्हीं के दिमाग की उपज हैं.”

खैर, पंडत ने राजीव की सलाह स्वीकार कर ली और पहुँच गया मुम्बई अपनी लेखनी से सबको सम्मोहित करने. पंडत का सौभाग्य कि किरन ने “क” अक्षर से एक और “कूड़ा” बनाने का निर्णय लिया और एक नये गीतकार की खोज प्रारंभ हो गयी. राजीव भी मौके का लाभ उठाते हुये पंडत को लेकर किरन के समक्ष उपस्थित हो गया. किरन ने मुस्करा कर पंडत और राजीव से पूछा, “विल यू लाईक टु हैव कॉफी विद किरन गौहर.” सारी बेकार की औपचारिकताओं के बाद किरन ने पंडत से कहा, “आत्म डियर, हेयर इज़ ए सीन फ्रॉम माई न्यू मूवी. हेरोईन इज़ गेटिंग मैरिड. हर फ्रेंड्स ऐंड रिलेटिव्ज़ आर सिलेब्रेटिंग, डाँसिंग ऐंड सिंगिंग. कैन यू राईट ए नाईस साँग फॉर दिस सिचुएशन?”

पंडत हाथ में कलम और एक पन्ना लेकर कोने में जा बैठा. करीब आधा घंटा तक सर खुजाने के बाद पंडत के दिमाग के घोड़े थोड़े गतिशील हुये. कुछ देर के बाद वो किरन के समक्ष अपनी रचना लेकर उपस्तिथ हुआ -

सखी तुझे इस पावन बेला पर क्या दूँ मैं उपहार,
बस प्यार के इस दोने में कर कुछ स्मृतियाँ स्वीकार.
जब पिया जायें परदेस, और अकेली हो तुम साँझ सवेरे,
चुम्बन कर लेना दोने का, आ जाऊँगी झूले की पेंग लगा आँगन में तेरे.

“होल्ड इट होल्ड इट.” किरन ने झुँझलाते हुये कहा, “ये कौन सी लैंग्वेज़ में लिख रहे हो? आई आस्क्ड यू टु राईट इन हिन्दी, नॉट इन संस्कृत. ये सब कौन से वर्ड हैं? हू विल अंडरस्टैंड दीज़ – दोना, स्वीकार, उपहार ऐंड समरितया व्हाट एवर दैट इज़. आई वान्ट समथिंग मॉडर्न, पेपी ऐंड स्टाईलिश.”

पंडत को एक हजार वोल्ट का झटका लग गया. बेचारा आँसुओं को किसी तरह रोक कर राजीव के साथ भौंचक्का सा वापस घर आ गया. उसी शाम को राजीव के घर राजीव के एक सॉफ्टवियर इंजीनियर मित्र नितिन पधारे. पंडत से भी मिले. कॉफी पी, समोसे खाये और साथ में गीत लेखन से संबन्धित सुबह का किस्सा सुना. नितिन ने हँसते हुये कहा, “आत्म यार तुम भी कहाँ अकल के घोड़े दौड़ाने में लग गये. कंप्यूटर का जमाना है. अब अगर कंप्यूटर सारे वाद्य यंत्रों की जगह ले सकता है तो गीत की धुन क्यों नहीं बना सकता है? अरे मैं तो यह भी कहूँगा कि गीत की रचना क्यों नहीं कर सकता है? मानता हूँ कि ऐसे गीतों में कोई भावना या मादकता नहीं होगी, पर आजकल संगीत भी तो हर चीज की तरह एक प्रयोज्य (disposable) वस्तु होकर ही तो रह गया है. मैंने एक सॉफ्टवेयर लिखा है “टिस्क” (TISC – The Incredible Song Constructor). आप इसमें अपने मनपसंद शब्दों की सूची डाल दीजिये, “गीत रचना” बटन पर क्लिक कीजिये – बस मेरा जादुई “टिस्क” शब्दों की सूची में से कुछ शब्दों का चुनाव कर के उन्हें एक अनियमित क्रम में रख कर गीत बना डालेगा. मैं अभी ऑफिस से ही आ रहा हूँ. मेरा लैपटॉप साथ में है, अगर तुम चाहो तो “टिस्क” का प्रयोग कर के देख लो.”

पंडत ने मरे मन से कहा – चलो ये भी कर के देख लिया जाये. लैपटॉप चलाया गया. “टिस्क” में गीत श्रेणी चुनी गयी “मॉडर्न”. “मॉडर्न” श्रेणी के लिये नीचे लिखे शब्द पहले से ही शब्द-सूची में पड़े हुये थे:

माही
बल्ले बल्ले
हड़िप्पा
चूड़ियाँ
शरारा
बेबी
पार्टी
लव
यू
कुड़ी
किस
आई
वाना (वांट टू)
आहा आहा
यो
कूल
रब्बा
ओ या
गल
नसीबा
और भी कई अंग्रेजी और पंजाबी के शब्द....

पंडत ने धड़कते हृदय से “गीत रचना” वाला बटन क्लिक कर किया, और ये लो लैपटॉप की स्क्रीन पर एक “मॉडर्न” गीत तैय्यार हो कर आ गया:

ओ या
आहा आहा
ओ या
यो बेबी यो बेबी, ओ या
आई वाना टेल यू आहा आहा
वाना वाना टेल यू बेबी
यू कूल यू क्यूट, आई लव यू ओ या
ओ....
माही.. माही वे...
रब्बा तेरे नसीबा आया...
एक कूल डूड... हाऊज़ दैट..
हियर इज़ द पार्टी...
ओ या
मैं हाथों विच लगा दे मेंहदी..
बालों विच लगा दे गजरा..
पहन दे शरारा...
यो बेबी यू डाँस.
मेरी प्यारी कुड़ी बनी एक दुल्हन...
आई वाना किस यू, वाना वाना किस यू बेबी...
हाऊज़ दैट..
ओ या.

ये पढ़ कर पंडत ने अपना माथा मेज पर दे मारा, बोला, “ये क्या कचरा है. इसको गीत कहते हो?” नितिन ने तत्परता से कहा, “अरे पहले इसे किरन को सुना कर आओ फिर कुछ कहना.”


अगले दिन सुबह सुबह ही पंडत और राजीव जा पहुँचे किरन के घर और पंडत ने एक ही साँस में “अपना” नया “साँग” सुना डाला. “साँग” खतम होने के बाद कमरे में कुछ देर शांति छाई रही, फिर अचानक किरन ने दौड़ कर पंडत को गले लगाते हुये कहा, “फेंटास्टिक, सुपर्ब, माईंड-ब्लोईंग.” पंडत की बोहनी हो गयी और वो एक बार पुनः प्रसिद्धि के पथ पर चल पड़ा.

पिछले हफ्ते काम के सिलसिले में मुम्बई जाना हुआ. पंडत से मिलने उसके घर भी गया. घर और घर की साज सज्जा से पंडत की नयी संपन्नता झलक रही थी. मैंने पंडत से उसके पुनर्जन्म और नये अवतार के बारे में पूछा. एक लम्बी सी आह भरते हुए पंडत ने कहा, “लड़का मुझ पर गर्व करने लग गया है. बीबी भी खुश रहती है. लक्ष्मी देवी भी कृपालु हो गयी हैं. पर ये सब मुझे प्राप्त हुआ है आत्म त्रिवेदी की हत्या कर के. बस यही सोच कर हृदय से ग्लानि का बोझा हटाने का प्रयत्न करता हूँ कि आत्म त्रिवेदी को मैंने अकेले ही नहीं मारा है. उसके और उसके जैसे कई और लोगों की आसमयिक मृत्यु के लिये भारत के कई बड़े नगरों की बड़ी जनसंख्या उत्तरदायी है. दिल ढूँढता है फिर वही....”

साहिर, शैलेन्द्र, कैफी आज़मी और गुलज़ार को समर्पित.
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मंगलवार, मई 08, 2007

ऐसा और कहाँ....

कई दिनों की व्यस्तता के पश्चात पिछले सप्ताहाँत थोड़ा खाली समय मिला. सोचा चलो कुछ घुमाई कर ली जाये. जंग खाती हुई अपनी दस-बारह साल पुरानी खटारा मारुति निकाली और चल पड़ा कनॉट प्लेस की ओर.

किस्मत ने थोड़ा साथ दिया और आसानी से पार्किंग मिल गई. अपनी कार खड़ी ही कर रहा था कि बिना चाहते हुए भी बगल में खड़ी चमचमाती हुई टोयोटा कैमरी पर नजर पड़ ही गयी. सुना है मिला जुला कर तकरीबन बीस या पच्चीस लाख की पड़ती है. मन ही मन सोचा किसी नेता, अभिनेता या स्मगलर की होगी – बिना चोरी चमारी किये कोई इतना पैसा कमा ही नहीं सकता है कि ऐसी कार खरीद सके. चाभी उमेंठ कर अपनी कार का दरवाजा बंद कर के चलने ही वाला था कि बगल वाली कार के रिमोट दरवाजों की बंद होने वाली ध्वनि ने एक बार पुनः ध्यान आकर्षित कर लिया. देखा कार के बगल में अपनी ही उमर के एक महानुभाव सूट और टाई लगाये खड़े हुये थे. नजरें थोड़ी और पैनी हुई तो हाथ में कीमती विदेशी घड़ी और आँखों पर असली रे-बैन का धूप का चश्मा भी दिख गया. रे-बैन से जब नजरें हटीं तो चेहरे पर भी ध्यान चला गया – चेहरा कुछ पहचाना सा लगा. अरे ये तो मनोज सिंह लगता है. पर मन ने ये स्वीकार करने से साफ मना कर दिया.

मनोज सिंह आठवीं से लेकर बारहवीं तक मेरी ही कक्षा में हुआ करता था. पढ़ने लिखने में सबसे पीछे, पर आवारागर्दी, सिगरेट पीने, स्कूल कट करने और बाकी की सभी दुर्गणों में अग्रणी था. जिस प्रकार हिन्दी फिल्मों का नायक लफंगागिरी, आवारागर्दी, चोरी चमारी वगैरह वगैरह करने के उपराँत भी एक नेक इंसान और दिल का अच्छा होता है; उसी प्रकार मनोज भी दिल का बहुत साफ था – और, मात्र इसी कारण मेरी उससे बात चीत हो जाती थी. परंतु मैं था पढ़ाई में अग्रणी. अतः मेरे सभी हितैषियों ने सलाह दी कि मनोज जैसे प्राणी से मुझे कोसों दूर रहना चाहिये. उसके बाद से मेरी मनोज से भूले भटके साल में दो या तीन बार बात हो जाती थी – वो भी तब जब उसका मन गलती से विद्यालय-दर्शन के लिये आतुर हो जाता था. बारहवीं के बाद मैं घिस-घिसा कर भारत के अग्रणी इंजीनियरिंग कालेज में पहुँच गया. कुछ साल के बाद पता चला कि मनोज ने फैज़ाबाद से बी.ए. कर के पढ़ाई छोड़ दी थी और घर में खाली बैठ कर अपने पिताजी का रक्तचाप बढ़ाने में लग गया था.

इतनी घिसाई करने के बाद मैं एक पुरानी मारुति में और मनोज सिंह कैमरी में – ये कुनैन की गोली तो निगली ही नहीं जा पा रही थी. खैर दिल थोड़ा बड़ा कर के मैं उन महानुभाव की ओर बढ़ा और हिम्मत कर के एक प्रश्नवाचक दृष्टि से पूछा, “मनोज सिं...?”


“अरे अतुल! क्या बात है. पूरे 25 साल बाद मिल रहे होंगे. हाँ भाई मैं वही पुराना मनोज हूँ.”

“पुराने वाले मनोज तो नहीं हो सकते हो – ये गाड़ी, ये ठाठ... नेता बन गये, पुलिस में भर्ती हो गये या स्मगलिंग वगैरह करने लग गये?”

“ऐसा कुछ नहीं है. यार मैं आवारा और लफंगा जरूर था पर किसी को नुकसान पहुँचाने वाला गैर कानूनी काम न तो कभी किया और न ही करने का विचार है.”

“तो ये नई नई कैमरी...?”

“अरे यार ये तो भारतीय क्रिकेट टीम के वर्ड कप से बाहर हो जाने का परिणाम है.”

“सट्टा बाजी की थी क्या?”

“तौबा तौबा. भाई मैं इज्जतदार बिजनेस मैन हूँ. अपनी फैक्टरी है. अभी मुझे एक जरूरी मीटिंग में जाना है. अपना पता बताओ मैं कल तुम्हारे घर आता हूँ.”

मैंने अपना कार्ड मनोज के हाथों में थमाया और हम दोनों अपने अपने रास्ते निकल गये. अगले दिन सुबह सुबह ही मनोज घर आ धमका. पाँच दस मिनट बैठा और बोला, “चलो तुमको अपनी फैक्टरी ले चलता हूँ.”

मैं तैय्यार हो कर उसके साथ निकल पड़ा – मन आतुर हो रहा था मनोज की सफलता का रहस्य जानने के लिये. आधे घंटे के बाद मैं उसकी नौएडा की फैक्टरी की सामने खड़ा था. फैक्टरी में जाने से पहले मैंने पूछा, “मनोज, फैक्टरी तो देख ही लेंगे पर पहले ये बताओ कि वर्ड कप और कैमरी का क्या संबंध है.”

“अतुल भाई ये बताओ कि भारत में लोग सबसे अधिक समय क्या करने में बरबाद करते हैं?”

“इस तरफ तो कभी सोचा ही नहीं.”

“मैं बताता हूँ – हड़ताल, धरना देना, मोर्चा निकालना, तोड़ फोड़ करना और इसी से मिलती जुलती कई तरह की हरकतें करना. अब ये बताओ कि इन हरकतों को सफलतापूर्वक करने के लिये किन किन चीजों की आवश्यकता पड़ती है?”

“लोगों की?”

“अरे भारत में फालतू के लोग हजारों लाखों में मिल जाते हैं. लोगों के अलावा जरूरत होती है मालों की, जूते चप्पलों की, पुतलों की, बैनर्स की. जिस दिन भारत वर्ड कप से बाहर हुया – मुझे पता था कि अगले ही दिन पूरे भारत में गली गली धरने दिये जायेंगे; जुलूस निकलेंगे; क्रिकेट की अर्थियाँ जलाई जायेंगी; सचिन, राहुल और धोनी वगैरह के पुतले जलाये जायेंगे और कुछ एक के घरों में ईंटे पत्थर भी फेंके जायेंगे. मतलब कि अगले ही दिन इन सब चीजों की भारी तादात में माँग होगी. बस मेरी फैक्टरी ने तुरंत थोक के भाव सबके पुतले, क्रिकेट की अर्थियाँ, फेंकने योग्य सस्तमूले जूते चप्पल बनाने शुरू कर दिये. अगले तीन हफ्तों में मैंने करीब तीस लाख रुपये का कचरा बेच डाला और बस कैमरी आ गई.”

मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया, “जीनियस यार जीनियस. ऐसा धाँसू आईडिया मेरे दिमाग में क्यों नहीं आया.”

“अब तो तुम्हें पता ही चल गया होगा कि मेरी फैक्टरी में क्या बनता है. फिर भी अंदर चलो.”

फैक्टरी में प्रवेश करते ही सबसे पहले देखा कि पुतले बनाये जा रहे है. मैं कुछ कहता उससे पहले ही मनोज ने कहना प्रारंभ कर दिया, “सामान की माँग परिस्तिथियों और घटनाओं के हिसाब से बदलती रहती है. पर फेंकने योग्य सस्तमूले जूते चप्पल, मालाओं और ईंटे पत्थर हमेशा ही माँग में रहते हैं.”

“पर कोई ईंटे पत्थर क्यों खरीदेगा. ये तो हर गली नुक्कड़ में भरे पड़े रहते हैं.”

“इन केस अगर आपका धरना या प्रदर्शन किसी साफ सुथरी जगह हो रहा हो तो अचानक थोक में ईंटे पत्थर कहाँ से लाओगे?”

“खैर ये पुतला किसका बन रहा है?”

“ये वाला शिल्पा शेट्टी का है और वो रिचर्ड गियर का है. भला हो दोनों का कि खुले आम किस कर लिया – बस, मेरी योरोप ट्रिप का पैसा निकल आया. महान देश है अपना. आप पैंट और कच्छा उतार कर खुले आम हग और मूत सकते हैं, पर किस नहीं कर सकते हैं. मैं तो मनाता हूँ कि ऐसे लोगों की जनसंख्या दिन दूनी और रात चौगनी बढ़े – भाई अपने धंधे के लिये अच्छा है वरना मेरे जैसा निकम्मा और निखट्टू सुलभ शौचालय साफ करता मिलेगा.”

थोड़ा और आगे बढ़ा तो देखा एक ओर छोटे छोटे पतली प्लास्टिक़ के बैगों का ढेर लगा था और पास में कड़ाहों में लाल रंग का द्रव्य.

“अब ये क्या बन रहा है?”


“टमाटर. विपक्षी दल के नेता के भाषण में सड़े टमाटरों के प्रयोग से तो तुम परिचित हो ही. पर इस युग में इतने महंगे टमाटर कौन फेंकेगा? पहले तो लोग सड़े गले टमाटर फेंक लिया करते थे, पर जबसे ये एम. एन. सी. कंपनियाँ आई हैं सड़े गले टमाटर टोमैटो केचप और सॉस में प्रयुक्त हो जाते हैं”

फैक्टरी देखने के बाद मेरा घर जाने का समय आ गया. वापसी में मैंने मनोज से पूछा, “भारत अब विकास के पथ पर है. तुम्हारा ये धंधा कब तक चलेगा?”


“जब तक सूरज चाँद रहेगा. अब देखो न परसों ही मंदिरा बेदी ने एक साड़ी पहन ली जिस पर भारत का झंडा बना था और वो झंडा मंदिरा के घुटनों के नीचे था – बस मच गयी हाये तौबा. अब अगले एक दो दिन इस घटना के हवन के लियी सामग्री बनानी पड़ेगी. जब तक अपना देश ऐसे बेवकूफों से भरा रहेगा, मेरा धंधा तो फलता फूलता रहेगा. अभी तो मैं सिर्फ बड़े बड़े शहरों में माल सप्लाई करता हूँ. अगर मेरी पहुँच गाँव गाँव हो गयी तो करोड़ों की आमदनी हो जायेगी. चाहो तो मेरे बिजनेस में भागीदार बन जाओ. मुझसे ज्यादा पढ़े लिखे हो – बिजनेस बढ़ाने में मेरी मदद करो. इंटरनेट शिंटरनेट पर भी डालो. ये लो तुम्हारा घर आ गया. और हाँ मेरे प्रस्ताव के बारे में ध्यान से सोचना.”

पूरा एक सप्ताह हो गया है मनोज से मिले हुये. इन पिछले चार पाँच दिनों में मेरी भी दबी हुई इच्छाओं ने पेंगे मारनी शुरू कर दी हैं – अपना भी मन होता है आलीशान गाड़ी चलाने का. सोच रहा हूँ नौकरी छोड़ कर मनोज के व्यवसाय में भागीदार बन जाऊँ. भारत जैसे देश में इस तरह का धंधा तो बंद होने से रहा – इससे अच्छी नौकरी-सुरक्षा और कहाँ मिलेगी. मेरी तो सलाह है कि आप भी हमारे गुट में शामिल होने की सोचें. मेरे प्रस्ताव के बारे में अपने विचार टिप्पणी के माध्यम से छोड़ दें.
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मंगलवार, मार्च 13, 2007

वानरतंत्र

प्राचीन समय में अनंत वन में शक्तिशाली सिंह अभयंकर का एकक्षत्र राज्य था. अभयंकर एक अत्यंत ही निपुण, शिक्षित, साहसी, विद्वान एवं उदार शासक था तथा राज्य को सुचारुपूर्वक चलाने में पूर्णतः सक्षम था. अनंत वन के सभी प्राणी और समस्त पड़ोसी राज्यों के राजा अभयंकर का आदर करते थे.

परंतु हर राज्य या राष्ट्र में ऐसे तत्व अवश्य होते हैं जिनकी मानसिकता विनाशकारी होती है और उनको किसी भी प्रकार के संतुष्ट नहीं किया जा सकता है. दुर्भाग्यवश, अनंत वन के वानर इसी श्रेणी के नागरिकों में आते थे. वानर समुदाय चोरी, तोड़ फोड़, अन्य नागरिकों के कार्य में विघ्न पहुँचाने तथा वन के नियमों का उल्लंघन करने में अग्रणी था. राज्य में उचित व्यवस्था बनाये रखने के लिये अभयंकर ने कड़े नियम स्थापित कर रखे थे और इन्हीं नियमों के कारण वानर खुल कर मनमानी करने में अक्षम थे. इसी कारण से समस्त वानर अभयंकर से क्षुब्ध थे और उसको किसी प्रकार से अपदस्थ करना चाहते थे.

एक दिन वानरों का मुखिया दुष्कामी घूमते घूमते पड़ोसी राज्य जनराष्ट्र में पहुँच गया. जनराष्ट्र अनंत वन का मित्र राज्य था और वहाँ के अधिकांश नागरिक सुशिक्षित तथा स्व-अनुशासित थे. दुष्कामी को जनराष्ट्र के राज-काज की पद्धति अलग सी प्रतीत हुई अतः वो जनराष्ट्र में कुछ दिनों के लिये रुक गया वहाँ के राज-काज की पद्धति के बारे में जानकारी प्राप्त करने के लिये.

कुछ दिनों के पश्चात दुष्कामी अनंत वन वापस आया और उसने घूम घूम कर सभी नागरिकों को ये बताना प्रारम्भ कर दिया कि जनराष्ट्र किस प्रकार से भिन्न है. दुष्कामी ने एक नागरिक सभा का आयोजन किया और नागरिकों को सभा में आने के लिये निःशुल्क भोजन का लोभ दिया. सभा में दुष्कामी ने बताया कि जनराष्ट्र में प्रजातंत्र है – राज्य के नागरिक मिल जुल कर ये निर्णय लेते हैं कि उनका शासक कौन बने. कोई भी नागरिक राज्य के शासक के पद के लिये अपना नामांकन कर सकता है भले ही वो अशिक्षित या भ्रष्टाचारी ही क्यों न हो. राज्य के नागरिक मतदान देकर निर्वाचन में खड़े किसी एक उम्मीदवार को अपना शासक चुनते हैं.

अनंत वन के सभी नागरिकों को प्रजातंत्र का विचार बहुत ही भाया और सभी ने अभयंकर के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत किये. अभयंकर ने कहा कि यदि प्रजातंत्र के माध्यम से एक अत्यंत सक्षम शासक का चयन हो सकता है जो कि राज्य को कुशलतापूर्वक सुचारु रूप से चला सके, तो मुझे प्रजातंत्र से कोई आपत्ति नहीं है. अभयंकर ने उसी समय घोषणा की कि अनंत वन में प्रजातंत्र की स्थापना की जा रही है और अगले माह शासक चुनने के लिये मतदान किये जायेंगे.

निर्वाचन हेतु दुष्कामी और अभयंकर का नामांकन हुआ. अभयंकर को विश्वास था कि अनंत वन की जनता दुष्कामी जैसे दुराचारी की जगह उस जैसे निपुण, शिक्षित, साहसी, एवं विद्वान को ही अपना शासक चुनेगी. परंतु सभी वानरों ने, जो कि समस्त राज्य की 25 प्रतिशत जनसंख्या थी, दुष्कामी को ही अपना मत दिया. वानरों के अतिरिक्त राज्य के अशिक्षित नागरिकों ने भी दुष्कामी द्वारा दिये गये उपहारों को स्वीकार कर के अपना मत दुष्कामी के हित में डाल दिया. अंततः चुनाव परिणाम ने दुष्कामी को अनंत वन का शासक घोषित किया.

दुष्कामी के विजयी होते ही समस्त वानर और उनके जैसी मानसिकता रखने वाले अन्य नागरिकों की पौ-बारह हो गयी. और, देखते ही देखते समस्त राज्य में अराजकता फैल गयी.

प्रति वर्ष चुनाव होते पर परिणाम सर्वदा एक ही होता – दुष्कामी की विजय, अभयंकर की पराजय और अराजकता का विस्तार. अंततः अभयंकर ने राजनीति से सन्यास ले लिया और एक विद्यालय की स्थापना की. विद्यालय स्थापना के दिवस एक नागरिक ने अभयंकर से पूछा कि उसने किसी और कार्य के बारे में क्यों नहीं सोचा. अभयंकर ने उत्तर दिया -

किसी भी प्रजातंत्र की सफलता के लिये ये अत्यंत ही आवश्यक है कि उस राज्य या राष्ट्र के अधिकांश नागरिक शिक्षित, स्वयं ही अनुशासित हों, भ्रष्ट न हों, और सही और गलत को पहचानते हुये उचित निर्णय में सक्षम हों. और, ये तभी संभव है जब कि शिक्षा की आधारशिला ऐसे नागरिक बनाने के लिये रखी जाये. मेरे विचार से अनंत वन के नागरिक इस प्रकार से शिक्षित नहीं किये गये थे. हम लोगों ने शिक्षा को मात्र गणित, भौतिकी और रसायन शास्त्र की सीमाओं में बाँध दिया है. मेरा ऐसा मानना है कि अनंत वन प्रजातंत्र के लिये तैय्यार नहीं था, और, प्रजातंत्र की इमारत बिना एक ठोस आधारशिला के खड़ी कर दी गयी. बंदर के हाथ में कृपाण दोगे तो वो दूसरों के साथ साथ अपनी भी गर्दन काट डालेगा. प्रजातंत्र एक कृपाण ही है – इसे देने से पूर्व यह निश्चित कर लेना चाहिये कि इसे ग्रहण करने वाला इसको उचित प्रकार से प्रयोग में ला भी पायेगा अथवा नहीं. इस विद्यालय की स्थापना के पीछे मेरा एक मात्र उद्देश्य है अज्ञानता का विनाश कर के अच्छे नागरिक बनाना जो कि प्रजातंत्र को एक उचित दिशा में ले जा सकें – स्वार्थ रहित. और, इस वानरतंत्र को हटा कर एक वास्तविक प्रजातंत्र की स्थापना कर सकें.

अभयंकर ने जगह जगह इस प्रकार के विद्यालयों और महा-विद्यालयों की स्थापना की - परिणाम स्वरूप अगली पीढ़ी के नागरिकों ने अभयंकर जैसे योग्य व्यक्ति को एक बार पुनः शासक के पद पर स्थापित कर दिया.
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ये डे, वो डे

टड़ाँग, ढड़ाँग, छन्न, टन्न – भगवान बचाये बगल में रहने वाले गुप्ता दंपति से. सुबह सुबह नींद खोल दी बर्तनों की टनटनाहट से. पता नहीं बर्तन धोये जा रहे हैं या बर्तनों से किसी को धोया जा रहा है. उठ कर मैं बालकनी की ओर चला ये पता करने के कि बगल वाले फ्लैट में हो क्या रहा है. बाहर जाकर देखा गुप्ता जी कोने में अपना सर पकड़ कर खड़े हैं. देखने से तो लग रहा था कि सर में चोट लगी हुई है. मैंने चिंता दिखाते हुए पूछा, “ये चोट कैसे लग गयी?”

“अरे कुछ नहीं फिसल कर बर्तनों पर गिर गया.”

“गुप्ता जी बर्तनों पर गिर गये कि बर्तनों को ऊपर गिरा दिया गया.”

बात आगे बढ़ती उससे पहले ही श्रीमति गुप्ता बाहर आकर मानसून के घने काले बादल की तरह गुप्ता जी पर बरस पड़ीं. जवाब में गुप्ता जी भी भूखे शेर की तरह दहाड़ पड़े. नतीजे में श्रीमति गुप्ता तीन चार आँसू टपकाते हुये अंदर चली गयीं.

यह सब देखने के उपरांत मैंने एक आदर्श भारतीय पड़ोसी की तरह गुप्ता जी को बिन माँगे मुफ्त की सलाह दे दी, “क्या करते हो गुप्ता जी. बीबी को प्यार से रखा करो. अब अंदर जाकर प्यार से ज्वालामुखी को शांत करो.”

गुप्ता जी बोले, “अरे भाई आज कोई वेलंटाईन डे है क्या? प्यार व्यार, मनाना जताना सब कर लिया कल. अब बैक टू नारमल लाईफ.”

अचानक मेरे पेट में फिर से गुड़गुड़ाहट हुई और मैं लपक कर बड़े घर की ओर भागा. अब आप लोगों से क्या छुपाना - लखनऊ नगरी में बाहर जाकर रेस्टोरेंट वगैरह में खाने का प्रचलन कोई बहुत ज्यादा तो है नहीं. रेस्टोरेंट वाले हर शनिवार को थोक में खाना बनाते हैं इस आशा के साथ कि सप्ताहांत में शायद भीड़ भड़्ड़क्का हो. ऐसा होता है नहीं अतः वही खाना कई दिनों और कभी कभी तो कई महिनों तक चल जाता है. अच्छी तरह से खमीर उठे हुये खाने का सबसे अधिक उपभोग होता है वेलंटाईन डे के दिन – कारण तो आप सभी अच्छे से ही जानते हैं. बस कल रात मैं भी पास के ही मुग़लई रेस्टोरेंट में इसी तरह के खाने का भोग लगा आया. ये खमीर उठे हुये खाने बड़े तुनक मिजाज होते हैं – बस लड़ पड़े पेट से कि नहीं रहना है तुम्हारे साथ. पेट महराज भी अकड़ गये – नहीं रहना है तो दफा हो जाओ यहाँ से. सुलह कराने वाली मिस पुदीन हरा भी नहीं थी अतः पेट जी के दफा आदेश के कारण रात में कई बार....

रात भर की दौड़ भाग की वजह से तबियत थोड़ी ढीली लग रही थी इसलिये “धपजी” (धर्म पत्नी जी) से कहा कि आज ऑफिस जाने का कार्यक्रम स्थगित. धपजी थोड़ा सा आपत्तिजनक लहजे में बोलीं, “तो क्या सारे दिन घर पर ही पड़े रहोगे.”

“नहीं घर पर पड़े पड़े क्या करूँगा. सोचता हूँ साईकिल उठा कर आस पास का चक्कर लगा आऊँ. इसी बहाने थोड़ी इक्सरसाईज़ हो जायेगी.”

हाथ मुँह धोकर पेट के बिगड़े हुये मूड को ध्यान में रखते हुये कॉर्न फ्लेक्स का नाश्ता किया, धपजी ने बाजार से सब्जी और परचून लाने की लिस्ट हाथ में जबरन थमा दी, और मैं अपनी साईकिल उठा कर निकल पड़ा. अभी गली के कोने तक ही पहुँचा था कि संजीवनी मेडिकल स्टोर के मिश्रा जी ने पीछे से टोक दिया, “सुबह सुबह साईकिल उठा कर कहाँ चल दिये श्रीवास्तव जी.”

“बस यहीं आस पास ऐसे ही...”

“क्यों आज कोई खास बात है क्या?”

अब ये भी कोई बात हुई कि किसी खास वजह से कोई काम किया जाये. मैंने बनावटी हँसी के साथ कहा, “आपको पता नहीं आज आवारागर्दी डे है. आज के दिन पुरुष जाति के लोग सुबह से उठ कर आवारागर्दी करते हैं. खैर मिश्रा जी ये नुक्कड़ पर कूड़े का ढेर बड़ा फल-फूल रहा है. इसको कब हटवा रहे हैं?”

मिश्रा जी ने मौके का फायदा उठाते हुये कटाक्ष के साथ उत्तर दिया, “हटवा देंगे ‘कूड़ा-उठाओ डे’ के दिन.”

“ये कौन सा डे है?”

“इस दिन गली मुहल्लों से कूड़ा या मलबा हटाया जाता है.”

“अब आपका ये ‘कूड़ा-उठाओ डे’ कब आता है?”

“हर दिवस की तरह ये भी साल में एक बार आता है.”

“वो तो ठीक है. पर कब?”

“‘कूड़ा-उठाओ डे’ ‘दौरा डे’ के ठीक अगले दिन आता है.”

“’दौरा डे’?”

“हाँ भई हर दिवसों की भाँति ये ‘दौरा डे’ भी साल में एक बार आता है. इस दिन कोई नगर अधिकारी या मंत्री नगर के हालात का मुआईना करने दौरे पर निकलता है.”

“अब ये ‘दौरा डे’ किस दिनाँक को पड़ता है?”

“अतुल जी ये ‘दौरा डे’ अंग्रेजी नहीं हिन्दु कैलेंडर का पालन करता है. होली और दीवाली की तरह इसकी भी तिथि कोई निश्चित नहीं है.”

बात आगे चलती उससे पहले ही एक युवक ने मिश्रा जी को पीछे से टोक दिया, “आपके पास अपच की कोई दमदार दवा है?”

मैंने पूछा, “क्यों, वेलंटाईन डे के दिन मुग़लई खाना खा आये क्या?”

“आपको कैसे पता?”

बिना जवाब दिये ही मैं साईकिल खिसकाते हुआ आगे बढ़ चला. साईकिल पर बस चढ़ने ही वाला था कि नीचे के फ्लैट वाले जौहरी जी का दस वर्षीय पुत्र अकेला ही स्कूल जाता हुआ दिखाई दे गया. अपने हाथ से लम्बी टाई लटकाये और अपने वजन से भारी बस्ता उठाये टिंकू (घर का नाम) बहती हुई नाक को लहराती हुई टाई से पोंछते और ‘झलक दिखला जा..’ गुनगुनाते हुये अपने ही में मस्त चला जा रहा था.

मैंने उसको रोक कर पूछा, “टिंकू अकेले? पापा नहीं हैं क्या घर पर?”

“पापा का पेट खराब हो गया है. कई बार पाकिस्तान के चक्कर लगा चुके हैं.”

“कल रात को मुग़लई खाना खाने गये थे क्या?”

“हाँ. पर आपको कैसे पता?”

“वो छोड़ो. तुमको स्कूल की देर हो रही है. चलो मैं साईकिल से छोड़ देता हूँ.”

टिंकू को साईकिल पर बैठा कर उसके स्कूल पहुँचा, पर बेचारे को फिर भी देर हो ही गयी. बाहर ही प्राचार्या जी मिल गयीं. क्रुद्ध वाणी में बेचारे टिंकू पर शुरू हो गयीं, “यंग मैन यू शुड बी अशेम्ड ऑफ योरसेल्फ – कमिंग सो लेट. आई कैन नॉट टालरेट सच काईंड ऑफ बिहेवियर. यू नो पंक्चुऐलिटी इस दि की फॉर सक्सेस. यू विल बी पनिश्ड फॉर दिस. यू मे गो टु योर क्लास रूम नाओ.”

होनहार बिरवान के होत चीकने पात – चीकने पात तो पता नहीं पर ये बिरवान चिकना घड़ा जरूर निकला. ‘झलक दिखला जा..’ का जाप करते हुये अपनी कक्षा की ओर चला गया. उसके जाते ही मैंने प्राचार्या महोदया से कहा, “मैंने बच्चे के सामने कहना उचित नहीं समझा, पर क्या आपको ये नहीं लगता कि बच्चों से हिन्दी में बात करनी चाहिये?”

“करते हैं न?”

“पर अभी अभी तो आप उसको अंग्रेजी में ही भला बुरा कहे जा रही थी.”

“ऐसा नहीं है. हिन्दी में बात करते हैं न ‘हिन्दी डे’ यानि कि ‘हिन्दी दिवस’ के दिन. उस दिन सारे बच्चों को पूरे दिन हिन्दी में बोलने की छूट होती है.”

मैं कुछ और कहता उससे पहले ही प्राचार्या जी ‘इक्सक्यूज़ मी’ कह कर वहाँ से नदारद हो गयीं. क्या करता, मैं भी साईकिल पर उछल कर चढ़ गया और पैडल मारता हुआ वहाँ से निलक पड़ा. अभी सौ मीटर ही गया होऊँगा कि सड़क पर पड़ी कील ने पीछे के टायर में छेद कर के उसकी हवा निकाल दी. अपने नगर वासियों की इसी बात से मुझे बहुत कोफ्त होती है – भाई लोगों सड़क पर जी भर के कूड़ा फेंको, तबियत से थूको या मूतो, पर ये कील शील न फेंका करो. टायर का पंचर जेब में पड़े बटुये में भी छेद कर देता है.

खैर पास में ही पंचर जोड़ने वाली दुकान दिख गई. पास जाकर अंडी बंडी में बैठे मिस्तरी जी से कहा, “भैय्या जरा पंचर जोड़ दो.”

“अबे ठिल्लू जरा बाहर आ. इन साहब का पंचर जोड़ दे.”

“मैं पंचर नहीं हूँ. साईकिल के टायर का पंचर जोड़ना है.”

“एक ही बात है साहब.”

ठिल्लू जी बाहर आये. ये क्या ठिल्लू तो मात्र दस या ग्यारह साल का लड़का निकला. मैंने मिस्तरी भाई से कहा, “ये तुम्हारा लड़का है?”

“हाँ, मेरा सगा लड़का है - मेरी इकलौती सगी बीबी का.”

“तो इसको पढ़ाने की जगह इससे मजदूरी करवाते हो? इसको एक बच्चे की तरह पालो.”

“करते हैं न साहब – चिल्ड्रेंस डे यानि कि बाल दिवस के दिन. मैंने बोल रखा है – बाल दिवस के दिन खुल्ली छूट. जो चाहे करो. पर साहब ये ससुरा उस दिन स्कूल जाने के बजाय मलिका शेहरावत की पिक्चरें देखना ज्यादा पसंद करता है. अब बताईये इसमें मेरा क्या दोष है.”

पंचर जुड़ने के बाद मैं फिर से चल पड़ा. ये लीजिये मोहल्ले की दस फीट चौड़ी सड़क पर जाम. साथ में ढिशुम ढिशुम की आवाजें आ रहीं थी. मैंने कोने में खड़े एक तमाशबीन से पूछा, “ये क्या हुड़दंग मचा हुआ है यहाँ पर.”

“आपको पता है आज इंटरनेशनल पीस डे यानि कि अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस है? उसी का सड़क के बीचों बीच से जुलूस निकल रहा था. कुछ वाहन चालकों ने जुलूस को जगह नहीं दी – बस, हाथापाई और लातापाई शुरू हो गयी.”

“मुझे तो लगता है कि ये पीस डे (शांति दिवस) का जुलूस नहीं बल्कि पीस दे (जैसा कि चक्की में पीस दे) का जुलूस है.”, टिप्पणी करते हुये मैं बीच बीच से जगह बनाता हुआ भीड़ से निकल भागा.

मुझे पता ही नहीं चला और मैं साईकिल चलाते चलाते लखनऊ विश्वविद्यालय के सामने आ पहुँचा. लीजिये यहाँ भी एक कोने में लातापाई हो रही थी. वैसे लखनऊ विश्वविद्यालय में लातापाई का न दिखना अनहोनी होता है. क्या करें आदत से मजबूर एक सच्चे भारतीय नागरिक की तरह मैं भी तमाशे का हिस्सा बन गया, “अरे भाई ये किसकी पिटाई कर रहे हो तुम लोग?”

“प्रोफेसर सिन्हा की.”

“छि छि. शरम नहीं आती है अपने गुरु की पिटाई करते हो?”

घूँसा चलाते हुये एक छात्र ने जवाब दिया, “शरम क्यों आयेगी. आज कोई टीचर्स डे थोड़े ही है. वैसे भी ये हमारे राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर हैं और ये हमारी प्रैक्टिकल की क्लास चल रही है.”

मैंने मन ही मन सोचा कि बहुत हो गयी साईकिल चलाई आज. वापस घर की ओर का रुख़ किया और पैडल मारते हुये घर पहुँच गया. घर पहुँच कर सोफे पर पैर फैलाये और हाथ में अखबार लेकर पसर गया. धपजी को मेरा आना सुनाई दे गया. आकर पूछा, “सब्जी कहाँ रखी है?”

“हत्तेरे की. वो तो लाना ही भूल गया.”

“तुम भी न. मैं तो तंग आ गयी हूँ तुमसे.”

“मुझसे तंग? मैंने तो सुना था कि आदमी की सिर्फ बनियान और कच्छी ही तंग हुआ करती हैं. और हाँ आज तुम मुझ पर चिल्ला नहीं सकती हो.”

“क्यों? ऐसा क्या है आज?”

“आज हसबेंड डे यानि कि पति दिवस है. आज के दिन कोई भी पत्नी अपने पति को डाँट पीट नहीं सकती है.”

“ऐसा क्या? तो ये लो पकड़ो घर में पड़ी हुई इकलौती लौकी. इसे छील कर अपने लिये बनाओ कोफ्ते. मैं चली शॉपिंग करने क्यों कि आज शॉपिंग डे भी है.”

लगता है मुझे अब आप सब से विदा लेनी पड़ेगी क्यों कि धपजी वास्तव में शॉपिंग के लिये निकल गयीं है और मुझे उठ कर पेट में उछल कूद कर रहे चूहों के लिये लौकी का कुछ बनाना पड़ेगा. ऐसे हालात में मुझे सिर्फ एक ही डे याद आ रहा है – मन्ना डे. लखनवी मियाँ लगाओ मन्ना डे के दर्दीले गीत और लग जाओ लौकी छीलने में.

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देवनगरी में हाहाकार

समस्त देवी देवताओं की सभा सजी हुई थी. प्रतिदिन की भाँति आज भी भगवान विष्णु भारत धरती पर घटने वाली घटनाओं से अनभिज्ञ अपनी शेषनाग शय्या पर पसरे हुये लक्ष्मी देवी से अपने पाँव दबवा रहे थे, और एक हाथ में कमल का सुन्दर पुष्प ले कर उसकी सुगंध का आनंद ले रहे थे.

सहसा सभा में हुड़दंग मच गयी – देखा नारद मुनि बिना धोती बाँधे ही भरी सभा में दौड़े भागे चले आ रहे हैं. भगवान विष्णु ने क्रोध भरी दृष्टि से नारद की ओर देखते हुये पूछा, “ये क्या हाल बना रखा है?”

नारद मुनि क्रुद्ध वाणी में बोले, “प्रभु आप बस लेटे लेटे कमल का फूल सूँघिये. आपको पता भी है कि नीचे भारत भूमि में क्या गुल खिल रहे हैं.”

प्रभु ने प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हुये पूछा, “ऐसी क्या अनहोनी हो गयी कि तुम लाज हया त्याग कर बिना धोती के ही दौड़ पड़े.”

नारद ने अपना माथा पीटते हुये कहा, “हे भगवान क्या दिन आ गये हैं. अब ये भी मुझे ही बताना पड़ेगा. प्रभु एक वेलंटाईन नामक विदेशी देवता ने कामदेव को अपदस्थ कर दिया है यानि कि वेलंटाईन जी ने कामदेव की गद्दी छीन कर स्वयं को उस गद्दी पर विराजमान कर दिया है. आज वेलंटाईन देवता का महान पर्व है. आप जरा नीचे झाँक कर तो देखिये कि ये पर्व कितने हर्षौल्लास के साथ मनाया जा रहा है. इतना धूम धड़ाका तो शिवरात्रि, राम नवमी और जन्माष्टमी में भी नहीं होता है. छि छि यही दिन देखने को बचे थे. हरि ओम हरि ओम.”

नारद मुनि आगे और कुछ कहते कि कामदेव भी अपना लंगोट संभालते हुये सभा में आ धमके. अष्रुपात करते हुये विष्णु के चरणों में लोट गये. हिचकियों के साथ सुबक सुबक कर बोले, “प्रभुश्री मैं तो लुट गया, बरबाद हो गया. न जाने कहाँ से और कब ये कमबख्त वेलंटाईन आ धमका, और भारत की युवा वर्ग को अपने वश में कर के मेरे ऊपर धावा बोल बैठा. गद्दी तो गयी सो गयी, अब तो भारत के मूढ़ युवा मेरा नाम तक नहीं पहचानते हैं.”

विष्णु ने लापरवाही के साथ कहा, “कामदेव सीधे शब्दों में बतलाओ कि तुम मुझसे चाहते क्या हो?”

प्रभु विष्णु के इस रवैये को देख कर नारद मुनि से रहा नहीं गया. बस कटु सत्य उगल ही दिया, “प्रभुश्री यदि आपका यही हाल रहा तो अति शीघ्र आपकी शय्या भी आपके कर कमलों के नीचे से नदारद हो जायेगी. वो सफेद दाढ़ी, मोटी तोंद और लाल स्लीपिंग सूट वाला बाबा उठा ले जायेगा हाँ. फिर भारत भूमि में दुबारा अपने झंडे गाड़ने के लिये आपको भी दाढ़ी मूँछ लगा कर और बाल लम्बे बढ़ा कर सूली पर लटकना पड़ेगा.”

अपनी शय्या छिनने की बात सुन कर तो प्रभु विष्णु को भी घबराहट होने लग गयी. बस नारद जी से पूछ बैठे, “हे मुनिवर! आप बस ऐसे ही सबको डराते फिरोगे या कुछ करोगे भी?”


नरद मुनि ने तत्परता से उत्तर दिया, “प्रभु मैंने तो एक तरीके का प्रयोग भी किया परंतु उसका कोई प्रभाव ही नहीं हुआ. मैंने भारत भूमि पर निवास करने वाले भक्तों के दो बड़े समूहों ‘शिव सेना’ तथा ‘बजरंग दल’ के कर्मठ सिपाहियों को जिम्मा सौंपा कि इस समस्या का किसी भी प्रकार से समाधान करें. उन्होंने वेलंटाईन के भक्तों को पकड़ पकड़ कर उनका मुँह काला कर के, गधों पर उल्टा बैठा कर और जूतों की माला पहना कर गली कूँचों से जुलूस निकाला. वेलंटाईन देवता की पूजा पाठ की सामग्री बेचने वाली दुकानों को तोड़ा फोड़ा भी. पर प्रभुश्री भला मुठ्ठी भर प्रभु के सेवक वेलंटाईन जी के अनगिनत भटके हुये अनुयायियों को कैसे सुधार पाते. और, वैसे भी भारत जैसे प्रजातंत्र में सबको सभी कुछ करने की संपूर्ण छूट है – आप या मैं किसी को भी कुछ करने से रोक नहीं सकते हैं भले ही वो स्वयं की ही कब्र खोद कर उसमें चादर ओढ़ कर लेट जायें. और, अगर जबरन ऐसा किया तो भारत के जनतंत्र की छवि अन्य देशों में मैली हो जायेगी. मुझको तो ऐसा प्रतीत होता है कि ये मनहूस वेलंटाईन जरूर युवा पीढ़ी को भाँग या गाँजे का नशा करा करा के उनको पथ भ्रष्ट कर रहा है. हे देवताओं के देवता अब आप ही बताईये कि और क्या किया जा सकता है.”

ये तो नारद मुनि ने और भी हृदय भेदी सूचना दे डाली. भगवान विष्णु ने तुरंत सर्वश्री ब्रह्मा और महेश को एक आपतकालीन बैठक के लिय बुला भेजा. सभी देवी देवता गण जुट गये ब्रेन स्टॉर्मिंग सत्र में कि किस प्रकार से वेलंटाईन के खतरनाक तरीके से बढ़ते हुये प्रभाव को कम किया जाये. गुर्भाग्यवश कई घंटो की तू तू मैं मैं और गरमा गरम बहस के बाद भी कोई उपयुक्त हल न निकल पाया.

अचानक यमराज जी की दायीं आँख तेजी से फड़कने लग गयी (मतलब की कोई टेक्स्ट मैसेज आ गया). यमराज ने उठते हुये कहा, “देवी और सज्जनों मुझे जाना होगा. अभी अभी कोई भारतीय युवा ऊपर आ पहुँचा है. मुझे अपने कार्यालय जा कर उसका कागज़ी काम पूरा करना है.”

सभी देवता गण एक-स्वर चिल्ला उठे, “जब तक इस समस्या का हल नहीं निकल आता है आप इस सदन से बाहर नहीं जा सकते हैं. यदि आपको अपना कार्य निपटाना ही है तो उस युवक को यहीं बुला लीजिये.”

यमराज जी जनमत को कैसे ठुकराते. इशारे से द्वारपालों को उस युवक को अंदर भेजने को कहा. कक्ष का द्वार खुला और अठ्ठारह या उन्नीस साल का एक सींकिया सा नौजवान सीटी बजाता हुआ अंदर आया. अंदर आते ही युवक ने समस्त देवियों और देवताओं की ओर हाथ हिलाते हुये कहा, “हैप्पी वेलंटाईन्स डे अंकल्स ऐंड आंट्स.”

यमराज ने घनी मूछों पर हाथ फेरते हुये पूछा, “वत्स, तुम्हारा नाम क्या है?”


“ऐंडी.”

“ऐंडी?”

“अरे माँ बाप ने आनन्द रखा था.”

“अच्छा अच्छा. वत्स ये बताओ तुम यहाँ कैसे आ पहुँचे?”

“आप सब लोग देखने में तो काफी पुराने जमाने के लगते हो. शायद आप लोगों को पता भी नहीं होगा कि आज वेलंटाईन्स डे है. यू नो मैंने भी सोचा कि अपनी दोनों स्वीट-हार्ट्स सेलिना और टीना के लिये वेलंटाईन डे कार्ड खरीद लूँ. कार्नर की आर्चीस की शॉप जाकर मैंने दोनों के लिये एक एक कार्ड खरीद लिया. सोचा पहले टीना को जाकर विश करता हूँ. टीना के घर पहुँचा – वो सिज़र (कैंची) लेकर अपनी जींस में होल्स कर के उसे स्टाईलिश बना रही थी. मैंने जाकर उसे किस किया, विश किया और कार्ड दे दिया. बट माई बैड लक मैंने टीना को सेलिना वाला कार्ड दे दिया. टीना ने कार्ड खोला और पढ़ा – सेलिना डार्लिंग, यू आर माई ओनली हार्ट... टीना ने बस इतना ही पढ़ा था कि गुस्से में उसने हाथ में पकड़ी हुई सिज़र मेरे ऊपर थ्रो कर दी. सिज़र सीधे मेरे हार्ट में पेनीट्रेट कर गयी ऐंड आई फेल लाईक ए बिग लोड ऑफ काऊ डंग. उसके बाद दो काले कलूटे ड्यूड्स मुझे पुल करते हुये यहाँ ले आये. बट टेल मी व्हाई आल यू गाईज़ आर लुकिंग सो स्ट्रेस्ड आऊट. आप लोगों को क्या बॉदर कर रहा है. टेल मी – मे बी आई कैन साल्व योर प्राबलम.”

नारद मुनि ने ऐंडी को अभी तक घटी सारी वार्तालाप का विवरण दे दिया. ऐंडी ने मुस्कराते हुये कहना शुरू किया, “आई सी. सो दिस इस योर प्राबलम. सी गाईज़ आप लोगों की प्राबलम ये है कि आप लोग पिछले कई मिलियन ईयर्स से चेंज नहीं हुये हो. अरे टाईम के साथ साथ अपने को बदलना पड़ता है. लुक ऐट यू गाईज़ पता नहीं किस जमाने के कपड़े पहनते हो, जेवेलरी पहनते हो. डिजाईनर क्लोथ्स पहनो. लुक ऐट यू विष्णु सर आप iPod की जगह शंख लिये फिरते हो. जेम्स बाँड स्टाईल की टाईनी रिवाल्वर की जगह गदा और चक्र थाम रखा है. और, कमल फेंक कर रेड रोज़ पकड़ो. लक्ष्मी आँटी को बाहों में रखने की जगह उनसे पैर दबवाते हो. ऐंड यम जी आई थिंक यू नीड टु गो टू ए गुड सलून फार ए डीसेंट हेयर कट. मेरी मानों तो मूँछे वूँछे मुड़वा दो. और, हो सके तो अगले आने वाले ड्यूड से तीन चार डज़न फेयर ऐंड हैंडसम की ट्यूबें मंगवा लो. शिव सर, ब्रह्मा सर और नारद सर – देखिये आप लोगों ने अपना क्या हुलिया बना रखा है. पूरे कार्टून नेटवर्क के कैरेक्टर्स लग रहे हैं आप सब इन कपड़ों और गेट-अप में. ऐसे रहोगे तो कर चुके आप लोग वेलंटाईन जी से कॉम्पटीशन. आल यू फोक्स नीड इज़ ऐन इमेज मेक-ओवर. और, जरा मार्डन नाम शाम रखो – जैसे कि आनन्द का ऐंडी, सन्दीप का सैंडी वगैरह वगैरह.”

सभी देवी और देवताओं ने युवक ऐंडी की बातों को ध्यानपूर्वक सुनने के बाद एकमत सहमति में मुंडी हिलाते हुये कहा, “बालक सही कहता है. हमें ऐसा ही करना चाहिये.”

इस बीच भारत के मुम्बई नगर में अचानक ही मौसम ने रौद्र रूप धारण कर लिया. बुरे मौसम के कारण कुछ एक भीषण कार दुर्घटनायें हो गयीं जिसमें मुम्बई के दो नामी गिरामी फैशन डिजाईनर्स और एक बहुत बड़ी काल सेंटर कंपनी के एच. आर. मैनेजर की मृत्यु हो गयी. समाचारों ने दुर्घटना और मृत्यु का कारण बुरा मौसम बताया. पर, उन्हें क्या पता था कि इन सब के पीछे यमराज और कई देवी देवताओं का हाथ था – आखिर उन्हें अब कम्प्लीट इमेज मेक-ओवर के लिये उम्दा किस्म के फैशन डिजाईनर्स की आवश्यकता जो थी. पर काल सेंटर कंपनी का एच. आर. मैनेजर बेचारा क्यों पीसा गया – अरे वही तो देवी देवताओं का नया नामकरण करने वाला है.

खैर जब तक हमारे देवी देवताओं का इमेज मेक-ओवर का काम पूरा नहीं हो जाता है, तब तक के लिये – “हैप्पी वी.डी.!” अरे वी.डी. का मतलब “वेनेरल डिज़ीज़” नहीं बल्कि “वेलंटाईंस डे” है. वैसे भी मेरे विचार से दोनों में कोई खास अंतर नहीं है.
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